कारोबार

  • बेंगलूरु। प्रमुख आईटी सेवा कंपनी इन्फोसिस के सह-संस्थापक एनआर नारायणमूर्ति ने अपने दूसरे कार्यकाल के बाद 2014 में इस सॉफ्टवेयर सेवा कंपनी को छोड़ने के निर्णय को अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल करार दिया है। उसी दौरान उन्होंने कंपनी की कमान गैर-संस्थापक प्रबंधन एवं बोर्ड को सौंप दी थी। अपनी सेवानिवृत्ति के दो साल बाद जून 2013 में मूर्ति ने दोबारा इस सॉफ्टवेयर निर्यातक कंपनी की कमान संभाली थी क्योंकि तत्कालीन सीईओ एवं सह-संस्थापक एसडी शिबुलाल उनकी दृष्टि इन्फोसिस 3.0 को लागू करने और अनिश्चितता के माहौल में वृद्धि के लिए संघर्ष कर रही थी ।
    मूर्ति ने अपने बेटे रोहन मूर्ति की मदद से कंपनी को पुनर्गठित किया जो उनके कार्यकारी सहायक के तौर पर कंपनी से जुड़े थे। इसके तहत मूर्ति ने लागत में कटौती, उत्पादकता बढ़ाने और ग्राहकों के साथ संबंध को पुनर्जीवित करने पर ध्यान केंद्रित किया था। करीब एक साल तक चले इस अभियान के दौरान वी बालकृष्णन एवं अशोक वेमुरी सहित ऐसे आठ शीर्ष अधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया जो शीर्ष पद के लिए शिबुलाल का उत्तराधिकारी बन सकते थे।
    मूर्ति ने बाहर से किसी सीईओ को नियुक्त कर उनके हाथों में इन्फोसिस की कमान सौंपने के लिए भी तैयार हो गए। इसी क्रम में सैप के पूर्व बोर्ड सदस्य विशाल सिक्का को नियुक्त कर कंपनी के नेतृत्व की जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी गई। उसके बाद मूर्ति और उनके बेटे रोहन ने इन्फोसिस के सात सह-संस्थापकों में से अंतिम दो सह-संस्थापकों एस गोपालकृष्णन और वाइस चेयरमैन शिबुलाल के साथ कंपनी से बाहर होने का निर्णय लिया।
    मूर्ति ने सीएनबीसी टीवी18 समाचार चैनल से बातचीत में कहा, 'आप जानते हैं कि 2014 में हमारे कई सह-संस्थापक साथियों ने मुझसे इन्फोसिस को न छोडऩे और कुछ साल और बरकरार रहने के लिए कहा था। सामान्य तौर पर मैं काफी भावुक व्यक्ति हूं और हमारे अधिकतर निर्णय आदर्शवाद पर आधारित हैं लेकिन मुझे संभवत: अपने साथियों को सुनना चाहिए था।' उस समय मूर्ति ने जोर देकर कहा था कि वह कंपनी में अपनी भूमिका निभा चुके हैं। उन्होंने 1981 में अपनी भूमिका शुरू की थी और इन्फोसिस को सॉफ्टवेयर निर्यात करने वाली भारत की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी के तौर पर स्थापित कर दिया। मूर्ति ने इस बाबत जानकारी के लिए भेजे गए ईमेल का कोई जवाब नहीं दिया।
    जब कंपनी की कमान सिक्का को सौंपी जा रही थी तो इन्फोसिस ने देखा कि उसका चेयरमैन केवी कामथ ने एशियाई विकास बैंक से जुड़ने के लिए इस्तीफा दे दिया और जून 2015 में आर शेषशायी को नियुक्त किया गया। इस प्रकार कंपनी के संचालन की जिम्मेदारी गैर-संस्थापक सदस्यों वाले बोर्ड और प्रबंधन को दी गई। लेकिन सबकुछ सही नहीं रहा। पिछले साल से ही मूर्ति कंपनी प्रशासन संबंधी मुद्दों पर चिंता जताने लगे। 
    कंपनी के पूर्व सीएफओ राजीव बंसल और महाधिवक्ता डेविड केनेडी को कंपनी छोड़ने छोडऩे के लिए दिए गए भारीभड़कम पैकेज को लेकर मूर्ति ने चिंता जताई और उन्होंने कंपनी प्रशाशन में चूक को लेकर वर्तमान बोर्ड के चेयरमैन शेषशायी के इस्तीफे की मांग भी कर दी। हालांकि शेषशायी ने कहा कि बोर्ड सभी शेयरधारकों का ट्रस्टी है और कंपनी ने मूर्ति के आग्रह पर इन्फोसिस मेंं उनके पूर्व साथी डीएन प्रहलाद को बोर्ड में शामिल कर लिया। इसके अलावा एक अन्य बोर्ड सदस्य रवि वेंकटेशन को सह-चेयरमैन के तौर पर पदोन्नति दी गई। साथ ही कंपनी ने अपनी नीतियों में भी बदलाव करते हुए कहा कि वह खुलासा संबंधी सभी प्रावधानों का अनुपालन करेगी और कहीं अधिक पारदर्शी बनेगी। हालिया सालाना आम बैठक में इन्फोसिस के शेयरधारकों ने कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए सिक्का के नजरिये का समर्थन किया लेकिन मूर्ति की चिंताओंं पर भी गौर करने के लिए कहा। मूर्ति के शब्दों में कहें तो आंधी अभी थमी नहीं है। (बिजनेस स्टैंडर्ड)

    ...
  •