विचार / लेख

गर्व करने लायक कोई बात नहीं...
06-Oct-2021 3:01 PM (81)
गर्व करने लायक कोई बात नहीं...

-दिनेश श्रीनेत

मुझे हिंदी पट्टी के ऐसे बौद्धिक लोग नापसंद हैं या कम से कम उनकी यह बात नापसंद है- जब वे बिना किसी परिप्रेक्ष्य के स्थानीय बोली, अपने इलाके, क्षेत्रीय संस्कृति, पूर्वांचली, पहाड़ी या बिहारी संस्कृति का गुणगान करने में लग जाते हैं। मुझे हमेशा लगता है कि यह न सिर्फ अपरोक्ष रूप से क्षेत्रवाद को बढ़ावा देता है बल्कि लोगों के बीच फर्क की बारीक सी रेखा खींचने में मदद करता है। वैसे भी अपनी ही चीजों पर गर्व करते रहने को बहुत विकसित मानसिकता नहीं माना जा सकता।
 
और कभी किसी ने यह नहीं सोचा कि गर्व करने के लिए हिंदी पट्टी के पास रह क्या गया है? घिसे-पिटे रीति-रिवाज, खत्म होती भाषा या अप्रासंगिक हो चुके रहन-सहन के तरीके...बस। जो लोग अपनी लोक-संस्कृति पर गर्व जताते हैं, उनके यहां भी शादियों में डीजे पर पंजाबी या हरियाणवी गीत ही बजते हैं। हिंदी पट्टी के ये बुद्धिजीवी अपनी लोक संस्कृति की बात तो करते हैं मगर तेजी से बढ़ती अपसंस्कृति पर चुप्पी साध जाते हैं। मंदिरों में होने वाले भजन तो कब के नरेंद्र चंचल जैसे लोगों की वजह से फिल्मी गीतों की भेंट चढ़ गए। किसी जमाने में भोजपुरी में अश्लील गीतों को स्थापित करने वाले बालेश्वर यादव को प्रदेश सरकार सम्मान देती है। भोजपुरी सिनेमा की वजह से आज पूर्वांचल की गलियों, आटो, बसों और शादियों में घनघोर अश्लील गाने बजते हैं और उसी पूर्वांचल की संस्कृति पर गर्व करने वालों के परिवारों की स्त्रियां हवा में तैरती अश्लीलता के बीच खुद को समेटे दुनिया जहान के काम पर निकलती हैं।

जिस पूर्वांचल को मैं जानता हूँ, वहां के गांवों, कसबों, शहरों का समाज घनघोर जातिवादी और पितृसत्तात्मक नजर आता है। मैं पाता हूँ कि इन इलाकों में बसने वाले ज्यादातर लोग सभ्य नागरिक होने की चेतना से कोसों दूर हैं। मेलों और शादियों में मर्दों के मनोरंजन के लिए छोटे बच्चों की मौजदगी में अश्लील नाच होते हैं। बंदूकों और बड़ी गाडिय़ों से शक्ति का प्रदर्शन किया जाता है। अधिकतर लोग कर्मकांडी और पाखंडी हैं। औरतों के प्रति सामंती दृष्टिकोण है। सरकारी दफ्तरों और विश्वविद्यालयों में एक-दूसरे की जाति देखकर बात की जाती है। घरों में साल में कई बार लाउडस्पीकर पर बेसुरी आवाजों में कीर्तन होते हैं और लोग अपने बेटों के विवाह में ज्यादा से ज्यादा दहेज बटोरने में लगे रहते हैं। क्या इन्हीं सब पर हम गर्व करना चाहते हैं?

बौद्धिक लोग जब क्षेत्रीय संस्कृति पर अभिमान की बात करते हैं तो वह किस समाज के बारे में बात करना चाहते हैं? उनका मंतव्य क्या है? कभी इस पर चर्चा नहीं होती। यदि हम दूसरी संस्कृति को अपने जीवन में जगह नहीं दे पा रहे हैं तो इसे हमारी सांस्कृतिक चेतना की विपन्नता ही कहा जाएगा। दुनिया में संपर्क के साधन जिस तेजी से बढ़ रहे हैं हम जिस तरह से भिन्न संस्कृति के लोगों से मिलते हैं, उनके साथ संवाद करते हैं, क्या खुद में सिमटे रहने को किसी भी तरह से उचित ठहराया जा सकता है? बंगाल ने ब्रिटिश संस्कृति से तालमेल बिठाया और उनके यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिभाएं सामने आईं। क्यों एक उत्तर प्रदेश का व्यक्ति राजस्थान के मांगनिहार ब्रदर्स के गीतों को नहीं सराह सकता? या फिर बिहार के लोग पहाड़ी लोक संगीत क्यों नहीं सुन सकते?

जाहिर है यह निजी पसंद नापसंद का मामला है, मगर हमें अपने दरवाजे कम से कम खोलकर रखने चाहिए। हिंदी पट्टी के लोगों को अपनी संस्कृति पर झूठा
गर्व करने की बजाय दूसरों की संस्कृति को सम्मान देने का चलन विकसित करना चाहिए। जब दूसरे की संस्कृति को सम्मान देंगे तो अपनी संस्कृति को सम्मान देना खुद-ब-खुद आ जाएगा। मराठी या बंगाली समाज के मुकाबले हिंदी क्षेत्रों में नृत्य, संगीत या नाटक के प्रति हिकारत का भाव है। बचपन में मैं देखता था कि गोरखपुर के लोग बंगाली या ईसाई लोगों का मजाक उड़ाया करते थे और उनके प्रति असहयोग की भावना रखते थे। जबकि दोनों ही समुदायों का इस शहर के सांस्कृतिक विकास में गहरा योगदान रहा है।

यह अच्छा है कि उत्तर भारत की नई पीढ़ी अपनी क्षेत्रीयता के झूठे अहंकार और जकड़बंदी से दूर है। ज्यादातर मिडिल क्लास फैमिली के बच्चे अपना शहर छोडक़र पुणे, चेन्नई, मुंबई, पढऩे जा रहे हैं और वहीं पर नौकरियां कर रहे हैं। जिस मल्टीनेशनल कंपनी में वे काम करते हैं वहां बिहार के लडक़े के बगल की सीट पर महाराष्ट्र की लडक़ी और उसके बगल में आंध्र का लडक़ा और उसके बगल में बंगाली या नार्थ ईस्ट की लडक़ी बैठे होते हैं। जब उनके बीच संवाद होता है तो यह समझ में आता है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दोनों की भाषा और खान-पान अलग है, अंतत: दोनों को ही नेटफ्लिक्स पर ‘मनी हेस्ट’ सिरीज पसंद है। दोनों एक जैसे चुटकुलों पर हँस सकते हैं। दोनों एक-दूसरे के खाने का स्वाद ले सकते हैं।

नई संस्कृति में इस उदारता के लिए जगह बनानी होगी। ऐसा क्यों है कि हिंदी पट्टी के लोग अब तक देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले सम्मानजनक स्थिति नहीं हासिल कर सके हैं? कहीं न कहीं उनका अपने पुराने तौर-तरीके से चिपके रहना है। वे अपने रहन-सहन, आचार-व्यवहार और सोच में प्रगतिशील नहीं हैं। नई चीजों और नए लोगों के प्रति संदेह रखते हैं। वे अवसरवादी हैं। और हमारे बुद्धिजीवी किसी गोष्ठी में कहते पाए जाते हैं, मुझे गर्व है कि मैं फलां जगह आता हूँ। माफ कीजिए, मुझे गर्व करने लायक कोई बात नजऱ नहीं आती। यदि गर्व कहना है तो पहले अपने समाज को इस लायक बनाइए कि उसकी सराहना खुद घूम-घूमकर न करनी पड़े। साथ ही जिन्हें हम विचारक, चिंतक मानते हैं, जिनकी बातों से सोसाइटी में ओपिनियन बनती है, उन्हें अपने इस ‘क्षेत्रवाद’ से बाहर आना होगा।
पाश ने लिखा था-
जब भी कोई समूचे भारत की
‘राष्ट्रीय एकता’ की बात करता है
तो मेरा दिल चाहता है —
उसकी टोपी हवा में उछाल दूँ
मैं यहां पर ‘समूचे भारत की राष्ट्रीय एकता’ की जगह ‘हमारे क्षेत्र की संस्कृति’ लिखना चाहूँगा। बाकी टोपियां उछालनी जरूरी हैं...
(फेसबुक से)

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