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ममता गोदियाल की कविता, 'टूट गये हैं, बड़े होने का किरदार निभाते-निभाते'
05-Oct-2021 8:54 AM (160)
ममता गोदियाल की कविता, 'टूट गये हैं, बड़े होने का किरदार निभाते-निभाते'

नई कलम में आज की मेहमान हैं ममता गोदियाल. ममता ने आसपास मौजूद उन तमाम विषयों को अपनी कलम से शब्द दिए हैं जिनसे एक आम आदमी अक्सर जूझता नजर आता है. विषय तो वही होते हैं लेकिन किरदार बदल जाते हैं, लेकिन जब किरदार बदलते हैं तो विषयों और मुद्दों को देखने का नजरिया भी बदल जाता है.

प्रस्तुत हैं ममता गोदियाल की कलम से निकले कुछ जज़्बात-

कुछ जज़्बात

मेरे बेरोजगार से कुछ जज़्बात,
पूछा करते हैं, अक्सर सवाल

एक रोज़, चैन से बैठा था मैं
साथ में बैठ गए ये जज्बात
पूछा,
“बताओ भाई, अवल दर्ज़े की है डिग्री ‘ख्यालातों’ में पायी,
फिर भी, बेरोजगारी ही क्यों हाथ आयी”

मैंने थोड़ा सोचा, फिर कुछ समझा,
कहा “सिर्फ अवल ख्यालातों की डिग्री से बात नहीं बनेगी,
ज़माना नया है, डिग्री “जी हजूरी” में चलेगी

ये सुन मेरे जज़्बात, थोड़े सहम से गये,
और बोले “कोशिश करी थी बहुत, पर पार ना हो पाए,
लगता है, इन जज्बातों को नही मिल पायेंगी नयी राहें”

मैं फिर सोच में बैठ गया,
बोला, “सुनो! हल है एक मेरे पास,
नए विचारों की क्रान्ति, यही है इसका उपचार

आसान नही होगा यह सफर, याद रहे,
चुनोतियां होंगी हज़ार, राह में तेरे
तू बुलंद चलते चलना, कारवां लिये,
जीत होगी तेरी, अगर तु डट कर रहे.

कुछ जज़्बात ये सब सोच में थे,
और कह रहे थे अपने से ही
“यह जज़्बात अब बेरोजगार न रहेंगे,
पहले मैं इन्हें अपनाऊंगा, फिर दूसरे करेंगे.”

मेरी राख, मेरा अफ़साना

मैं थी यहीं, फिर भी सबसे दूर कहीं,
अब हूं सबसे दूर कहीं, लेकिन सबके लबों पे बसी.

अजब है, दुनियां का दस्तूर यहां,
नफरत में भी है, प्यार का मुखोटा लगा.

जब होगी राख मेरी देह,
दो आंसू के बदले,
बस, मेरा अफ़साना लौटा देना मुझे.

कुछ ऐसा बचपन

बचपन के मायने अब कुछ बदल से गये हैं,
तामील के तराज़ू मे अक्सर, पिस से रहे हैं.

न खेल, ना खिलौने, ना लोरी, ना लाड़,
यहां वक़्त की कमी है, कौन करेगा मुझसे प्यार.

ना शिक्षक, ना वालिदैन, समझते मेरा हाल,
कीमत लगा दी “बड़ी-बड़ी उम्मीदो” की यार.

टूट गये हैं, बड़े होने का किरदार निभाते-निभाते,
आज़ाद कर दो बचपन, कि दर्द अब ये हम, सह नही पाते.

कुछ “मैं” की महफ़िल

बाजार सा लगा था,
कुछ बेरुखी के जज्बातों का.

उधर महफ़िल में आज आलम,
कुछ “मैं” का सजा था.

चिलमन से, कुछ गहरी शोख नज़रें,
कुछ मुझसे, मुझको मिला रही थीं.

इनायत कहूं इसको या मेहरबानी,
जो मुझ पर कर्म फर्मा रहीं थीं.

अक्सर मैं देखा करता हूं

अब, अक्सर मैं देखा करता हूं
मां तू सहमी-सहमी रहती है.

बाहरी दुश्मन को तो हिला दिया
दुनिया को भी हमने दिखा दिया,
कोई आंख उठा कर ना देखे,
यह सबको हमने बता दिया.

फिर भी, अक्सर मैं देखा करता हूं
बेटी तुम डरी-डरी सी चलती हो,
गलियों और चौबारो में,
तुम मुझको ढूंढा करती हो.

हम ध्रुव तारा सा चमक रहे
हम सिंह की तरह गरज़ रहे,
फिर भी, अक्सर मैं देखा करता हूं,
मां, तू भूखे ही सो जाया करती है.

हम नई सियासत रच गए
हम नए दांव भी खेल गए,
फिर भी, अक्सर मैं देखा करता हूं,
तू खुशियों ढूंढा करती है,
मां, तू मुझको ढूंढा करती है.

Mamta Godiyal

(news18.com)

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