विचार / लेख

जाति मिटाने के नाम पर जाति को बढ़ावा देने की हिकमत
03-Oct-2021 1:48 PM (90)
जाति मिटाने के नाम पर जाति को बढ़ावा देने की हिकमत

-प्रकाश दुबे

बिहार के मधुबनी जिले में दिलचस्प फैसला हुआ। अभियुक्त को छह महीने तक पूरे गांव की महिलाओं के कपड़े धोने होंगे और उन पर इस्तरी करने के बाद भिजवाना होगा। झंझारपुर  के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अविनाश कुमार ने देश की प्रति गांव के मुखिया जी को भिजवाई ताकि पता रहे कि पालन हो रहा है या नहीं?

दूसरा फैसला विंध्याचल के दक्षिण में तेलंगाना में हुआ। अदालत के बजाय सरकार ने फैसला किया। चंद्रशेखर राव सरकार ने गौड़ समुदाय को शराब ठेकों में 15 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय किया। मुख्यमंत्री ने बरसों पहले आश्वासन दिया था। अपना वचन पूरा किया। तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में गौड़ या गौड़ा समुदाय परंपरागत रूप से ताड़ी उतारने, शराब बनाने और बिक्री का व्यवसाय करता रहा है। सरकार ने अनुसूचित जाति के लिए भी दस प्रतिशत और जनजाति के लिए पांच प्रतिशत आरक्षण कर दिया।

बिहार के 20 वर्षीय ललन कुमार ने महिला से बलात संबंध बनाने का प्रयास किया था। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अविनाश कुमार ने प्रताडि़ता सहित पूरे गांव की महिलाओं के वस्त्र साफ करने का आदेश दिया। इन न्यायाधीश ने कुछ समय पहले शराबबंदी कानून तोडऩे वाले अपराधी को सशर्त जमानत दी। शर्त यह थी कि वह तीन महीने तक पांच गरीब बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाएगा।

अनेक लोग अपराधी को सुधरने का अवसर देने की हिमायत करेंगे। धोबी जाति में पैदा व्यक्ति को खास तरह की सजा दी गई। खास जाति में पैदा होने वाले व्यक्तियों को पुश्तैनी व्यवसाय करने के लिए आरक्षण दिया। संविधान ने जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव मिटाने कहा। जाति जारी रखने नहीं। समता का नारा लगाते लगाते उप जातियों में बंट गए। आरक्षण के कारण सबको बराबरी पर लाने का दावा किया जाता है। फिर भी गहरी खाई बाकी है। महीना भर पहले मिजोरम राज्य की पहली जनजाति महिला मार्ली वानकुन को गुवाहाटी उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त किया गया।

जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में काम करने के आठ महीने बाद वानकुन पदोन्नत की गई। राजधानी आइजोल में उत्सव मनाया गया। सात दशक बीतने के बाद उच्च न्यायालय में वानकुन को अवसर मिला। अन्य किसी मिजो महिला को इस ऊंचाई तक पहुंचने में दस साल से अधिक लग सकते हैं। मार्ली फौजी की बेटी है। शिक्षा-दीक्षा दिल्ली में होने का उसे लाभ हुआ। केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय ने स्वीकार किया कि  देश के सर्वोच्च सात भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में दाखिला पाने के बावजूद बीच में पढ़ाई छोडऩे वाले 63 प्रतिशत विद्यार्थी अनुसूचित यानी आरक्षित वर्ग के हैं। गुवाहाटी में 88 प्रतिशत और दिल्ली में 76 प्रतिशत।

जाति गणना, जातीय आधार पर आरक्षण का समर्थन और विरोध अपनी जगह। उत्तरप्रदेश के हाथरस में महिला के साथ बलात्कार हुआ। संवाद माध्यमों के कुछ सचित्र-विचित्र प्राणी कटघरे में होने की पात्रता रखते हैं। तरह तरह की खबरें नमक मिर्च लगाकर छापी गईं। पीडि़ता की देह के अपराधग्रस्त अंग की 11 दिन बाद फारेंसिंक जांच की गई। विडम्बना यह, कि इन उत्साही महानुभावों ने चटपटी खबरें देते समय यह जानने, समझने और जनता को बताने की तकलीफ गवारा नहीं की कि इतना समय बीत जाने के बाद सबूत सुरक्षित कैसे रह सकता है?

29 सितम्बर 2006 को महाराष्ट्र के खैरलांजी में भैयालाल भोतमांगे की पत्नी, दो बेटों और बेटी की हत्या कर दी गई। इसे जातीय विद्वेष का परिणाम बताया गया। संवेदना सूखने के लिए 15 वर्ष का समय बहुत होता है। दुख इस बात का है कि गांव जाकर हाल जानने का कष्ट उठाने वाले नहीं हैं। जातीय मनमुटाव समाप्त करने का प्रयास नहीं हुआ।

भारतीय भाषाओं के नुमाइंदे चूक गए। तसल्ली इस बात की है कि अंग्रेजी अखबार के पत्रकार ने घटना स्थल पर जाकर लोगों का मन जाना। पत्रकार प्रदीप कुमार मैत्र की पिछले पखवाड़े छपी खबर से पता लगता है कि जातीय विषमता और तनाव समाप्ति के पर्याप्त प्रयास नहीं हुए। खबर के मुताबिक पीडि़त परिवार के कुछ सदस्य गांव छोड़ चुके हैं। नाते-रिश्तेदारों से दूसरे समुदाय का बोलचाल बंद है। जाति विशेष के मुख्यमंत्री और मंत्री बनाकर वोट की फसल काटने की जुगत में भिड़े लोग इस सत्य का सामना नहीं करना चाहते कि जातीय-द्वेष की जड़ में विद्यमान आर्थिक-सामाजिक विषमता का मुकाबला संवाद और समझाईश के बूते ही किया जा सकता है। आंकड़ों की बारिश और होर्डिंग में मुस्कुराते चेहरे बदलाव नहीं लाते।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

अन्य पोस्ट

Comments