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पढ़ें 'जो न बन पाई तुम्हारे', 'यह किसका मन डोला' और 'बोल राजा, बोल मेरे'
15-Oct-2021 9:46 AM (69)
पढ़ें 'जो न बन पाई तुम्हारे', 'यह किसका मन डोला' और 'बोल राजा, बोल मेरे'

हिंदी जगत के प्रसिद्ध कवि, लेखक और पत्रकार माखन लाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल, 1889 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बावई गांव में हुआ था. प्राइमरी शिक्षा के बाद घर पर ही इन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी, गुजराती आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया.

माखनलाल चतुर्वेदी के काव्य संग्रह ‘हिमतरंगिनी’ के लिए उन्हें 1955 में हिन्दी के ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया.

माखनलाल चतुर्वेदी की ‘हिम तरंगिनी’
जो न बन पाई तुम्हारे 

जो न बन पाई तुम्हारे
गीत की कोमल कड़ी।

तो मधुर मधुमास का वरदान क्या है?
तो अमर अस्तित्व का अभिमान क्या है?
तो प्रणय में प्रार्थना का मोह क्यों है?
तो प्रलय में पतन से विद्रोह क्यों है?
आये, या जाये कहीं—
असहाय दर्शन की घड़ी;
जो न बन पाई तुम्हारे
गीत की कोमल कड़ी।

सूझ ने ब्रम्हांड में फेरी लगाई,
और यादों ने सजग धेरी लगाई,
अर्चना कर सोलहों साधें सधीं हाँ,
सोलहों श्रृंगार ने सौहें बदीं हाँ,
मगन होकर, गगन पर,
बिखरी व्यथा बन फुलझड़ी;
जब न बन पाई तुम्हारे
गीत की कोमल लड़ी।

याद ही करता रहा यह लाल टीका,
बन चला जंजाल यह इतिहास जी का,
पुष्प पुतली पर प्रणयिनी चुन न पाई,
साँस और उसाँस के पट बुन न पाई

यह किसका मन डोला 

यह किसका मन डोला?
मृदुल पुतलियों के उछाल पर,
पलकों के हिलते तमाल पर,
नि:श्वासों के ज्वाल-जाल पर,
कौन लिख रहा व्यथा कथा?

किसका धीरज `हाँ बोला?
किस पर बरस पड़ीं यह घड़ियाँ
यह किसका मन डोला?

कस्र्णा के उलझे तारों से,
विवश बिखरती मनुहारों से,
आशा के टूटे द्वारों से-
झाँक-झाँककर, तरल शाप में

किसने यों वर घोला
कैसे काले दाग पड़ गये!
यह किसका मन डोला?

फूटे क्यों अभाव के छाले,
पड़ने लगे ललक के लाले,
यह कैसे सुहाग पर ताले!
अरी मधुरिमा पनघट पर यह-

घट का बंधन खोला?
गुन की फाँसी टूटी लखकर
यह किसका मन डोला?

अंधकार के श्याम तार पर,
पुतली का वैभव निखारकर,
वेणी की गाँठें सँवारकर,
चाँद और तम में प्रिय कैसा-

यह रिश्ता मुँह-बोला?
वेणु और वेणी में झगड़ा
यह किसका मन डोला?

बेचारा गुलाब था चटका
उससे भूमि-कम्प का झटका
लेखा, और सजनि घट-घट का!
यह धीरज, सतपुड़ा शिखर-

सा स्थिर, हो गया हिंडोला,
फूलों के रेशे की फाँसी
यह किसका मन डोला?

एक आँख में सावन छाया,
दूजी में भादों भर आया
घड़ी झड़ी थी, झड़ी घड़ी थी
गरजन, बरसन, पंकिल, मलजल,

छुपा `सुवर्ण खटोला’
रो-रो खोया चाँद हाय री?
यह किसका मन डोला?

मैं बरसी तो बाढ़ मुझी में?
दीखे आँखों, दूखे जी में
यह दूरी करनी, कथनी में
दैव, स्नेह के अन्तराल से

गरल गले चढ़ बोला
मैं साँसों के पद सुहला ली
यह किसका मन डोला?

बोल राजा, बोल मेरे!

दूर उस आकाश के-
उस पार, तेरी कल्पनाएँ-
बन निराशाएँ हमारी,
भले चंचल घूम आएँ,
किन्तु, मैं न कहूँ कि साथी,
साथ छन भर डोल मेरे!
बोल राजा, बोल मेरे!

विश्व के उपहार, ये-
निर्माल्य! मैं कैसे रिझाऊँ?
कौन-सा इनमें कहूँ ’मेरा’?
कि मैं कैसे चढ़ाऊँ?
चढ़ विचारों में, उतर जी में,
कलंक टटोल मेरे।
बोल राजा, बोल मेरे!

ज्वार जी में आ गया
सागर सरिस खारा न निकले;
तुम्हें कैसे न्यौत दूँ
जो प्यार-सा प्यारा न निकले;
पर इसे मीठा बना
सपने मधुरतर घोल तेरे।
बोल राजा, बोल मेरे!

श्यामता आई, लहर आई,
सलोना स्वाद आया,
पर न जी के सिन्धु में
तू बन अभी उन्माद आया,
आज स्मृति बिकने खड़ी है-
झिड़कियों के मोल तेरे।
बोल राजा, बोल मेरे! (साभार- कविता कोश)

(news18.com)

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