राष्ट्रीय

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Posted Date : 21-Nov-2017
  • चंडीगढ़, 21 नवम्बर। हरियाणा के पंचकुला में एक जंगल में तीन बच्चों के शव मिलने से सनसनी फैल गई। बच्चों की बेरहमी से हत्या की गई है। पुलिस ने तीनों शव कब्जे में लेकर मामले की जांच पड़ताल शुरू कर दी है।
    पंचकुला के मोरनी जंगल में तीन बच्चों के शव मिलने से हड़कंप मच गया। स्थानीय लोगों ने इस बात की सूचना पुलिस को दी। जगंल में बच्चों की लाश होने की बात सुनकर पुलिस भी फौरन मौके पर पहुंच गई और तीनों शव कब्जे में ले लिए।
    पुलिस के मुताबिक मृतक बच्चों की शिनाख्त कर ली गई है। तीनों बच्चे कुरुक्षेत्र के सारसा गांव के रहने वाले थे। जिनके पहचान 11 वर्षीय समीर, 8 वर्षीय सिमरन और 4 साल के समर के रूप में हुई है।
    हैरानी की बात ये है कि ये बच्चे अपने गांव से ही लापता थे और पुलिस को इनकी हत्या का बच्चों के पिता और चाचा पर ही है। साथ ही पुलिस अवैध संबंधों की खातिर बच्चों की हत्या किए जाने का शक भी जता रही है। हालांकि अभी तक हत्या की वजह साफ नहीं है।  (आज तक)

     

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Posted Date : 21-Nov-2017
  • नई दिल्ली, 21 नवम्बर। दिल्ली के द्वारका मोड़ मेट्रो स्टेशन के पास मंगलवार को हुई मुठभेड़ के बाद पांच बदमाशों को गिरफ्तार किया है। पंजाब और दिल्ली पुलिस ने मिलकर इस ऑपरेशन को अंजाम दिया। 
    पंजाब पुलिस को बिंदापुर में पिलर नंबर 68 के सामने शांति पार्क के प्लाट नंबर 5 की एक इमारत में 5 बदमाशों के छुपे होने की खबर मिली थी। पंजाब पुलिस ने इसकी जानकारी दिल्ली की बिंदापुर पुलिस को दी। इसके बाद पंजाब पुलिस और दिल्ली पुलिस जब बदमाशों को गिरफ्तार करने के लिए गई तो उन्होंने पुलिस पार्टी पर फायरिंग शुरू कर दी।
    इसके बाद पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई में कई राउंड फायरिंग की। करीब 25 से 30 राउंड फायरिंग के बाद पंजाब पुलिस ने 5 बदमाशों को गिरफ्तार कर लिया। जबकि एक बदमाश फरार होने में कामयाब रहा। गिरफ्तार बदमाश कार लुटेरे बताए जा रहे है और पंजाब के मोस्ट वांटेड अपराधी हैं। पुलिस ने गिरफ्तार बदमाशों के पास से 11 कट्टे, 1 पिस्टल और 100 कारतूस बरामद किए हैं। (एनडीटीवी)

     

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Posted Date : 21-Nov-2017
  • नई दिल्ली, 21 नवम्बर । उबल रही कश्मीर घाटी में शांति लौटाने के लिहाज से सरकार की यह योजना सबसे अहम साबित हो सकती है। एक रिपोर्ट में कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के हवाले से जानकारी दी गई है कि जल्द ही कश्मीर में पत्थरबाजों को माफी देने का ऐलान हो सकता है। अधिकारियों ने बताया कि पहली बार पत्थरबाजी करने वालों के खिलाफ किए गए मुकदमों को वापस लिया जा सकता है।
    इस योजना को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारियों के बीच बातचीत हुई है। उम्मीद जताई गई है कि केंद्र की तरफ से विशेष वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा के इस महीने होने वाले दूसरे दौरे से पहले इसकी घोषणा हो सकती है। खुफिया विभाग के पूर्व निदेशक शर्मा को अक्टूबर में कश्मीर हिंसा पर लगातार बातचीत करने के लिए केंद्र सरकार का प्रतिनिधि बनाया गया था। इस बारे में जब उनसे संपर्क किया गया तो उन्होंने बताया कि इस योजना पर काम हो रहा है। हालांकि उन्होंने ज्यादा जानकारी साझा नहीं की। दिनेश्वर शर्मा ने कहा, मैं युवाओं को लेकर चिंतित हूं क्योंकि वे महत्वपूर्ण हैं। मेरा ध्यान इस बात पर है कि उनकी मानसिकता कैसे बदली जाए।
    सरकार उम्मीद लगा रही है कि पहली बार पत्थरबाजी करने वालों के खिलाफ चल रहे मुकदमे वापस लेने से गुस्साए युवाओं को शांत करने में मदद मिलेगी। इसी उद्देश्य के तहत फुटबॉलर से आतंकी बनने चले माजिद खान के खिलाफ भी कोई केस दर्ज नहीं किया जा रहा। माजिद की मां की अपील पर राज्य की पुलिस द्वारा लिए गए इस फैसले को एक अच्छे संकेत के रूप देखा जा रहा है।
    गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया, घाटी के हजारों युवाओं पर प्राथमिकी दर्ज है। एक सकारात्मक संदेश के रूप में हम पहली बार पत्थरबाजी करने वालों के खिलाफ केसों को वापस लेंगे। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी राज्य सरकार से जेल में बंद नाबालिगों को सुधार घर भेजने और उनके मामलों को सहानुभूति के साथ देखने को कहा है।
    अधिकारियों ने बताया कि योजना के बारे में राज्य और केंद्र स्थित सभी पक्षों से बात की गई है। हालांकि यह साफ नहीं है कि इस योजना को लेकर अलगाववादियों का रुख क्या रहेगा। वे कह चुके हैं कि वे सरकार द्वारा शुरू की गई संवाद की प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हैं। दिनेश्वर शर्मा के पहले दौरे के दौरान उन्होंने बातचीत करने से इंकार कर दिया था।(हिंदुस्तान टाईम्स)

     

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Posted Date : 21-Nov-2017
  • नई दिल्ली, 21 नवम्बर । सड़क हादसों में भारत को हर साल मानव संसाधन का सर्वाधिक नुकसान होता है। अंतरराष्ट्रीय सड़क संगठन (आईआरएफ) की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में 12.5 लाख लोगों की प्रति वर्ष सड़क हादसों में मौत होती है। इसमें भारत की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से ज्यादा है। जिनेवा स्थित आईआरएफ के अध्यक्ष के के कपिला ने बताया कि भारत में साल 2016 में 150785 लोग सड़क हादसों में मारे गये। यह किसी भी देश के मानव संसाधन का सर्वाधिक नुकसान है। 
    कपिला ने वैश्विक स्तर पर मानव संसाधन के नुकसान को कम करने के लिये आईआरएफ की ओर से हर साल नवंबर के तीसरे सप्ताह में मनाये जाने वाले सड़क सुरक्षा सप्ताह के मौके पर यहां यह जानकारी दी।
    सड़क दुर्घनाओं में बुरी तरह घायल हुए और मौत के मुंह से वापस लौटे लोगों द्वारा सड़क सुरक्षा सप्ताह मानने की कवायद साल 1993 में वैश्विक स्तर पर शुरू की गयी थी, जिसे साल 2005 में संयुक्त राष्ट्र ने भी मान्यता प्रदान की थी। कपिला ने सड़क दुर्घनाओं से हुए नुकसान का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुये कहा कि दुनिया भर में वाहनों की कुल संख्या का महज तीन प्रतिशत हिस्सा भारत में है, लेकिन देश में होने वाले सड़क हादसों और इनमें जान गंवाने वालों के मामले में भारत की हिस्सेदारी 12.06 प्रतिशत है।
    उन्होंने बताया कि इस कवायद का मकसद सड़क हादसों को कम करने में सरकारों के अलावा जागरुकता के माध्यम से जनता की भागीदारी सुनिश्चित करना है। कपिला ने कहा, संयुक्त राष्ट्र ने इस मुहिम के माध्यम से साल 2020 तक सड़क हादसों में 50 प्रतिशत तक की कमी लाने का लक्ष्य तय किया है। इसमें भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुये आईआरएफ ने भारत 

    सरकार के साथ यातायात नियमों को दुरुस्त कर इनका सख्ती से पालन सुनिश्चित करने में जनजागरुकता की पहल की है।
    उन्होंने कहा कि भारत को सड़क हादसों के कारण मानव संसाधन के साथ भारी मात्रा में आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। आईआरएफ के अध्ययन के मुताबिक भारत में सड़क हादसों में गंभीर रूप से घायल हुये पीडि़त को औसतन पांच लाख रुपये के खर्च का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ता है। इससे पीडि़त के अलावा समूचा परिवार प्रभावित प्रभावित होता है।(भाषा)

     

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Posted Date : 21-Nov-2017
  • लुधियाना, 21 नवम्बर। लुधियाना  फैक्ट्री में आग लगने से गिरी 6 मंजिला इमारत के मलबे से अब तक 10 लोगों के शवों को निकाला जा चुका है।  पुलिस का कहना है कि अभी इमारत के मलबे में 15 से ज्यादा लोगों दबे होने की आशंका है। ऐसे में मृतकों की संख्या बढ़ सकती है। दबने वाले लोगों में करीब 6-7 फायरब्रिगेडकर्मी भी शामिल हैं। फायरब्रिगेडकर्मी आग बुझा रहे थे, तभी इमारत गिर गई और वे उसमें दब गए।  
    वहीं आगजनी के बाद फैक्टरी के अंदर गए 4 दोस्तों में से 1 शव मिला है, जबकि बाकी के बारे में कुछ पता नहीं चल पाया है। जानकारी देते हरवीर सिंह ने बताया कि वह फैक्टरी मालिक इंद्रजीत सिंह का दोस्त है। सुबह आगजनी के बाद इंद्रजीत के दोस्त भावाधस के लक्ष्मण द्रविड़ और इंद्रपाल सिंह भी वहां आ गए। हम चारों फैक्टरी के अंदर गए। पहली मंजिल पर जाते ही इतना ज्यादा धुआं देख मैं और फैक्टरी मालिक बाहर आ गए। अभी आकर खड़े ही हुए थे कि एकदम से धुआं हो गया और 2 दोस्त अंदर रह गए। जिसमें से एक की मौत हो गई, जिसका शव कुछ समय बाद मिला है।
    मौके पर मौजूद पुलिस फोर्स को बचाव प्रबंधों से ज्यादा पब्लिक को मैनेज करने में जोर लगाते देखा जा सकता था। लोगों की मिन्नतें करने के बावजूद वे इमारत के आसपास खड़े रहे और दृश्य देखते रहे। मौके पर बचाव कार्यों में लगे कर्मियों और एंबुलैंस को आने-जाने में भी दिक्कत का सामना करना पड़ा।
    निगम अफसरों की मानें तो बिल्डिंग 20 साल से भी ज्यादा पुरानी यानी कि 1997 से पहले की बनी है। उस समय बिल्डिंग बायलाज लागू नहीं थे, जिसमें बिल्डिंग की कवरेज व पार्किंग के लिए छोड़ी जाने वाली जगह तय की गई है।  
    अगर इस बिल्डिंग को दो दशक से भी पुराना बताया जा रहा है तो यह भी सवाल पैदा होता है कि क्या उसकी मजबूती को लेकर संबंधित विभाग द्वारा कभी कोई चैकिंग की गई। इसे लेकर जोन बी के एटीपी का कहना है कि नक्शा पास होने पर बिल्डिंग बनने के बाद 

    उसकी रैगुलर चैकिंग करने का प्रावधान एक्ट में नहीं है।
    जहां तक बिल्डिंग के मजबूत होने बारे स्ट्रक्चर सेफ्टी सर्टीफिकेट लेने का सवाल है, वह नक्शा पास करवाने से पहले लिया जाता है। इसमें आर्कीटैक्ट द्वारा प्रस्तावित प्लान के स्ट्रक्चर की मजबूती वाला डिजाइन बनाने की गारंटी दी जाती है लेकिन बाद में यह चैकिंग करने का कोई प्रावधान नहीं है कि बिल्डिंग का स्ट्रक्चर डिजाइन उस पर पडऩे वाला लोड उठाने के काबिल है या नहीं। 
    निगम द्वारा जब भी किसी बिल्डिंग का नक्शा पास किया जाता है तो फायर सेफ्टी प्रबंधों के लिए प्रोवीजनल एनओसीली जाती है, जिसका मतलब यही होता है कि प्रस्तावित प्लान में फायर सेफ्टी के प्रबंध किए जाएंगे लेकिन बाद में कोई चैकिंग नहीं होती कि मौके पर फायर सेफ्टी के कोई प्रबंध थे भी या नहीं। इसकी बड़ी वजह कम्प्लीशन प्लान नहीं लेने का रिवाज भी है क्योंकि अगर कम्प्लीशन सर्टीफिकेट अप्लाई किया जाएगा तो ही पता चलेगा कि मौके पर फायर सेफ्टी प्रबंध कर लिए गए हैं लेकिन यहां अधिकतर बिल्डिंगें तो नक्शा पास करवाए बिना ही बनती हैं। जिन पर कम्प्लीशन सर्टीफिकेट लेने का नियम ही लागू नहीं होता और जो नक्शा पास करवाकर बनती है, उनके पूरा होने के बाद निगम द्वारा फायर सेफ्टी प्रबंधों की कोई चैकिंग नहीं की जाती। (पंजाब केसरी)

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Posted Date : 21-Nov-2017
  • मुंबई, 21 नवम्बर । हमारे आसपास आए-दिन कई ऐसे घटनाएं होती रहती हैं कि दुख और खीझ से भर जाता है। साथ ही हैरानी होती है कि कोई ऐसा कैसा कर सकता है। खास तौर पर अगर मामला बच्चों से जुड़ा हो तो अजीब सी घबराहट और बेचैनी होने लगती है। लेकिन फिर ऐसे भी लोग होते हैं जो अपने नेक इरादों और फैसलों से इंसानियत में हमारा विश्वास फिर से कायम कर देते हैं। ऐसा ही कुछ मुंबई के एक लड़के ने साबित करके दिखाया है। इस लड़के ने मुंबई पुलिस की मदद से एक लावारिस नवजात बच्ची को मौत के मुंह में जाने से बचा लिया। 
    रविवार रात ट्विटर यूजर जुगाडू बंदा ने तीन या पांच दिन की बच्ची की कुछ तस्वीरें ट्विटर पर ट्वीट 

    करते हुए बताया कि उन्हें बच्ची मुंबई के एक बंद ऑटो रिक्शा में लावारिस हालत में मिली। 
    अमन के इस ट्वीट पर कई लोगों ने उन्हें राय दी कि उन्हें पुलिस को बताना चाहिए। हालांकि अमन का कहना था कि उन्हें पुलिस रिस्पॉन्स नहीं कर रही है और बच्ची की हालत बिगड़ती जा रही है। 
    पुलिस के रिस्पॉन्स न देने पर एक अन्य ट्विटर यूजर ने मुंबई पुलिस के ट्विटर हैंडल पर ट्वीट करते हुए मामले को तुरंत संज्ञान में लेने की गुहार लगाई। इसे सोशल मीडिया की ताकत ही कहेंगे कि ट्वीट पर मुंबई पुलिस तुरंत हरकत में आ गई। 
    मुंबई पुलिस के ट्वीट के तुरंत बाद अमन ने एक और फोटो शेयर की जिसमें बच्ची महिला कॉन्स्टेबल की बाहों में थी। इसके बाद कई लोग अमन को ट्वीट कर बच्ची की सेहत और सुरक्षा के बारे में पूछताछ करने लगे।
    अच्छी बात यह है कि सही देखभाल और दूध मिलने के बाद बच्ची की सेहत में तुरंत सुधार होने लगा और उसने कांपना भी बंद कर दिया। फिलहाल सोमवार सुबह बच्ची को अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है। अमन अब बच्ची को किसी अनाथ आश्रम में भेजने की व्यवस्था कर रहा है, और तो और मुंबई पुलिस ने भी अमन की तारीफ करते हुए कहा है कि वह बच्ची के पास देव दूत बनकर पहुंचा था। (एनडीटीवी)

     

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Posted Date : 21-Nov-2017
  • हैदराबाद, 21 नवम्बर। तीन तलाक को लेकर सुप्रीम कोर्ट भले ही इसे गैरकानूनी बता चुका है। लेकिन फिर भी देशभर में तीन तलाक के मामले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। तीन तलाक का ऐसा ही एक मामला हैदराबाद से सामने आया है। जहां शादी के एक महीने बाद ही शौहर ने अपनी बीवी को फोन कर तीन तलाक दे दिया। पीडि़ता की तहरीर के आधार पर पुलिस ने शिकायत दर्ज कर ली है।
    हैदराबाद की अथिया बेगम नाम का महिला ने बताया कि उसकी शादी को एक महीना हुआ है। महिला का आरोप है कि उसका पति शेख सरदार मजहर 13 नवंबर को घर से बाहर गया। इसके कुछ घंटे बाद उसने फोन किया और उसे तीन तलाक दे दिया।
    पीडि़त आथिया के अनुसार, उसके पति ने कहा कि वो उसके साथ रहना नहीं चाहता है, उसने एक और लड़की से शादी की थी। अथिया ने कहा, मेरी शादी से पहले, मैंने उसे लगभग 2 लाख रुपये दिए थे। यहां तक कि लगभग 6 लाख रुपये खर्च भी किए। अब मैं चाहती हूं कि उसे दंडित किया जाए। पीडि़ता ने कुल्लमपुरा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है।
    कोर्ट द्वारा तीन तलाक को गैरकानूनी साबित करने के बाद भी लगातार देशभर में तीन तलाक के केस सामने आ रहे हैं। इससे पहले अलीगढ़ में भी एक ऐसा केस देखने में आया था। जहां एएमयू के प्रोफेसर की पत्नी ने आरोप लगाया था उसके पति ने उसे शादी के कई साल बाद तीन तलाक दिया है। हालांकि पति ने इस आरोप को गलत बताया था।  (न्यूज 18)

     

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Posted Date : 21-Nov-2017
  • भोपाल, 21 नवम्बर । मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राजपूत रानी पद्मावती को राष्ट्रमाता कहा है। हालांकि पद्मावती के ऐतिहासिक किरदार होने पर विवाद भी है। कुछ इतिहासकारों का मत है कि पद्मावती मलिक मोहम्मद जायसी की कल्पना थीं जबकि कुछ उन्हें ऐतिहासिक किरदार मानते हैं।
    एक सभा को संबोधित करते हुए शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि ऐतिहासिक तथ्यों से खिलवाड़ कर अगर राष्ट्रमाता पद्मावती जी के सम्मान के खिलाफ जिस फिल्म में दृश्य दिखाए गए या बात कही गई है उस फिल्म का प्रदर्शन मध्य प्रदेश की धरती पर नहीं होने दिया जाएगा।
    शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि ये बात में भावनाओं में बहकर नहीं कर रहा हूं। राष्ट्र के अपमान को ये देश कभी स्वीकार नहीं करेगा, मध्य प्रदेश स्वीकार नहीं करेगा।
    शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश में पद्मावती के नाम पर महिलाओं के लिए नया अवॉर्ड भी घोषित किया है। पद्मावती अवॉर्ड उन महिलाओं को दिया जाएगा जिन्होंने किसी भी क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया हो।
    भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के नेता मोहनदास करमचंद गांधी को भारत में राष्ट्रपिता कहा जाता है, लेकिन राष्ट्रमाता किसी को नहीं कहा जाता है। 

    हालांकि भारत देश को ही बहुत से लोग भारत मां कहकर संबोधित करते हैं।
    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बयान में कहा था कि वो चाहते हैं कि गाय को राष्ट्र मां का दर्जा दिया जाए। संजय लीला भंसाली निर्देशित पीरियड फिल्म पद्मावती को लेकर शुरू हुआ विरोध अब राष्ट्रव्यापी हो गया है। इसी के मद्देनजर निर्माताओं ने एक दिसंबर को होने वाली प्रस्तावित रिलीज भी टाल दी है।
    इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म के विवादित दृश्य हटाने की मांग करने वाली याचिका को यह कहते खारिज कर दिया है कि वह सीबीएफसी (केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड) के काम में दखल नहीं दे सकता है। अभी सेंसर बोर्ड (सीबीएफसी) ने ये फिल्म नहीं देखी है।
    फिल्म में पद्मावती का किरदार निभा रहीं दीपिका पादुकोण और निर्देशक संजय लीला भंसाली को कई तरह की धमकियां भी दी हैं। इनमें दीपिका की नाक काटने पर इनाम भी शामिल है।
    पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने फिल्म का समर्थन करते हुए ट्वीट किया कि पद्मावती विवाद न सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि ये एक राजनीतिक दल की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नष्ट करने की सोची समझी साजिश है। हम इस सुपर आपातकाल की आलोचना करते हैं। फिल्म उद्योग से जुड़े सभी लोगों को सामने आकर एक सुर में विरोध करना चाहिए।
    वहीं पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने प्रदर्शनकारियों का समर्थन करते हुए कहा है कि कोई भी इतिहास से छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं करेगा, जो प्रदर्शन कर रहे हैं वो सही कर रहे हैं।
    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के बयान पर ट्विटर पर खूब प्रतिक्रियाएं भी आ रही हैं। आम आदमी पार्टी की विधायक अलका लांबा ने ट्विटर पर लिखा कि तेरी माँ, मेरी माँ, गाय माँ, भारत माँ और अब पद्मावती बनी बीजेपी के लिए राष्ट्र माँ।
    आनंद प्रभात ने लिखा है कि शिवराज चौहान ने पद्मावती को राष्ट्रमाता बताया है। ये वहीं हैं जिन्होंने कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश की सड़कों को अमरीका की सड़कों से बेहतर बताया था।
    रिशिका नेगी ने लिखा कि पद्मावती अभी अभी उन्हें राष्ट्रमाता का दर्जा मिला है मध्यप्रदेश के श्री शव राज मामा से। जय हो फर्जी राष्ट्रमाता वालों। 
    तनिश्क रघुवंशी ने शिवराज के बयान का समर्थन करते हुए लिखा कि वो राजपूत थी उनके साथ जो 16,000 औरतें थीं वो तो और जातियों की रहीं होंगी इसलिए राजपूत या किसी जाति विशेष से उपर उठकर ऐसी माता को सम्मान देना चाहिए।
    वो राजपूत थी उनके साथ जो 16000 थी वो तो और जाति की रहीं होंगी इसलिए राजपूत या किसी जाति विशेष से उपर उठकर ऐसी माता को सम्मान देना चाहिए? जैसा कि चौहान शिवराजजी ने कहा।
    मध्य प्रदेश में पद्मवाती फिल्म की रिलीज को रोकने के शिवराज सिंह चौहान के ऐलान पर प्रतिक्रिया देते हुए चिरंजीवी गडकरी ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने पद्मावती को रोकने की याचिका को खारिज कर दिया है लेकिन शिवराज सिंह चौहान को लगता है कि वो सुप्रीम कोर्ट से भी ऊपर हैं। ये प्रतिबंध प्रजातंत्र के खिलाफ है। पद्मावती के नाम पर बहुत गंदी राजनीति हो रही है।
    वीरेंद्र मित्तल ने लिखा कि फिल्म पद्मावती की रिलीज पर रोक लगा कर आदरणीय शिवराज चौहान ने राजपूतों और हिंदुत्व का गौरव बढ़ाया है। 
    फिल्म पद्मावती की रिलीज पे रोक लगा है आदरणीय चौहान शिवराजजी ने राजपूतों ओर हिंदुत्व का गौरव बढ़ाया है उसके लिए में दिल से उनका धन्यवाद करता हूं।(बीबीसी)

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Posted Date : 21-Nov-2017
  • नितिन श्रीवास्तव

    म्यांमार, 21 नवम्बर । दोपहर हो चली है और सितवे हवाई अड्डे पर आधे घंटे से पुलिस वालों की पूछताछ जारी है। मैं रखाइन क्यों जाना चाहता हूँ? कैमरे में क्या लेने आया हूँ? मेरे पासपोर्ट में बांग्लादेश का वीजा क्यों लिया गया था? मेरा ध्यान घड़ी पर ज्यादा है क्योंकि रखाइन की राजधानी सितवे के बाहर रोहिंग्या हिंदुओं के रेफ्यूजी कैंप पहुँचने की जल्दी है। पहुँचते-पहुँचते साढ़े चार बज चुके हैं, हल्की बारिश शुरू हो चुकी है और एक पुराने मंदिर के बगल में कुछ टेंट गड़े हुए हैं। लेकिन नजर एक महिला पर टिक जाती है जिसकी आँखों में नमी है और जो हमें उम्मीद से देख रही है।
    40 वर्ष की कुकू बाला हाल ही में माँ बनी हैं और उनका बेटा सिर्फ ग्यारह दिन का है। ये रोहिंग्या हिंदू हैं और रखाइन प्रांत में इनकी आबादी दस हजार के करीब है। कुकू बाला बात करते हुए बिलख-बिलख कर रो पड़ीं।
    उन्होंने कहा कि मेरे पति और मेरी आठ साल की बेटी काम के लिए दूसरे गाँव गए थे। शाम को मेरी बहन के पास बंगाली चरमपंथियों का फोन आया कि दोनों की कुर्बानी दे दी गई है और हमारे साथ भी यही होगा। मुझे समझ में नहीं आया क्या करूँ। घर के अंदर छिपी रही और तीन दिन बाद फौज हमें यहाँ लेकर आई।
    म्यांमार सरकार का कहना है कि मुस्लिम चरमपंथियों ने 25 अगस्त के हमले में कई हिंदुओं को मार दिया था। देश की फौज ने इसी तरह की दर्दनाक कहानियों को आधार बनाते हुए रखाइन में जारी कार्रवाई को जायज ठहराने की कोशिश की है।
    इस राज्य से छह लाख से भी ज्यादा रोहिंग्या मुसलमान भाग कर पडोसी बांग्लादेश में शरण ले चुके हैं। उन्होंने म्यांमार सरकार पर हत्याएं और बलात्कार के आरोप लगाए हैं। हिंसा की शुरुआत अगस्त में हुई थी जब मुस्लिम चरमपंथियों ने 30 पुलिस थानों पर हमला किया था। 
    इसके जवाब में म्यांमार सरकार की कड़ी कार्रवाई को संयुक्त राष्ट्र ने नस्ली जनसंहार बताया है।
    महीनों से जारी हिंसा में कुकू बाला और उनके बच्चे हाशिए पर आ चुके हैं। उन्होंने कहा कि अगर मेरे पति जिंदा होते तो इस बच्चे का नाम वही रखते। मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊं? मेरी बेटी और पति की लाश तक नहीं मिली है। क्या उन्हें ढूँढने में आप मेरी मदद करेंगे?
    रखाइन राज्य की राजधानी सितवे में करीब सात सौ हिंदू परिवारों को एक सरकारी रेफ्यूजी कैंप में रखा गया है। मुआंग्डो और रखाइन में हिंसा भड़कने पर रोहिंग्या हिंदू कई दिशाओं में भागे थे। सितंबर में बांग्लादेश के कुतुवर्षोंग इलाके में मेरी मुलाकात अनिका धर से हुई थी जो म्यांमार के फकीरा बाजार की रहने वाली हैं।
    पति की हत्या के बाद भागीं अनिका ने मुझे बताया था कि ये हत्या काले नकाब पहने हमलावरों ने की थी। उन्होंने हमलावरों की पहचान न होने की बात कई दफा दोहराई थी। काफी ढूँढने के बाद यहाँ सितवे में मुझे अनिका के जीजा मिले जिन्होंने परिवार की हत्याओं के लिए बंगाली चरमपंथियों को जिम्मेदार ठहराया।
    आशीष कुमार ने बताया कि मेरी बेटी की तबीयत खराब थी इसलिए मैं उसे फकीराबाजार इलाके में अपने ससुराल छोड़ मुआंग्डो आ गया था। अनिका के पति और सास-ससुर के साथ हत्यारे मेरी बेटी को जंगल ले गए और मार डाला। जब बांग्लादेश में अनिका से संपर्क हुआ तब पता चला कि उनकी हत्या किस जगह हुई थी।
    आशीष की बेटी आठ वर्ष की थी। उन्होंने मुझे वो वीडियो दिखाए जिसको म्यांमार सरकार हिंदुओं की सामूहिक कब्र बता रही है। इसी वर्ष अगस्त में हुई इन हत्याओं के महीने भर बाद आशीष उन लोगों में शामिल थे जिन्हे फौज अंतिम संस्कार करवाने के लिए ले गई थी। अधिकारियों का कहना है कि यहाँ से 28 शव बरामद हुए थे।
    आशीष ने कहा कि पूरे इलाके में बदबू फैली हुई थी और हमने घंटों खुदाई की। हाथ के कड़े और गले में पहनने वाले काले-लाल रेशम के धागे की वजह से मैं उसे पहचान सका। म्यांमार की स्टेट काउंसलर आंग सान सू ची ने हाल ही में रखाइन प्रांत का दौरा कर हालात का जायजा लिया था। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने रोहिंग्या संकट मामले पर उनकी लंबी चुप्पी की कड़ी निंदा की है।
    इस बात को साबित करना बहुत मुश्किल है कि सामूहिक कब्र में मिले लोगों की हत्या किसने की थी। इस बात को भी साबित करना नामुमकिन-सा है कि इस पूरे प्रकरण में सरकार की भूमिका कितनी सही रही है। मुश्किल से रखाइन पहुँचने के बाद उत्तरी हिस्से में जाने की हमारी तमाम गुजारिशों को सरकार ने साफ मना कर दिया।
    लेकिन एक बात साफ है। रोहिंग्या मुस्लिमों की तरह अपने घर और करीबी रिश्तेदार गंवाने वाले इस प्रांत के हिंदू नागरिक एकाएक बढ़ी हिंसा में पिस कर रह गए हैं। इसमें शक नहीं कि सरकार से मिलती मदद के चलते रोहिंग्या हिंदुओं को उनसे जोड़ कर देखा जाता है।
    अधिकारियों की नजरों के बीच रोहिंग्या हिंदू भी सरकारी मदद की तारीफ करते हैं। एक दोपहर, मैं अपने ऊपर नजर रखने वालों से बचते हुए कुछ रोहिंग्या हिंदुओं से मिलने गया। उन्हें खुल कर बात करने में देर नहीं लगी।
    मुआंग्डो से भाग कर आए नेहरू धर ने बताया कि हम लोग डरे हुए हैं क्योंकि जो मुस्लिमों के साथ हो रहा है वो हमारे साथ भी हो सकता है। सरकार ने हमें पहचान वाले कार्ड तो दिए हैं, लेकिन वो हमें नागरिकता नहीं देती। न हमें सरकारी नौकरी मिलती हैं और न ही हम देश के सभी हिस्सों में जा सकते हैं। अगर हमने मांगें रखीं तो मुझे डर है, अगला नंबर हमारा होगा।
    खौफ हर जगह दिखता है। च्या विन रोहिंग्या मुसलमानों के हित की बात करने वाले लीडर हैं और सांसद भी रह चुके हैं। उन्हें म्यांमार सरकार के दावों पर शक है जिसमें कहा गया कि सामूहिक कब्र में मिले लोगों की हत्या मुस्लिम चरमपंथियों ने की है।
    उन्होंने कहा कि रखाइन में आरसा ग्रुप से संबंधित मुस्लिम चरमपंथी अवैध हैं और गलत गतिविधियों में भाग लेते हैं। लेकिन अगर इन जघन्य हत्याओं के पीछे उनका हाथ है भी, तब भी उनके पास इतना समय कहाँ होगा कि वारदात के बाद कब्रें खोदें और फिर उन्हें ढकें। ये लोग हमेशा भाग रहे होते हैं और छिप रहे होते हैं।
    उधर म्यांमार की सरकार इन दावों को खारिज करती है कि रखाइन में रहने वाले रोहिंग्या हिंदू, सरकार और चरमपंथियों- दोनों के खौफ में जी रहे हैं। सरकार उन्हें बचाने के साथ-साथ सही पहचान होने पर उन्हें नागरिकता देने की भी बात करती रही है।
    म्यांमार के केंद्रीय समाज कल्याण मंत्री विन म्यात आए ने बताया कि रखाइन में हिंसा से बहुत लोग प्रभावित हुए हैं और चरमपंथियों ने हिंदुओं को भी मारा। मुझे नहीं पता कुछ बांग्लादेश क्यों भागे? शायद डर के चलते इधर-उधर भाग गए थे, लेकिन अब वे वापस आ गए हैं।
    उधर अनिका धर अब म्यांमार लौट आईं हैं। हालांकि अभी सरकार ने उन्हें मीडिया से दूर रखा है। अनिका का बच्चा अब अस्पताल में पैदा हो सकेगा। लेकिन कुकू बाला और उनके तीन बच्चों के लिए मुश्किलें कम नहीं। हमारी मुलाकात के कुछ दिन बाद उन्हें उनके गाँव वापस भेज दिया गया। रखाइन में हालात चिंताजनक हैं। जो वापस भेजे दिए गए, उन्हें भी नहीं पता, उन पर अगला हमला कौन करेगा।(बीबीसी)

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Posted Date : 21-Nov-2017
  • कोलंबो, 21 नवम्बर (बीबीसी)। श्रीलंका के गॉल में साप्रंदायिक तनाव की स्थिति बनी हुई है। एक तरफ बौद्ध हैं तो दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय। खराब हालात का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पुलिस को गॉल में दो बार कफ्र्यू लगाना पड़ा। पुलिस को गॉल में 19 लोगों की गिरफ्तारी की है और दावा किया है कि हालात पर काबू कर लिया गया है।
    सांप्रदायिक तनाव की शुरुआत उस समय से हुई जब एक मोटरसाइकिल सवार बौद्ध ने एक मुस्लिम महिला को सड़क पर ठोकर मार दी। पुलिस ने अफवाह फैलाने के आरोप में एक महिला को गिरफ्तार भी किया है जो कथित तौर पर ये कह रही थी कि मुसलमान एक बौद्ध मठ पर हमला करने वाले हैं।
    इस साल दोनों समुदाय के बीच तनाव की स्थिति बढ़ती हुई लग रही है। कुछ कट्टरपंथी बौद्ध समूहों ने मुसलमानों पर जबरन धर्म परिवर्तन कराने और बौद्ध मठों को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया।
    पिछले दो महीने के भीतर गॉल में मुसलमानों की मिल्कियत वाली कंपनियों और मस्जिदों पर हमले की 20 से ज्यादा घटनाएं हो चुकी हैं। साल 2014 में कट्टरपंथी बौद्ध गुटों ने तीन मुसलमानों की हत्या कर दी थी जिसके बाद गॉल में दंगे भड़क गए। साल 2013 में कोलंबो में बौद्ध गुरुओं के नेतृत्व में एक भीड़ ने कपड़े के एक स्टोर पर हमला कर दिया था।
    कपड़े की ये दुकान एक मुस्लिम की थी और हमले में कम से कम सात लोग घायल हो गए थे। श्रीलंका की आबादी दो करोड़ दस लाख के करीब है और इसमें 70 फीसदी बौद्ध हैं और 9 फीसदी मुसलमान।
    साल 2009 में सेना के हाथों तमिल विद्रोहियों की हार के बाद से श्रीलंका का मुस्लिम समुदाय एक तरह से सियासी फलक से दूर रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में मुस्लिम समुदाय के खिलाफ धर्म के नाम पर हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं। इस हिंसा के लिए बौद्ध गुरुओं को जिम्मेदार ठहराया जाता है।
    लेकिन बौद्धों के निशाने पर मुसलमान क्यों?
    बौद्ध धर्म को दुनिया में शांति और अहिंसा के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है। अहिंसा के प्रति बौद्ध मान्यताएं उसे अन्य धर्मों से अलग बनाती है।
    फिर सवाल उठता है कि मुसलमानों के खिलाफ बौद्ध हिंसा का सहारा क्यों ले रहे हैं। ऐसा ही स्थिति हिंद महासागर से अलग होने वाले दो देशों में हो रहा है। पहला तो श्रीलंका है और दूसरा म्यांमार या बर्मा।
    ये बात भी किसी पहेली से कम नहीं है कि दोनों देशों को इस्लामी चरमपंथियों से कोई खतरा नहीं है और दोनों ही देशों में मुसलमान एक छोटे सा अल्पसंख्यक समुदाय है। श्रीलंका में मुसलमानों का मुस्लिम परंपरा के तहत मांसाहार या पालतू पशुओं को मारना बौद्ध समुदाय के लिए एक विवाद का मुद्दा रहा है।
    श्रीलंका में कट्टरपंथी बौद्धों ने एक बोडु बला सेना भी बना रखी है जो सिंहली बौद्धों का राष्ट्रवादी संगठन है। ये संगठन मुसलमानों के खिलाफ मार्च निकालता है। 

    उनके खिलाफ सीधी कार्रवाई की बात करता है और मुसलमानों द्वारा चलाए जा रहे कारोबार के बहिष्कार का वकालत करता है। इस संगठन को मुसलमानों की बढ़ती आबादी से भी शिकायत है।
    बर्मा में हालात ज्यादा गंभीर हैं। वहां कट्टरपंथी बौद्धों की अगुवाई अशीन विराथु कर रहे हैं। धार्मिक तनाव बढ़ाने के आरोप में उन्हें 2003 में जेल भेजा गया लेकिन 2010 में वे रिहा कर दिए गए। जब उनसे ये पूछा गया कि क्या वे च्बर्मा के बिन लादेनज् हैं, उन्होंने कहा कि वे इससे इंकार नहीं करेंगे।
    ये समझना अपने आप में महत्वपूर्ण है कि मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की शुरुआत अक्सर उनके दुकानों से होती है। श्रीलंका और बर्मा दोनों में ही ऐसा लगता है कि बहुसंख्यक समुदाय के आर्थिक असंतोष और टूटती उम्मीदों का शिकार अल्पसंख्यक समाज को बनना पड़ता है।
    मुसलमानों के खिलाफ होने वाली हिंसा को लेकर दी जाने वाली तमाम दलीलें बौद्ध धर्म के संदेशों से मेल नहीं खाती हैं। बर्मा और श्रीलंका दोनों में ही ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलनों में बौद्ध धर्म की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
    दोनों ही देशों में बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि बौद्ध धर्म उनकी राष्ट्रीय पहचान का एक हिस्सा है और दोनों ही देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर सवाल उठते रहे हैं। साल 1983 में श्रीलंका में सिंहलियों और तमिलों के बीच नस्लीय तनाव की वजह से गृह युद्ध भड़क गया।
    इस गृह युद्ध में भी मुसलमान तमिल विद्रोहियों का निशाना बनते रहे। और तमिल विद्रोहियों की सेना के हाथों हार के बाद अब ऐसा लगता है कि बहुसंख्यकों को एक नया टारगेट मिल गया है।
    बर्मा और श्रीलंका में बौद्ध चरमपंथियों और सत्तारूढ़ पार्टियों के बीच के संबंध को लेकर तस्वीर बहुत ज्यादा साफ नहीं है। श्रीलंका के पूर्व रक्षामंत्री जुटापाया राजपक्षे बौद्ध गुरुओं को राष्ट्र, धर्म और नस्ल का संरक्षक करार देते हैं। दोनों ही देशों में बौद्ध समुदाय का एक तबका देश के एकीकरण की बात तो करता है लेकिन साथ ही उन्हें ये भी लगता है कि उनका धर्म खतरे में है। (बीबीसी)

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Posted Date : 20-Nov-2017
  • इस महिला पुलिसकर्मी की तस्वीर इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। जिसे यूजर्स पंजाब पुलिस की नई एसएचओ बता रहे हैं। महिला की खूबसूरती को लेकर लोग तरह-तरह की चर्चाएं कर रहे हैं।
    फोटो में पंजाब पुलिस यूनिफार्म में दिख रही महिला को लोग पंजाब पुलिस की हरलीन कौर बता रहे हैं, लेकिन फोटो के पीछे की सच्चाई कुछ और है।
    दरअसल, यह फोटो एक्ट्रेस कायनात अरोरा की है। वे पंजाबी फिल्म जग्गा जेउंदा है के लिए पंजाब पुलिस के गेटअप में है। इस बारे में उन्होंने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर भी लिखा है कि मेरी फोटो पंजाब पुलिस की एसएचओ बताकर शेयर की जा रही है, जो गलत है।
    बताया जा रहा है कि शूटिंग के दौरान किसी ने उनकी फोटो खींचकर सोशल मीडिया पर यह कहते हुए डाल दी कि यह पंजाब पुलिस की नई एसएचओ है।
    सोशल मीडिया पर कायनात के फोटो के आते ही पोस्ट वायरल हो गई और ट्विटर, फेसबुक समेत व्हाट्सऐप पर इसे शेयर किया जाने लगा।
    कायनात ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत 2010 में अक्षय कुमार की फिल्म खट्टा- मीठा से की थी। इसके बाद वे 2013 में फिल्म ग्रैंड मस्ती से सुर्खियों में आई थी। अब तक वे मलयालम फिल्म लैला ओ लैला, तमिल की मनकथा समेत पंजाब फिल्म फरार में नजर आ चुकी है। फिलहाल वे आने वाली पंजाब फिल्म जग्गा जेउंदा है में पुलिस के किरदार में दिखाई देंगी। (आज तक)

     

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Posted Date : 20-Nov-2017
  • श्रीनगर, 20 नवम्बर। देश के इतिहास में शायद यह पहला मौका होगा जब सुरक्षा एजेंसियां खुले तौर पर आतंक का रास्ता छोडऩे वाले लोगों की मदद कर रही हैं। सीआरपीएफ की ओर से एक हेल्प लाइन नंबर जारी किया गया है जिसके जरिए घाटी में सरेंडर की चाह रखने वाले युवा एजेंसी की मदद ले सकते हैं। सीआरपीएफ इसके लिए 14411 नंबर से एक टोल फ्री हेल्प लाइन जारी की है।
    आतंकी की राह से लौटने में मदद करने वाली इस हेल्प लाइन को मददगार का नाम दिया गया है। यह उन भटके हुए युवाओं की मदद करेगी जो घाटी में आतंक की राह पर चल पड़े हैं और अब वापस मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं। यह कदम फुटबॉलर से आतंकी बने माजिद के सरेंडर के बाद उठाया गया है जो दो दिन पहले ही आतंकियों का साथ छोड़ वापस अपने घर लौटा है।
    सीआरपीएफ के इंस्पेक्टर जनरल जुल्फिकार हसन ने जानकारी देते हुए कहा, मुझे लगता है कि काफी युवा वापस आना चाहते हैं, मैं उन सभी भरोसा दिलाना चाहता हूं कि वह खुले तौर पर आतंक की राह से वापस आ सकते हैं। सीआरपीएफ ने इसी साल जून में कश्मीरी नागरिकों की मदद के लिए यह हेल्प लाइन जारी की थी, अब इस दिशा में भी इसका विस्तार किया जा रहा है।
    आईडी हसन ने बताया कि यह हेल्प लाइन पुलिस और सेना दोनों की है। साथ ही आतंकियों समेत उनके परिजन, दोस्त भी वापसी के लिए इसकी मदद ले सकते हैं। उन्होंने भरोसा दिलाया कि एजेंसी किसी भी तरह से उन्हें प्रताडि़त नहीं करेगी।   
    रविवार को भी लेफ्टिनेंट जनरल जे एस संधू ने कहा, स्थानीय आतंकवादियों को यह एहसास होना चाहिए कि खुद को मुजाहिद कहना बहुत आसान है लेकिन क्या आप मुजाहिद हैं, या पाकिस्तान के लिए एक प्रॉक्सी? मुख्यधारा में वापस आओ, इससे घाटी में शांति की वापसी होगी। हम उन्हें सम्मानपूर्वक वापस लेने के लिए तैयार हैं।
    सरकार और सुरक्षाबलों की कोशिशों के बीच घाटी के युवा माजिद के बाद आतंक का रास्ता चुनने वाले एक और युवक ने घर वापसी की है। साउथ कश्मीर के रहने वाले एक युवक ने परिजनों की अपील पर वापस घर लौटने का फैसला किया है। हालांकि सुरक्षा कारणों की वजह से पुलिस ने उसका नाम और जानकारी सार्वजनिक करने से इंकार किया है। (आज तक)

     

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Posted Date : 20-Nov-2017
  • नई दिल्ली, 20 नवम्बर । मेघालय के मावलिननोंग को 2003 से लगातार एशिया महाद्वीप के सबसे 'स्वच्छ ग्राम''का दर्जा मिल रहा है। मेघालय के ईस्ट-खासी हिल जिले में बसे इस गांव की आबादी महज 500 है, लेकिन इतने से लोगों ने मिलकर पूरे गांव को 'स्वच्छता की मिसाल' बना दिया है। यहां हर घर में चालू हालत में शौचालय हैं। पक्के रास्ते, सौर ऊर्जा से प्रकाशित होने वाली गलियां और हर कोने में बांस के बने कचरादान भी हैं। आवारा जानवर तो क्या यहां पेड़ों से गिरे पत्ते तक सड़कों पर नजर नहीं आते। गांव में प्लास्टिक की थैलियां पर पूरी पाबंदी है और धूम्रपान पर भी। इन चीजों से संबंधित नियम बने हुए हैं जिन्हें तोडऩे पर भारी जुर्माना भी लगता है। इस गांव से प्रभावित होकर कई सरकारी अधिकारी भी यहां आ चुके हैं ताकि स्वच्छ भारत अभियान को सफल बनाने के सबक सीख सकें।
    भारत-बांग्लादेश सीमा के पास बसे इस गांव में स्वच्छता की अलख 29 साल पहले एक स्कूल शिक्षक रिशोत खोंगथोरम ने जलाई थी। यह 1988 की बात है। उस दौर में करीब-करीब हर सीजन में महामारी गांव को चपेट में ले लेती थी। इससे कई बच्चों को जान से हाथ धोना पड़ता था। इससे चिंतित रिशोत ने स्वच्छता की अहमियत पहचानी और एक मिशन की तरह इस काम में जुट गए। गांव के सेवानिवृत्त शिक्षक लांफरांग बताते हैं, शुरू में तो गांव की समिति के सदस्यों के भीतर रिशोत की योजना को लेकर थोड़ी झिझक थी। लेकिन जब उन्होंने समग्र योजना पेश की तो सब राजी हो गए।
    अपने साफ-सुथरे घर के सामने अलसाए से बैठे ऐनेस खोंगलामेत उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं, गांव की समिति ने 1988 में ही स्वच्छता अभियान शुरू किया। पहला आदेश आया कि जानवरों को घरों में बांधो। फिर वे चाहे पालतू हों या आवारा। इसके बाद हर घर में शौचालय बनाने का हुक्म हुआ। वह भी सैप्टिक टैंक के साथ। आगे चलकर रसोई से निकलने वाले कचरे के निस्तारण की योजना अमल में लाई गई। 
    वे बताते हैं, आज गांव के सभी 97 घरों में सैप्टिक टैंक के साथ घरों से लगे बागीचों में कंपोस्ट पिट भी बने हुए हैं। सभी के लिए अनिवार्य है कि वे जैविक और अकार्बनिक कचरे को अलग-अलग रखें। जैविक कचरे को कंपोस्ट पिट में डालकर खाद बनाई जाती है जो खेतों में काम आती है। वहीं अकार्बनिक कचरे को बांस के बॉक्स में इकट्ठा किया जाता है। इसे महीने में एक बार शिलॉन्ग भेजा जाता है जहां इसको रीसाइकिल किया जाता है।(डीएनए)

     

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Posted Date : 20-Nov-2017
  • मेडचल, 20 नवम्बर (आज तक)। तेलंगाना में सत्ताधारी टीआरएस नेता का एक शर्मानाक वीडियो सामने आया है, जिसमें वह दूसरी शादी का विरोध करने पर अपनी पहली पत्नी को पीटते नजर आ रहे हैं। नेता की पत्नी घर के बाहर उनकी दूसरी शादी का विरोध करती भी दिख रही हैं, इसमें तेलंगाना राष्ट्रीय समिति नेता पी श्रीनिवास रेड्डी अपनी पत्नी संगीता के साथ गाली-गलौच और मारपीट कर रहे हैं।

    रविवार को नेता की पहली पत्नी संगीता उनके घर के बाहर दूसरी शादी का विरोध करने पहुंची थीं। जब उन्होंने अपने पति के घर में दाखिल होने की कोशिश की तब उन पर हमला किया गया। वीडियो को संगीता के परिवार वालों ने शूट किया है। इसमें रेड्डी अपनी पहली पत्नी को धमकाते और उनके बाल खींचते नजर आ रहे हैं। साथ ही उन्होंने अपनी पत्नी को जमीन पर धक्का भी दिया।
    चार साल पहले श्रीनिवास ने संगीता से शादी की थी और उनके एक बेटी भी है। आरोप है कि बेटी के जन्म के बाद से ही श्रीनिवास और उनका परिवार संगीता का उत्पीडऩ कर रहे हैं और उनके लगातार धमकियां दी जा रही हैं। संगीता को जब पता चला कि उनके पति ने उन्हें तलाक दिए बिना जगदीश्वरी नाम की एक महिला से शादी कर ली है तो वह उनके घर दूसरी शादी का विरोध करने पहुंची थीं।
    पुलिस के मुताबिक टीआरएस नेता की पत्नी ने उत्पीडऩ के मामले में अपने पति और ससुराल पक्षों के लोगों के खिलाफ जुलाई में एक शिकायत भी दर्ज कराई थी। इसमें नेता के ऊपर मारपीट और मानसिक उत्पीडऩ का आरोप लगाया गया था। 

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Posted Date : 20-Nov-2017
  • नई दिल्ली, 20 नवम्बर । वैष्णों देवी के नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के उस आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है जिसमें 24 नवंबर तक यात्रा के लिए नया मार्ग खोलने के आदेश दिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी में याचिका दाखिल करने वाले को नोटिस जारी कर दो हफ्ते में जवाब मांगा है।  
    सुप्रीम कोर्ट में वैष्णों देवी श्राइन बोर्ड की याचिका पर नोटिस जारी किया है हालांकि कोर्ट ने एनजीटी के बाकी निर्देशों पर रोक नहीं लगाई है। कोर्ट में बोर्ड ने कहा कि इस मार्ग को इतनी जल्दी खोलना संभव नहीं है। फरवरी के अंत तक मार्ग को खोला जा सकता है।

    एनजीटी के आदेश के खिलाफ माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। एनजीटी ने श्री माता वैष्णो देवी के मंदिर में दर्शनार्थियों की संख्या को नियंत्रित करने का आदेश दिया था। इसके साथ ही यात्रा के लिए बनाए गए नए मार्ग को 24 नवंबर तक खोलने के आदेश दिए थे।
    एनजीटी ने पिछले सोमवार को एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा है कि माता वैष्णो देवी के मंदिर में अब एक दिन में सिर्फ 50 हजार श्रद्धालुओं को ही दर्शन करने की अनुमति दी जाए। एनजीटी ने अपने आदेश में ये भी कहा है कि यदि श्राइन बोर्ड को इससे ज्यादा श्रद्धालुओं के यात्रा पंजीकरण की सूचना मिलती है तो अतिरिक्त श्रद्धालुओं को कटरा और अर्धकुंवारी में ही रोकने की व्यवस्था सुनिश्चित कर दी जाए। 
    इसके साथ ही एनजीटी ने श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के कॉम्प्लेक्स में किसी भी तरह के नए निर्माण पर रोक लगाने का भी निर्देश दिया। कहा जा रहा है कि एनजीटी ने पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से इस दिशा में फैसला लिया है। 
    माना जा रहा है कि एनजीटी के फैसले का असर सबसे ज्यादा नवरात्र के समय में देखने को मिलेगा। नवरात्र के समय हर साल औसतन 50-60 हजार श्रद्धालु प्रतिदिन माता वैष्णो देवी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि श्रद्धालुओं की संख्या सीमित करने के साथ यात्रियों के ठहरने के लिए भी पुख्ता इंतजाम करना श्राइन बोर्ड के लिए चुनौती भरा काम होगा।(एनडीटीवी)

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Posted Date : 20-Nov-2017
  • चंडीगढ़, 20 नवम्बर। चंडीगढ़ में एक सीनियर सैन्य अफसर की बेटी की शादी में बीएसएफ के जवानों को काम पर लगाए जाने का मामला सामने आया है। खबर के मुताबिक, चंडीगढ़ के एक रिसॉर्ट में बीएसएफ आईजी पीएस संधु की बेटी की शादी रविवार को थी।
    इस दौरान बीएसएफ के जवानों को शादी में आने वाले मेहमानों की खातिरदारी में लगाया गया। सबसे बड़ी बात तो यह कि शादी में काम कर रहे जवान वर्दी में सड़क किनारे इसीलिए खड़े किए गए थे, ताकि वो मेहमानों को रिसॉर्ट का रास्ता दिखा सके।
    इस बारे में बीएसएफ के एक जवान ने बताया कि हमें नयागांव में सड़क किनारे मेहमानों को फॉरेस्ट हिल रिसोर्ट का रास्ता दिखाने के लिए खड़ा रखा गया था। इसके अलावा 15 जवान जम्मू के लखनौर कैंपस से शादी के लिए बुलाए गए थे।
    पंजाब पुलिस के एक जवान के मुताबिक, जीरकपुर में हाईवे पैट्रोलिंग में तैनात 25 जवानों को भी शादी के दौरान ड्यूटी पर लगाया गया था। साथ ही बेंगलुरु, राजस्थान और गुजरात के भी जवान बस के जरिए शादी में काम करने के लिए बुलाए गए थे।
    शादी में ड्यूटी पर जवानों को लगाए जाने के आरोपों पर एसएसपी कुलदीप चहल ने कहा कि शादी में कई वीआईपी गेस्ट शामिल हुए थे। इसी वजह से सिक्योरिटी के लिए जवानों को तैनात किया गया था।
    वहीं, इस संबंध में सैन्य अफसर प्रदीप शर्मा ने बताया कि बीएसएफ डीजी केके शर्मा शादी में शामिल हुए थे और प्रोटोकॉल के तहत जवान यहां आए थे। जवानों से शादी के कोई काम नहीं कराए गए। (इंडियन एक्सप्रेस)

     

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Posted Date : 20-Nov-2017
  • नई दिल्ली, 20 नवम्बर। दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज (सांध्य) ने अपना नाम बदलकर वंदे मातरम महाविद्यालय रखने का निर्णय लिया है। पिछले कई महीनों से यह दिन में चलने वाले कॉलेज की तरह कार्य कर रहा था। दयाल सिंह कॉलेज के शासी निकाय के अध्यक्ष अमिताभ सिन्हा ने कहा कि यह फैसला भ्रांति दूर करने के लिए लिया गया है।
    कॉलेज का नाम बदलने के लिए एक अधिसूचना 17 नवंबर को जारी की गई थी और इसे मंजूरी के लिए कुलपति के पास भेज दिया गया है। कांग्रेस पार्टी की छात्र शाखा एनएसयूआई ने शासी निकाय के इस फैसले पर सवाल उठाया और शासी निकाय पर पंजाब के पहले स्वतंत्रता सेनानी सरदार दयाल सिंह मजीठिया की विरासत को अपमानित करने का आरोप लगाया। 
    सिन्हा ने बताया, दयाल सिंह कॉलेज में दो कॉलेज थे, एक दिवाकालीन और दूसरा सांध्य। सांध्य कॉलेज के छात्रों को दोयम दर्जे का समझा जाता है। वे नौकरियों की तलाश में भी कठिनाइयों का सामना करते हैं। यही कारण है कि शासी निकाय ने इसे एक दिवाकालीन कॉलेज में बदल दिया।
    उन्होंने कहा, दिवाकालीन कॉलेज में परिवर्तित होने के बाद नाम को लेकर छात्रों के मन में भ्रम को दूर करने के लिए कॉलेज का नाम बदलने का फैसला लिया गया है। सिन्हा ने कहा कि उन्होंने स्वयं वंदे मातरम नाम का प्रस्ताव रखा था, जिसे शासी निकाय द्वारा अपनाया गया। उन्होंने कहा, शासी निकाय के सदस्यों ने इस फैसले का स्वागत किया और कहा कि इससे बेहतर नाम नहीं हो सकता। 
    इस मुद्दे पर एनएसयूआई द्वारा सवाल उठाए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा, मुझे इस विवाद की परवाह नहीं है। 

    आप हर समय सभी लोगों को खुश नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि किसी को भी वंदे मातरम नाम पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह हम सबकी मां के साथ जुड़ा शब्द है।
    दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के कार्यकारी परिषद (ईसी) ने जुलाई में दिवाकालीन कॉलेज के फैकल्टी के विरोध के बावजूद दयाल सिंह (सांध्य) कॉलेज को दिवाकालीन कॉलेज में परिवर्तित होने के लिए मंजूरी दे दी थी।  सांध्य कॉलेज ने 20 जुलाई से पहले वर्ष के छात्रों के लिए कक्षाएं सुबह आयोजित करना शुरू भी कर दिया था। यह कक्षाएं तब तक ऐसी ही चलती रहेंगी, जब तक वह पूरे तरीके से दिवाकालीन कॉलेज के रूप में संचालित करने में सक्षम नहीं हो जाते।
    मूल दिवाकालीन कॉलेज के छात्रों और शिक्षकों ने खाली जगह के विवाद का हवाला देते हुए इस फैसले का विरोध किया, जिसमें विलय का आयोजन होना है। (आईएएनएस)

     

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Posted Date : 20-Nov-2017
  • नई दिल्ली, 20 नवम्बर  देश के इतिहास में शायद पहली बार ऐसी स्थिति बनी हो जब राष्ट्रपति की तनख्वाह केंद्र सरकार के अफसरों से भी कम हो गई हो। और यह भी शायद पहली दफा ही होगा कि केंद्र सरकार को इससे कोई ज्यादा फर्क न पड़ता हो। इस बाबत जो खबरें आ रही हैं उनसे तो कम से कम यही धारणा बन रही है। खबर के मुताबिक राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और राज्यपालों को इस वक्त केंद्र सरकार के अफसरों से भी कम तनख्वाह मिल रही है। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी सरकार ने उनकी तनख्वाह बढ़ाने पर अब तक कोई फैसला नहीं किया है।
    खबर के मुताबिक राष्ट्रपति को इस वक्त हर महीने 1.50, उपराष्ट्रपति को 1.25 और राज्यपालों को 1.10 लाख रुपए तनख्वाह मिल रही है। लेकिन एक जनवरी 2016 से सातवां वेतनमान लागू होने के बाद देश के शीर्ष अफसर यानी कैबिनेट सेक्रेटरी को हर महीने 2.5 लाख रुपए का वेतन मिल रहा है। 
    सिर्फ उन्हें ही नहीं केंद्रीय सचिवों का वेतन भी 2.25 लाख रुपए मासिक हो चुका है। यही नहीं राष्ट्रपति तीनों सेनाओं के शीर्ष कमांडर होते हैं। लेकिन तीनों सेनाओं के अध्यक्षों को भी उनसे ज्यादा और कैबिनेट सेक्रेटरी के बराबर तनख्वाह मिल रही है।
    केंद्रीय गृह मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि सातवां वेतनमान लागू होने के बाद राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और राज्यपालों की भी तनख्वाह बढ़ाने का एक प्रस्ताव तैयार किया गया था। इसके मुताबिक राष्ट्रपति को हर महीने पांच, उपराष्ट्रपति को साढ़े तीन और राज्यपालों को तीन लाख रुपए वेतन दिए जाने का प्रावधान है। लेकिन यह प्रस्ताव एक साल से भी अधिक समय से मंत्रिमंडलीय सचिवालय के पास अटका हुआ है।
    सूत्रों के मुताबिक, जब केंद्रीय मंत्रिमंडल इस प्रस्ताव को हरी झंडी देगा तब कहीं उसे संसद में पेश किया जाएगा। इस प्रस्ताव के जरिए पूर्व राष्ट्रपतियों, उपराष्ट्रपतियों, राज्यपालों की पेंशन भी बढ़ाई जानी है। लेकिन अव्वल तो प्रस्ताव ही सचिवालय से आगे बढ़े? इस प्रस्ताव के आगे बढऩे में हो रही देरी के बाबत जब सरकार के प्रवक्ता से प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई तो उन्होंने कोई जवाब ही नहीं दिया।(इकॉनॉमिक टाईम्स)।

     

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Posted Date : 20-Nov-2017
  • गीता पांडे

    बेंगलुरु, 20 नवम्बर कर्नाटक में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी की सरकार ने हाल में राजधानी बेंगलुरु में इंदिरा कैंटीन की शुरुआत की थी। यह कैंटीन हर रोज 2 लाख से अधिक लोगों को सस्ता खाना मुहैया कराती है। हम भी कैंटीन की लाइन में लगे और खाना खाया। भीड़भाड़ भरे सिटी मार्केट के नजदीक ही एक इमारत के बाहर सुबह सात बजे के बाद भीड़ इक_ा होने लगी थी।
    साढ़े सात बजे दरवाजा खुला और भीड़ अंदर चली गई। थोड़ी देर की धक्का-मुक्की के बाद लोग लाइन में लग गए। लाइन धीरे-धीरे आगे बढऩे लगी। महिला-पुरुष एक छोटी-सी खिड़की के अंदर पैसे देते थे और एक हरे रंग का टोकन लेते थे जिसे काउंटर पर देकर खाना मिलता था।
    लोग अपनी पीली थाली लेकर कमरे के अंदर ही किसी टेबल पर या फिर खाना खाने परिसर के बाहर चले जाते थे। मैंने भी टोकन खरीदा और नाश्ते के लिए लाइन में लग गई। नाश्ते में इडली, पोंगल और नारियल की चटनी थी। खाना गर्म, ताजा और स्वादिष्ट था और सबसे खास बात यह थी कि हर पकवान का दाम 5 रुपये था।
    16 अगस्त को जब यह कैंटीन खुली तब इसका नाम भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नाम पर रखा गया था। जाहिर है यह विचार तमिलनाडु की अम्मा कैंटीन से उधार लिया गया है।
    तमिलनाडु की दिवंगत मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने लोगों को सस्ता खाना देने के लिए अम्मा कैंटीन की शुरुआत की थी। अम्मा कैंटीन में भी मैंने एक साल पहले खाना खाया था। वो खाना अच्छा था, लेकिन इंदिरा कैंटीन का खाना उससे अच्छा है।
    इन कैंटीन के उपभोक्ता खासकर के गरीब होते हैं। इनमें दिहाड़ी मजदूर, ड्राइवर, सुरक्षाकर्मी और भीख मांगने वाले ऐसे लोग भी होते हैं जो दिन में कुछ सौ रुपये या कुछ भी नहीं कमाते हैं। जिनके लिए एक-एक पैसे की कीमत है।
    सिक्यॉरिटी गार्ड के तौर पर काम करने वाले मोहम्मद इरशाद अहमद कहते हैं कि वह लगातार इंदिरा कैंटीन ही आते हैं। वह कहते हैं कि खाना बहुत अच्छा है। इससे पहले मैं एक नजदीकी रेस्त्रां में नाश्ता करता था जिसके लिए मुझे 30 रुपये देने पड़ते थे। अब मैं 25 रुपये बचा रहा हूं। यह अच्छी बात है और इस योजना को पूरे राज्य में लागू करना चाहिए।
    एक स्कूल के बाहर फल बेचने वाली लक्ष्मी कहती हैं कि कैंटीन के कारण उन्हें सुबह-सुबह नाश्ता बनाने की मेहनत से आजादी मिल गई है। वह कहती हैं कि सुबह में अब मुझे काफी समय तक खाना बनाने की जरूरत नहीं है। इससे मेरी जिंदगी आसान हो गई है। यहां खाना सस्ता है जिसे में खरीद सकती हूं और जो अच्छा भी है। 
    कैंटीन के नजदीक ही एक लॉज में रहने वाले मोहन सिंह तीनों वक्त का खाना यहीं खाते हैं। उनका कहना है कि मैं तीनों वक्त के खाने पर 40 रुपये खर्च करता हूं। मोहन कहते हैं कि बाहर खाना बहुत महंगा है और इससे पहले वह एक दिन में खाने पर 140 रुपये खर्च करते थे।
    अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस तरह की कैंटीन सरकारी खजाने पर बोझ है, लेकिन नेताओं ने इसे प्रसिद्ध बना दिया है क्योंकि इस देश में करोड़ों लोग एक दिन में एक डॉलर से कम पर गुजारा करते हैं।
    कई विश्लेषकों का कहना है कि पिछले चुनाव में जयललिता के जीतने का मुख्य कारण अम्मा कैंटीन ही था। कर्नाटक में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इस कैंटीन को स्थापित करने का फैसला राजनीतिक जरूर हो, लेकिन अधिकारी इसका मकसद परोपकार बता रहे हैं।
    इस प्रॉजेक्ट के आधिकारिक इंचार्ज मनोज रंजन ने कहा कि हमारे मुख्यमंत्री ने गरीबों को खाना खिलाने का फैसला किया है। वह कहते हैं कि इस कैंटीन का लक्ष्य प्रवासी आबादी, ड्राइवरों, विद्यार्थियों और काम करने वाले जोड़ों को खाना खिलाना है जिनके पास खाना बनाने के लिए कम समय होता है, लेकिन यह हर किसी के लिए खुली है।
    जब अप्रैल में मुख्यमंत्री ने इस योजना की घोषणा की थी तब रंजन की टीम ने दिन-रात काम करके इस योजना को असल शक्ल दी। आजादी की 70वीं सालगिरह के अगले दिन 16 अगस्त को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बेंगलुरु आकर इस कैंटीन का उद्घाटन किया।
    आज शहर में 152 कैंटीन हैं जो 2 लाख लोगों को खाना देती हैं। रंजन योजना पर कहते हैं कि नवंबर के आखिर तक इसकी संख्या 198 करने की है जो हर रोज 3 लाख लोगों को खाना देगी। इस योजना को जनवरी तक पूरे राज्य में लागू करने की है जिसके तहत 300 से अधिक कैंटीन खुलेंगी।
    नाश्ते के बाद हमें दोपहर के खाने के लिए भूख लगने लगी तो हम एक दूसरी इंदिरा कैंटीन पर गए। इस बार हम काफी महंगे इलाके मरखम रोड पर थे जहां भीड़ तो कम थी लेकिन खाना खाने वालों में दफ्तर के कर्मचारी और स्कूल के छात्र भी थे। खाने में चावल और सांबर था जिसने निराश नहीं किया।
    एक प्रसिद्ध कहावत है कि लोगों के दिलों तक पहुंचने का रास्ता पेट से जाता है। कांग्रेस पार्टी को उम्मीद है कि चुनाव के समय वह जरूर जीतेगी। मेरे साथ खाना खा रहे वेंकटेश का कहना था कि लोगों में डर है कि अगर सरकार बदली तो यह कैंटीन बंद हो जाएगी।
    मैंने रंजन से पूछा कि कांग्रेस पार्टी हारी तो क्या ऐसा होगा तो उनका कहना था कि नागरिक केंद्रित योजनाएं जारी रहेंगी, सरकार कौन बनाता है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। (बीबीसी)। 

     

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Posted Date : 19-Nov-2017
  • नई दिल्ली, 19 नवम्बर। यूजीसी की एक समिति ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में ग्रेजुएशन स्नातक की पढ़ाई कर रहे छात्र-छात्राओं के क्लासरूम में अलग-अलग बैठने पर आपत्ति जताई है। यूजीसी की समिति ने केन्द्र की मोदी सरकार से सिफारिश की है कि एएमयू में तत्काल प्रभाव से को-एड व्यवस्था से पढ़ाई शुरू कराई जाए। एएमयू के विभिन्न मामलों की जांच के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने एक समिति गठित की थी। इसी समिति ने केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी है।
    यूजीसी की समिति ने केन्द्र को सौंपी अपनी रिपोर्ट में छात्र-छात्राओं को पढ़ाई के दौरान अलग-अलग बैठने की व्यवस्था को गलत बताते हुए तर्क दिया है कि इस व्यवस्था के चलते छात्र प्रोफेशनल कोर्स और फिर पढ़ाई के बाद नौकरी के दौरान भी अपनी झिझक दूर नहीं कर पाते। जिस वजह से उन्हें कई बार इसका नुकसान भी उठाना पड़ता है।
    यूजीसी की समिति ने केंद्र को सौंपी अपनी रिपोर्ट में तर्क दिया है कि अलग-अलग पढ़ाई करने की वजह से छात्र प्रोफेशनल कोर्स से लेकर नौकरी के दौरान अपनी झिझक कभी दूर नहीं कर पाते हैं और इसका नुकसान भी उठाना पड़ता है।
    यूजीसी की समिति ने शिया और सुन्नी के लिए अलग-अलग डिपार्टमेंट पर भी आपत्ति दर्ज कराई है। समिति में शामिल विशेषज्ञों का मानना है कि जब शिया और सुन्नी दोनों एक ही धर्म पर आधारित पढ़ाई करवाते हैं तो फिर दो अलग-अलग डिपार्टमेंट क्यों? समिति ने अपनी रिपोर्ट में इन दोनों विभागों को मर्ज कर देने की सलाह दी है।
    इसके अलावा समिति ने यह भी सलाह दी है कि विश्वविद्यालय में स्नातक के कोर्सों के लिए दाखिले इंजीनियरिंग और मेडिकल के तर्ज पर राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा से होने चाहिए। समिति ने परीक्षा के लिए प्रश्नपत्र, परीक्षा और रिजल्ट आदि का सेटअप तैयार करने की सलाह दी है। समिति का कहना है कि एएमयू की प्रवेश परीक्षा की मेरिट का इस्तेमाल अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भी किया जा सकता है।  (आज तक)

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