विचार / लेख

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Posted Date : 21-Nov-2017
  • डॉ. राजू पाण्डेय 
    पद्मावती फि़ल्म पर विवाद जारी है। मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा 1540 ईस्वी में रचे गए महाकाव्य पद्मावत ने पद्मावती को वह छवि प्रदान की जो आज हमारे मानस पटल पर अंकित है। पद्मावत में कल्पना और अतिशयोक्ति का -जैसा कि महाकाव्य में होना भी चाहिए- भरपूर प्रयोग किया गया है। पद्मावत पूरे विश्व में रची गई ऐसी अनेक साहित्यिक कृतियों में एक है जिनकी प्रेरणा किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व या घटना से प्राप्त हुई।  आज की परिस्थितियों में सृजन के लिए वास्तविक या मिथकीय इतिहास से प्रेरणा प्राप्त करना स्वयं को जोखिम में डालना है। पद्मावती की ऐतिहासिकता यद्यपि अब स्वीकार कर ली गई है लेकिन अब भी न सुलझने वाले अनेक प्रश्न हैं जिनका प्रारम्भ इस चरित्र के नाम से होता है - क्या पद्मावती नाम काल्पनिक है और पद्मिनी नाम वास्तविक?
     कर्नल टॉड ने मेवाड़ के भाटों के विवरण को आधार बनाकर जो इतिहास रचा है वह भी किसी भी रूप में प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता। फिर भी कहा जा सकता है कि पद्मावती एक मिथक के रूप में ही सही आज भी जीवित है और एक समुदाय विशेष के लिए न केवल प्रेरणा का स्रोत है बल्कि पूजनीय भी है।  आज महत्व पद्मावती की ऐतिहासिकता से अधिक उसकी स्वीकृत काल्पनिक आदर्श छवि का है जिससे जन भावनाएं जुड़ी हुई हैं। पद्मावती की आदर्श छवि की विशेषताएं क्या हैं- यदि इसका विश्लेषण करें तो पितृसत्तात्मक समाज द्वारा नारी के लिए रचे गए मूल्यों पर खरी उतरती नारी के दर्शन होते हैं।
     तत्कालीन समाज में बहुपत्नीप्रथा प्रचलित थी और राजाओं द्वारा एकाधिक रानियों को अपने रनिवास में स्थान देना कोई असाधारण घटना नहीं थी और यह विलास की श्रेणी में भी नहीं आता था। विलासिता तो इसके अतिरिक्त होती थी। जाति, धर्म और भूगोल की सीमाओं को तोड़ते हुए राजाओं द्वारा नारी को भोग्या और दासी के रूप में इस्तेमाल किया गया है। संभवत: यह पदमावती के व्यक्तिव की विलक्षण विशेषताएँ ही थीं कि वह रानियों की भीड़ में एक अलग स्थान बना सकी और शायद अपने राजा पति की मैत्री अर्जित कर सकी। जिन पारंपरिक मूल्यों पर उसे खरा उतरना था उनमें वर्जना का तत्व प्रधान था। उसे लंबा घूंघट काढऩा था और अपनी साथी रानियों की भांति रनिवास में परपुरुषों की छाया से दूर रहते हुए अपनी बारी की प्रतीक्षा करनी थी कि राजा पति कब अपना समय बिताने के लिए उसका चयन करें। अपने उल्लास को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने की उसे मनाही रही होगी और उसके उल्लास की आभा रनिवास और राजमहल की चारदीवारी से टकराकर रह गई होगी।
     पद्मावती  को लेकर हुए युद्ध को एक नारी पर आधिपत्य जमाने के लिए दो पुरुषों के संघर्ष के रूप में भी देखा जा सकता है जिसका आधार पुरुषवादी अंहकार अधिक था और नारी की गरिमा कम। कौमार्य, सतीत्व और पवित्रता नारी के लिए गढ़े गए ऐसे मूल्य थे जिनका पालन पुरुष प्रधान समाज तब सुनिश्चित करता था। परपुरुष का दासत्व स्वीकार करने से अच्छा स्वयं की अग्नि में आहुति दे देना माना जाता था,यही पद्मावती और अन्य स्त्रियों ने भी चुना। पुरुषों को पुरुषप्रधान समाज ने सती प्रथा और जौहर जैसी पवित्रता अक्षुण्ण रखने की प्राणघातक प्रथाओं से दूर ही रखा है। 
    आज जब राजपूत महिलाओं को हम हाथों में तलवारें उठाए और इनका इस्तेमाल करने की धमकी देते देखते हैं तो दु:खमिश्रित आश्चर्य होता है कि नारी अब भी पुरुषवादी मूल्यमीमांसा के आधार पर अपना आकलन करती है। हालांकि यह बात संतोष देती है कि राजपूत स्त्रियां न अब सती होती हैं, न हमेशा पुरुषों की छाया से दूर घूंघट में रहने के लिए बाध्य की जाती हैं, जौहर का तो खैर अब प्रश्न ही नहीं उठता। फिर इनका विरोध किस कारण है?  क्या यह छद्म अस्मिता की प्रचलित राजनीति का एक हिस्सा है? पद्मावती का महिलाओं के द्वारा विरोध- चाहे पुरुषवादी मूल्यमीमांसा के प्रति उनकी आस्था के कारण हो या फिर छद्म अस्मिता की राजनीति के प्रति उनके स्वीकार के कारण- पश्चगामी प्रवृत्ति का द्योतक है।  पद्मावती के विरोध में हुए प्रदर्शनों में जिस भाषा का इस्तेमाल हुआ है वह आश्चर्यचकित करने वाली है। नाक काटने और सिर काटने की धमकियां दी जा रही हैं और इनके लिए बाकायदा पुरस्कार भी घोषित किए जा रहे हैं। संभवत: सामंत युग में ऐसी ही भाषा को वीरोचित माना जाता था।
     सरकार इतनी सहिष्णुता से इस पूरे घटनाक्रम को देख रही है कि इसका निष्कर्ष यह भी निकाला जा सकता है कि वह इन्हें प्रोत्साहित कर रही है। यद्यपि ऐसा होना तो नहीं चाहिए। यह भी हो सकता है कि सरकार इस तरह की बयानबाजी को भाषा के अलंकार के रूप में देख रही हो जिसके यथार्थ में बदलने की संभावना कम ही होती है। हमें डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत सिंह की गिरफ्तारी के बाद हुई हिंसा को भूलना नहीं चाहिए हालांकि सरकार का मानना है कि उसने सम्यक कार्रवाई की और यदि वह प्रो एक्टिव होती या ओवर रियेक्ट करती तो शायद और ज्यादा हिंसा होती। 
    अनेक राज्य सरकारें कानून व्यवस्था का हवाला देकर एक ऐसी फिल्म को प्रतिबंधित कर रही हैं जिसे अभी तक सेंसर बोर्ड तक ने नहीं देखा है। सभी प्रमुख राजनीतिक दल फि़ल्म का विरोध कर रहे हैं। किसी को इतिहास से छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं है किन्तु कोई भी यह तय होने तक इंतज़ार करना नहीं चाहता कि फि़ल्म इतिहास को विकृत रूप से प्रस्तुत करती है या नहीं। संभवत: वोटों की राजनीति के तकाजे इन राजनीतिक दलों को आंदोलनरत समुदाय का साथ देने के लिए बाध्य कर रहे हैं। सेंसर बोर्ड भी कोई अतिरिक्त जल्दीबाजी दिखाने के विरुद्ध है और प्रक्रिया से चलना चाहता है।
     कुल मिलाकर ऐसी परिस्थितियां बन रही हैं या बनाई जा रही हैं कि यह विवाद लंबा खिंच रहा है। चुनावी राजनीति की समझ रखने वाले अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद गुजरात चुनावों तक परवान चढ़ेगा और इसके बाद चर्चा से बाहर कर दिया जाएगा और फि़ल्म की रिलीज का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। 
    चुनावों में जातिवाद के इस्तेमाल का चलन भारतीय लोकतंत्र के लिए नया नहीं है किंतु यह विवाद राष्ट्रवाद की परिभाषा से भी जुड़ा हुआ है। भारत जैसे बहु धार्मिक और बहु जातीय देश में क्या धार्मिक-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एकता के सूत्र में बांधने वाला हो सकता है? यदि हम अपनी धार्मिक और जातीय पहचान के प्रति अतिरिक्त संवेदनशीलता दर्शाने लगेंगे तो इस बात की आशंका भी बढ़ती चली जाएगी कि अन्य जातीय और धार्मिक समुदायों के साथ विवाद के अवसर बढ़ेंगे क्योंकि अपनी सर्वश्रेष्ठता का अहंकार उनमें भी उत्पन्न होते देर नहीं लगेगी। 
    इस विचार पर गंभीरतापूर्वक चर्चा होनी चाहिए कि भारत के संदर्भ में राष्ट्रवाद, जातीय और धार्मिक अस्मिता को उग्रतापूर्वक रेखांकित कर विमर्श के केंद्र में ले आने के स्थान पर उनकी सीमाएं तय करने से प्रगाढ़ होगा। राष्ट्रवाद का राजनीतिक उपयोग राजनीति में सफलता पाने का माध्यम जरूर बन सकता है लेकिन राष्ट्र के अस्तित्व के लिए यह अत्यंत घातक है। सत्ता पक्ष और विपक्ष का राष्ट्रवाद यदि अलग अलग है तो अवश्य इसमें राजनीतिक हितों की मिलावट है। वामपंथ के अन्तरराष्ट्रीयतावाद और दक्षिण पंथ के संकीर्ण राष्ट्रवाद को भारतीय परिप्रेक्ष्य में ढलना होगा। राजनीतिक वर्चस्व के लिए मूलभूत अवधारणाओं से छेड़छाड़ आत्मघाती सिद्ध हो सकती है।
    यह विवाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन के आरोपों को भी स्पर्श करता है। किसी भी धर्म, देश या समाज में सेंस ऑफ ह्यूमर की मौजूदगी उसके स्वास्थ्य और दीर्घजीविता की निशानी होती है। जितना ही हम खुद पर व्यंग्य और आलोचना को प्रोत्साहन देंगे उतने ही अवसर हमें अपनी कमियों को जानने के मिलेंगे। सत्तापक्ष की आलोचना राष्ट्रद्रोह नहीं है। बल्कि सत्तापक्ष की आलोचना स्वाभाविक है क्योंकि उसके उत्तरदायित्वों और कार्य का क्षेत्र व्यापक होता है, इस कारण त्रुटियों की संभावना भी अधिक होती है। फिर लोगों की अपेक्षाएं भी सत्ता पक्ष के प्रति अधिक होती हैं जिनके पूर्ण न होने पर आलोचना होती है। 
    हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि हम अपने देवी देवताओं, महापुरुषों और राष्ट्रनेताओं को हास्य व्यंग्य का विषय बना सकते हैं। यह हमारी उनके प्रति अश्रद्धा नहीं है बल्कि बल्कि समय के साथ स्वयं हमारे द्वारा उन पर आरोपित कर दिए गए अंधविश्वासों को दूर करने का एक प्रयास है। इतिहास गवाह है कि जिन देशों ने अपना सेंस ऑफ ह्यूमर गंवा दिया, जिन्होंने आलोचना को बर्दाश्त नहीं किया वे धार्मिक कट्टरता के शिकार हुए जिसकी परिणति राजनीतिक और सैनिक तानाशाही में हुई और वहाँ के लोगों को नारकीय जीवन जीने को बाध्य होना पड़ा। इसी प्रकार इतिहास के विभिन्न पाठों के प्रति लचीला रुख और उदारता किसी जीवित जाग्रत समाज की निशानी है।
    संजय लीला भंसाली की पद्मावती से पहले देश और दुनिया में ऐसी सैकड़ों फिल्में बन चुकी हैं जो इतिहास पर आधारित होने का दावा करती रही हैं। भारत में ही मुगले आजम का उदाहरण लिया जा सकता है। इस बहुप्रसिद्ध फि़ल्म में के आसिफ की प्राथमिकता सलीम और अनारकली की प्रेम कहानी को रेखांकित करना था इसलिए अकबर का जो चरित्र पेश किया गया था वह उसकी उदार और सहिष्णु छवि से मेल नहीं खाता था। फिल्मकारों की प्राथमिकता के अनुसार ऐतिहासिक विषयों को अलग-अलग ट्रीटमेंट मिलता रहा है। 
    विश्व के विभिन्न देशों में रामायण पर आधारित महाकाव्य, नाट्य प्रस्तुतियां,  सीरियल और फिल्में देश काल की परिस्थितियों और तत्कालीन समाज की आवश्यकताओं तथा कवि, नाटककार या फि़ल्मकार की प्राथमिकता से प्रभावित रही हैं। यदि संजय लीला भंसाली ने क्रूर, बर्बर, नृशंस और नीच अलाउद्दीन खिलजी का महिमामंडन किया है तो इसके लिए उन्हें अवश्य दंडित किया जाना चाहिए किंतु यदि वे जनमानस में अंकित पद्मावती की आदर्श छवि को अक्षुण्ण रखने में सफल रहे हैं तो फिल्मकार के रूप में उनके ट्रीटमेंट को स्वीकार किया जाना चाहिए। संजय लीला भंसाली ने गलतियां की हैं। वे चाहते तो फि़ल्म का और फि़ल्म के पात्रों का नाम बदल सकते थे। इस प्रचार से बच सकते थे कि फि़ल्म बहुत रिसर्च के बाद बनी है और ऐतिहासिक रूप से प्रामाणिक है। वे प्रभावित समुदाय के लोगों को फि़ल्म निर्माण की प्रक्रिया में सम्मिलित कर सकते थे। 
    सेंसर बोर्ड की मौजूदगी को दरकिनार कर कथित विशेषज्ञों के सम्मुख स्पेशल स्क्रीनिंग की जो गलत परंपरा अब उन्होंने डाली है इससे मिलता जुलता कोई प्रयास फि़ल्म की फाइनल एडिटिंग के समय उन्होंने किया होता तो यह विवाद ही न होता। किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया। भंसाली कोई संत नहीं हैं। वे एक व्यावसायिक फि़ल्म निर्माता हैं जो धन कमाने के ध्येय से फिल्में बनाते हैं और इस बात की पूरी संभावना है कि इस विवाद से वे फि़ल्म की पब्लिसिटी की आशा कर रहे हों। यदि उन्होंने फि़ल्म की पब्लिसिटी के लिए इस विवाद को बढऩे दिया है तो यही कहा जा सकता है कि फि़ल्म प्रचार का यह तरीका घृणित और निंदनीय तो है ही खतरनाक भी है। पद्मावती को लेकर चल रहे इस विवाद में अनेक घातक प्रवृत्तियों के अशुभ संकेत छिपे हुए हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।

     

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Posted Date : 21-Nov-2017
  • अरुण कान्त शुक्ला
    दक्षिण पूर्व एशियन देशों के संघ की 13 नवम्बर को मनीला में अमेरिकन प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प के साथ हुई बैठक के पहले जो कुछ प्रधानमंत्री ने कहा देश के समाचार पत्रों, मीडिया चेनलों और यहां तक कि राजनीतिक दलों ने भी भले ही उसे कोई तवज्जो नहीं दी है, पर वह चिंतित करने वाला जरुर है। इसमें कोई शक नहीं कि पिछले तीन दशकों में और विशेषकर 2007-08 में हुए न्यूक्लियर समझौते के बाद से भारत की विदेश नीति में अमरीका के साथ संबंधों में व्यापक बदलाव आया है। उसके बावजूद भी प्रधानमंत्री तो दूर की बात भारत के किसी राजनयिक की भी भाषा अमरीका के प्रति इतनी प्रतिबद्ध और समर्पणकारी नहीं रही। मनीला में बैठक के पहले प्रधानमंत्री ने जो कहा उसका हिन्दी रूपांतरण यह है कि भारत-अमरीकी संबंध व्यापक तथा और गहरे हो रहे हैं और आप स्वयं महसूस कर सकते हैं कि ये संबंध अमरीका के साथ भारत के हितों से ऊपर उठकर, एशिया के भविष्य और विश्व में मानवता की भलाई के लिए कार्य कर सकते हैं।
     यह उस अमरीका के बारे में कहा जा रहा है, जिसके ट्रम्प राष्ट्रपति हैं और इनका नारा है कि अमेरिका सिर्फ अमरीकियों के लिए। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद से अमरीका की सारी वैश्विक और अन्दुरुनी नीतियां इसी के आधार पर तय हो रही हैं। प्रधानमंत्री उपरोक्त बयान देने के बाद रुके नहीं। उन्होंने भारत की ओर से अमेरिका के वैश्विक राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने का वायदा ही कर डाला। उन्होंने आगे कहा कि मैं आश्वस्त करता हूँ कि भारत अपने सबसे अच्छे प्रयत्न करेगा कि वह उन आशाओं को पूरा करे जो अमरीका और विश्व उससे करते हैं। निश्चित ही उपरोक्त दोनों कथनों में संदर्भ में एशिया और विश्व वह एशिया और विश्व नहीं है जिसे हम जानते हैं या जैसा हम चाहते हैं, बल्कि प्रधानमंत्री उस एशिया और विश्व की बात कर रहे थे जैसा डोनाल्ड ट्रम्प चाहते हैं।
    बावजूद इस तथ्य के पिछले दो दशकों में भारतीय विदेश नीति और संपन्न तबके के भारतीयों में अमेरिका के प्रति रुझान बढ़ा है और व्यापारिक से लेकर सैन्य तक सभी प्रकार के समझौते किए गए है, पर, ऐसा कभी नहीं हुआ कि इस तरह का कोई भी आश्वासन किसी प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री या राजनयिक ने दिया हो। भारत एक सार्वभौमिक राष्ट्र है और आर्थिक, सामाजिक, वैश्विक मामलों में स्वालंबन हमारी हमेशा विशेषता रही है। यदि हम याद करें तो स्वयं प्रधानमंत्री 2014 में जब चुनाव प्रचार में थे तो अनेक बार उन्होंने भारत की विदेश नीति के बारे में बोलते हुए कहा था कि आवश्यकता भारत को दूसरे देशों के साथ आंख में आंख डालकर बात करने की है। आज जब वे अमरीका की उम्मीदों पर खरा उतरने का आश्वासन दे रहे हैं तो चिंतनीय यह है कि उस ट्रम्प का अमेरिका है जो आज विश्व शान्ति के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है और विश्व में जलवायु और पर्यावरणीय खतरे के प्रति एक देश के रूप में गैरजिम्मेदार देश सिद्ध हुआ है। प्रधानमंत्री एक ऐसे राष्ट्रपति के सामने आश्वासन परोस रहे हैं, जिसके स्वयं के उपर नैतिक और चुनावी जांचें चल रही हैं और हो सकता है निकट भविष्य में उसे अमरीका में महा-अभियोग का सामना करना पड़े। बेहतर होता प्रधानमंत्री ने मनीला में उसी वक्तव्य में अपना अभिप्राय स्पष्ट कर दिया होता तथा  अमरीका को किस प्रकार की आशाएं भारत से हैं, वह भी स्पष्ट कर दिया होता। अमरीका की तमाम धन और सैन्य ताकत से प्रभावित (डरने) के बावजूद यह ऐतिहासिक सच्चाई आज भी बनी हुई है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अमरीका की छवि दूसरे देशों में अशांति फैलाने वाले, आपराधिक गतिविधियों के बढ़ावा देने वाले, युद्ध थोपने वाले राष्ट्र की है और उसमें कोई परिवर्तन नहीं आया है। 
    एशिया तथा अरब बेल्ट के देश इसके सबसे ज्यादा शिकार हुए हैं। किसी से छिपा नहीं रहा है कि अमरीका की आशाओं या अमरीका की वैश्विक आशाओं का मतलब एकाधिकारवादी और आपराधिक व्यक्तियों और ताकतों को एशिया तथा अरब देशों में सत्ता में स्थापित करना होता है जैसा हमने पाकिस्तान, सऊदी अरब, जॉर्डन, ईजराईल और अन्य देशों में देखा है। ईस्लामिक स्टेट और तालिबान बनाने वाला अमरीका ही है। अमेरिका की वैश्विक राजनीति का केवल एक ही मकसद होता है कि पश्चिम, एशियन और अरब देशों में जो लूट मचा रहा है, उसकी तरफ से सारा ध्यान हटाकर यहां के देश सिर्फ इस्लामिक आतंकवाद के बारे में ही सोचें और आपस में लड़ते रहें ताकि अमरीका की मिलिट्री इंड्रस्ट्री फलती फूलती रहे। 
    पाकिस्तान हमारा पड़ोसी है और अमरीका के या अमेरिका से प्यार की कितनी भारी कीमत उसे चुकानी पड़ रही है, यह हम देख रहे हैं। विश्व मानवता के लिए, विश्व शान्ति के लिए या संपूर्ण एशिया में शान्ति, एकता, सौहार्द्र और आर्थिक सहयोग के लिए आगे बढ़कर कार्य करने में कोई बुराई नहीं, पर फिर उसके लिए अमरीकी आशाओं पर खरा उतरने की बात करना और अमरीका को आश्वस्त करना किसी भी प्रकार से देश हितैषी स्वाभिमानी विदेश नीति तो नहीं ही है। यह, आंख में आंख डालकर याने निगाहें मिलाकर बात करना भी नहीं है। भारत और भारतीयों की भावनायें इससे भी आहत होती हैं।

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Posted Date : 20-Nov-2017
  • नवीन जोशी, वरिष्ठ पत्रकार
    भारत की चुनावी राजनीति की पतन गाथा को आगे बढ़ाने के वास्ते एक और सेक्स-सीडी एवं चार वीडियो-क्लिप जारी कर दिये गये हैं. इस बार गुजरात के पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के तेज-तर्रार नेता हार्दिक पटेल को लपेटने की कोशिश हुई है, जो आसन्न गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रबल विरोधी और कांग्रेस-समर्थक के रूप में सामने आये हैं. 
     
    सोशल मीडिया पर वायरल हुए अलग-अलग वीडियो में हार्दिक पटेल को महिलाओं के साथ ‘मस्ती करते’ दिखाया गया. पटेल ने इसके लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराते हुए पलटवार किया- ‘भाजपा गुजरात की महिलाओं का अपमान कर रही है. जनता 22 साल के लड़के का नहीं, 22 साल के विकास का वीडियो देखना चाहती है, अगर कुछ हुआ है तो.’ प्रमुख युवा दलित नेता जिग्मेश मेवानी ने हार्दिक के पक्ष में ट्वीट किया है कि यह किसी की निजता में दखल है. मैं हार्दिक के साथ हूं. वैसे, पटेल कुछ दिन पहले ही आशंका व्यक्त कर चुके थे कि उनके खिलाफ कोई फर्जी सीडी जारी की जा सकती है.
     
    गुजरात में चुनाव प्रचार चरम पर है. भाजपा वहां घिर गयी है. कांग्रेस से उसे खास भय नहीं, पर पटेलों, पिछड़ों और दलितों के विरोध में डट जाने और कांग्रेस के पक्ष में दिखने से वह परेशान है. पहले उसने पाटीदार आंदोलन में फूट डालने की कोशिश की. नेताओं को खरीदने के आरोप भी उस पर लगे. अब पटेलों के प्रभावशाली नेता के खिलाफ ये वीडियो सामने आये हैं. 
     
    सत्ता की राजनीति में यह घिनौनी प्रवृत्ति की तरह उभरा है. जब भी किसी पार्टी को जन-मुद्दों का जवाब नहीं सूझता या किसी ताकतवर विरोधी को पटखनी देनी होती है, तो जनता का ध्यान भटकाने के लिए कहीं से एक सनसनी सामने ला दी जाती है. सेक्स-सीडी से ज्यादा सनसनीखेज हमारे यहां और क्या हो सकता है? घोर अनैतिक हो चुकी राजनीति का यह बड़ा हथियार है. विकास के मुद्दे पर शुरू हुआ गुजरात का चुनाव प्रचार सेक्स सीडी के घटिया स्तर तक बेवजह नहीं आ गिरा है. 
     
    इस मामले में अधिकतर पार्टियों का दामन साफ नहीं है. हाल ही में जब लालू यादव की पार्टी राजद ने नीतीश कुमार की नशाबंदी नीति को निशाना बनाते हुए एक शराब व्यवसायी-नेता के साथ मुख्यमंत्री की सेल्फी जारी की, तो जवाब में बिहार के सत्तारूढ़ गठबंधन की ओर से लालू-पुत्र और हाल तक उप-मुख्य्मंत्री रहे तेजस्वी यादव का वह फोटो जारी कर दिया, जिसमें वे एक लड़की के साथ बीयर की बोतल लिए खड़े हैं. 
    निशाना तेजस्वी थे, उस अबोध लड़की का चरित्र-हनन भी किसी को दिखा क्या?
     
    छत्तीसगढ़ के एक मंत्री की सेक्स सीडी प्रसारित करवाने की साजिश के आरोप में पत्रकार और कांग्रेसी विनोद वर्मा की रातोंरात गिरफ्तारी अब भी सुर्खियों में है. साल 2008 में तत्कालीन भाजपा महासचिव संजय जोशी की सेक्स सीडी ने कम हंगामा नहीं मचाया था. उस समय आरोपों के घेरे में नरेंद्र मोदी भी थे, राजनीति में तेजी से उभरते संजय जोशी से जिनकी कतई नहीं बनती थी. 
     
    साल 2009 में आंध्र प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल नारायन दत्त तिवारी की सेक्स सीडी जारी हुई, तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था. 2012 में कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी की सेक्स सीडी ने हंगामा खड़ा किया था. 2016 में कर्नाटक के शिक्षा मंत्री को इसी कारण इस्तीफा देना पड़ा था.
     
    कुछ और पीछे जाकर 1978 का वह कांड याद करें, जब जनता पार्टी की सरकार के उप-प्रधानमंत्री एवं कद्दावर नेता जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम की एक महिला के साथ अंतरंग क्षणों की तस्वीरों ने सनसनी फैलायी थी. तब खबरिया चैनल नहीं थे. मेनका गांधी के संपादन में ‘सूर्या’ पत्रिका ने वे तस्वीरें छापी थीं. निशाना जगजीवन राम थे, मार किस पर पड़ी? 
     
    ये सभी ऐसे मामले हैं, जिनमें किसी महिला ने संबंधित नेता पर यौन-उत्पीड़न जैसा कोई आरोप नहीं लगाया. न पहले न बाद में. हालांकि, नेताओं पर महिलाओं का शारीरिक शोषण करने के आरोप खूब लगते रहे हैं. मदद मांगने आयी महिला को फंसाने या किसी युवती को उठवा लेने के कई किस्से नेताओं के चरित्र का कच्चा चिट्ठा खोलते आये हैं. लेकिन, यहां हम सिर्फ उन मामलों का जिक्र कर रहे हैं, जिनमें संबंधित महिला ने नेता पर आरोप नहीं लगाया.
     
    अगर वे सच्ची सीडी या तस्वीरें हैं, तो सिर्फ यही बताती हैं कि जो कुछ हुआ है, वह दो वयस्क व्यक्तियों की रजामंदी से हुआ है, जिस पर किसी तीसरे को आपत्ति करने का अधिकार नहीं है. सीडी बनाकर जिसने साजिशन उनकी निजता का उल्लंघन किया है, उसका इरादा नेक नहीं हो सकता.
     
    नेताओं को बदनाम करने के लिए ऐसी फर्जी सीडी खूब बनायी जाती हैं. टेक्नोलॉजी ने इसे आसान बना दिया है. मीडिया भी ऐसी चीजों को ज्यादा उछालता है. नेहरू-युग में शायद ही कोई अखबार रहा हो, जिसने सिगरेट पीते प्रधानमंत्री की तस्वीरें छापी हों, जबकि नेहरू खूब सिगरेट पीते थे. आज सेक्स सीडी के मामले तो बिना असली-फर्जी जांचे प्रसारित किये जा रहे हैं. 
     
    राजनीतिक साजिशकर्ताओं से लेकर मीडिया तक यह नहीं देखते कि यह किसी की निजता में अनावश्यक दखल है, उससे ज्यादा महिलाओं का अपमान है और जनता का ध्यान जरूरी मुद्दों से भटकाने की बड़ी राजनीतिक साजिश है. विरोधी को नुकसान पहुंचाने के लिए महिलाओं का अनैतिक इस्तेमाल किया जा रहा है. मीडिया भी इस अपमान का बड़ा हिस्सेदार है. 
     
    आश्चर्य और दुख तब बढ़ जाता है, जब साजिशकर्ता या आरोप लगानेवाले दल की महिला नेताओं को भी इसमें अपना अपमान नहीं दिखता. उनकी तरफ से आपत्ति करना तो दूर, वे स्वयं आरोप लगानेवालों की पंक्ति में खड़ी रहती हैं. 1978 में सुरेश राम और एक लड़की के नग्न चित्र छापने में मेनका गांधी को कोई संकोच नहीं हुआ था.
     
    गुजरात में जारी हार्दिक पटेल के वीडियो असली हैं या नकली, यह महत्वपूर्ण नहीं है. बड़ा सवाल यह है कि जब सत्तारूढ़ पार्टी ‘मैं विकास हूं’ के नारे के साथ मैदान में है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सरदार पटेल के समकक्ष स्थापित करने की कोशिश की जा रही है, तब विरोध में खड़े एक पटेल नेता की छवि को ध्वस्त करने के लिए ऐसी साजिश की जरूरत किसे और क्यों पड़ रही है? क्या विकास का मुद्दा अब चुनाव जितानेवाला नहीं रहा? यह भी, कि महिलाओं को इस तरह कब तक अपमानित किया जाता रहेगा? http://www.prabhatkhabar.com/

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Posted Date : 20-Nov-2017
  •  सुधीर जैन
    दुनिया के तमाम देशों में आर्थिक वृद्धि की संभावना की अटकल लगाना बहुत ही मुश्किल काम है। यही काम रेटिंग एजेंसी मूडी करती है। यह दुनिया की तीन बड़ी एजेंसियों में से एक है और अपने शोध सर्वेक्षण के जरिए निवेशकों का मूड बनाने बिगाडऩे का काम करती है। यह एजेंसी 14 साल से भारत की रेटिंग बहुत ही खराब बताती आ रही थी। इस बार उसने सुधरी हालत का अनुमान दिखाया है। उसने इस तरह के आकलन के लिए अपने पैमाने बना रखे हैं। इस तरह से वह दुनिया के तमाम देशों को एक मशविरा देने का काम करती है कि किन-किन क्षेत्रों में सुधार वगैरह करके वे अपने-अपने देशों में आर्थिक वृद्धि कर सकते हैं।
    बहरहाल मूडी के हिसाब से हमारी बहुत ही खराब रेटिंग इस साल कुछ कम खराब बताई गई है। बेशक हमारे लिए यह खुश होने का कारण है। लेकिन अगर गौर से देखेंगे तो समझा जा सकता है कि यह हमारी सफलता का ऐलान नहीं बल्कि सफल होने के लिए शुभकामना जैसी चीज है।
    यह इस काम की है कि विदेशी निवेशकों का मूड बदलती है। अर्थशास्त्रियों का एक तबका यह सिद्ध करता है कि आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने के लिए फीलगुड भी बड़े काम की चीज है। इस तरह से विदेशी निवेशकों में फीलगुड के लिए मूडी की यह रेटिंग काम की चीज मानी जाती है। इससे यह संदेश जाएगा कि भारत में निवेशकों के अनुकूल सुधार हो रहे हैं लिहाज़ा वहां निवेश करना ठीक रहेगा। इस तरह से यह मानकर चलने में कोई हजऱ् नहीं कि मूडी की रेटिंग से विदेशी निवेशकों में यह संदेश भेजने का काम सफलतापूर्वक हुआ होगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या इतना भर काफी है। यानी आगे अब मूडी को यह देखना है कि हमारी सरकार मूडी के बनाए इस माहौल का फायदा उठाने के लिए क्या करती है। यानी सरकार के लिए काम हुआ नहीं है बल्कि शुरू होने की तैयारी हुई है। लेकिन सरकार के पास इसके तात्कालिक लाभ लेने के ढेरों मौके ज़रूर पैदा हो गए हैं। मसलन देश के भीतर भी फीलगुड के मौके।
    अब तक जो भी सुना पढ़़ा गया उसके मुताबिक यह रेटिंग सबसे ज्यादा इस प्रचार के काम आ रही है कि देश की माली हालत अच्छी है। सारा प्रचार देश के लोगों को संबोधित है। अपने घटते सकल घरेलू उत्पाद से परेशान सरकार को कहने के लिए मूडी का सहारा मिल गया है।
    सरकार को बिल्कुल उसी तरह अच्छा लगा जिस तरह विश्व बैंक के जरिए डूइंग बिजनेस का सूचकांक बेहतर होने के आंकलन को सुनकर लगा था। सरकार की तरफ से सबसे ज्यादा आधिकारिक व्यक्ति के रूप में वित्तमंत्री की प्रतिक्रिया गौरतलब है। इस प्रतिक्रिया में एक अफसोस भी उन्होंने जोड़ा है कि भारत में सुधारों को मान्यता देरी से मिली। 
    इस मामले में गौर करने की बात यह है कि इस रेटिंग का आंकलन जिन सुधारों के आधार पर हुआ है वे मूर्त रूप में हुए ही एक साल के भीतर हैं। सो इससे कम समय में यह मान्यता मिलती भी कैसे। हालांकि वित्तमंत्री ने या देश के किसी सक्षम पदाधिकारी ने यह नहीं बताया कि अगला कदम क्या होगा जिससे सुधरी रेटिंग का फायदा उठाया जा सकेगा। लेकिन तात्कालिक लाभ के तौर पर सरकार मूडी की रेटिंग को देश की आर्थिक बेहतरी का ऐलान बताने की कोशिश में है। गौर करें तो यह रेटिंग फीलगुड के तौर पर तो काम आ ही रही है।  
    ये निगरानी रखने वाले दो प्रकार के हैं। एक तो राजनीतिक विपक्ष और दूसरे वे जिन्हें हम आर्थिक मामलों के प्रशिक्षित जानकार कहते हैं। क्योंकि सुधरी रेटिंग का मामला नया-नया है सो जानकारों की प्रतिक्रियाएं एक-दो रोज़ बाद ही आना शुरू होंगी। लेकिन विपक्ष के नेताओं की बातें फौरन ही आईं। इनमें एक है कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राजीव शुक्ला का बयान। उन्होंने कहा है कि मोदी जी और मूडी की जोड़ी भारत में वित्तीय सुधार की जो बात कर रही है वह देश की ज़मीनी सच्चाई से दूर है। यानी उन्होंने एक तरह से यह कहा है कि इस रेटिंग का देश के भीतर की हकीकत से कोई लेना देना नहीं है। अब अगर यह सवाल बड़ा बना तो अर्थशास्त्र के विद्वान ही निपटारा कर पाएंगे कि रेटिंग का यह मामला कितना इंटरनेशनल है और कितना इंट्रानेशनल है, या दोनों। जहां तक जानकारों की प्रतिक्रिया का सवाल है तो इसमें कोई शक नहीं कि अब मूडी की उस पद्धति को गौर से देखना शुरू होगा जिसके आधार पर वह किसी देश की रेटिंग करती है। इस जांच-पड़ताल में यह बात निकलकर आ सकती है कि मूडी जैसी एजेंसियों के ऐसे काम होते किस मकसद से हैं।
    मूडी के आकलन से खुश होने वालों का बड़ा जोर इस बात पर है कि यह आकलन आंकड़ों के आधार पर है। लेकिन खुद मूडी ने साफ कहा है कि उनका आकलन एक उम्मीद पर आधारित है। उम्मीद यह कि भारत अपने यहां सुधारों की प्रकिया लगातार चलाता रहे। यानी मूडी ने आर्थिक सुधारों के लिए आंशिक शाबासी इस मकसद से दी है कि भारत अपने यहां आगे और आर्थिक सुधार करता रहे। यानी इशारों में मूडी यह भी कह रही है कि हम सिर्फ मूड ही बदल रहे हैं इससे आपको अपने देश के भीतर आर्थिक सुधारों को तेजी से करने में सुबीता हो जाएगा। यानी आर्थिक सुधारों के खिलाफ देश के भीतर का विरोध कम हो जाएगा। https://khabar.ndtv.com/news/blogs/
    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्त्री हैं।)

     

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Posted Date : 20-Nov-2017
  • रात भर की चर्चा के बाद जर्मनी के शहर बॉन में संयुक्त राष्ट्र का 23वां जलवायु सम्मेलन खत्म हुआ। सम्मेलन में हिस्सा ले रहे 195 देशों ने जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे देशों के लिए एडेप्टेशन फंड बनाने पर रजामंदी जताई। एडेप्टेशन फंड 2001 में हुए क्योटो प्रोटोकॉल का हिस्सा है।  इस फंड का इस्तेमाल जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे विकासशील देशों में स्वच्छ ऊर्जा के प्रोजेक्ट्स को फाइनेंस करने के लिए किया जाएगा। लेकिन पैसा किसे दिया जाएगा, सरकार को या सीधे प्रोजेक्ट्स को, यह पेंच अब भी फंसा हुआ है।
    हल्की प्रगति के बावजूद बॉन में मौजूद प्रतिनिधियों ने शनिवार सुबह एक दूसरे को बधाई दी। पृथ्वी को बचाने के लिए वो बहुत कुछ भले ही न कर पाएं हो लेकिन 2015 की पेरिस संधि को बचाए रखने में सफल हुए। सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे फिजी के प्रधानमंत्री फ्रांक बैनिमारामा ने कहा, बॉन का नतीजा हमारे पेरिस समझौते की भावना और उसके दृष्टिकोण और उसकी गति की अहमियत को रेखांकित करता है।
    सम्मेलन के बाद चीन के मुख्य वार्ताकार शी जेनहुआ ने कहा, जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती है। पेरिस संधि ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक ऐतिहासिक गति प्रदान की है, जिसे अब रिवर्स नहीं किया जा सकता।  बॉन की कांफ्रेंस में द्वीय देशों की कुछ चिताओं को हल करने पर सहमति बनी। पेरिस संधि के बड़े लक्ष्य हासिल करने के लिए जरूरी कदम अब 2018 में पोलैंड में होने वाले जलवायु सम्मेलन में तय किए जाएंगे।
    वर्ष 2015 के पेरिस समझौते के तहत 197 देशों ने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने का वादा किया था। समृद्ध देशों ने 2020 तक 100 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता देने पर हामी भरी थी। 2020 के बाद हर साल 100 अरब डॉलर जमा करने थे। इस रकम से गरीब देशों को स्वच्छ ऊर्जा मुहैया कराने की योजना है। साथ ही प्राकृतिक आपदाओं के खिलाफ भी यह पैसा काम आता। लेकिन कौन कितना पैसा देगा, वित्तीय सहयोग की पारदर्शिता कैसे तय की जाएगी, इन मुद्दों पर इस बार भी रजामंदी नहीं हो सकी।
    बॉन की कॉन्फ्रेंस में इस बात पर सहमति जरूर बनी कि उत्सर्जन कम करने का वादा करने वाले देशों की सही से जांच कैसे की जाए। लेकिन इसका पता 2018 में ही चलेगा कि विकसित देश कितना उत्सर्जन कम कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप पहले ही 2020 तक पेरिस संधि से बाहर निकलने का एलान कर चुके हैं। ज्यादातर लोगों को लग रहा था कि बॉन कॉन्फ्रेंस में अमरीका नकारात्मक भूमिका निभाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
    बॉन सम्मेलन की अध्यक्षता प्रशांत महासागर का द्वीय देश फिजी कर रहा था। उसकी अगुवाई में बॉन पहुंचे द्वीय देशों के नेता विकसित देशों के रुख से मायूस हुए। विकसित देशों ने बड़े बदलावों का विरोध किया। 
    लॉस एंड डैमेज जैसे तकनीक बिंदु पर बात करने के लिए तकनीकी विशेषज्ञों का ग्रुप जरूर बना। लेकिन द्वीय देशों के मुताबिक वे अभी ही जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे हैं और उन्हें तुरंत वित्तीय सहायता की जरूरत है। इस पर कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। पलाऊ के राष्ट्रपति टॉमी रेमेनगेसाऊ ने कहा, हमारे लिए जीवन और मृत्यु का सवाल है। यह एक नैतिक सवाल है, जिसका नैतिक जवाब मिलना चाहिए। (डॉयचे वैले)

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Posted Date : 19-Nov-2017
  • जावेद अनीस
    20 नवम्बर 1989 को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा द्वारा बाल अधिकार समझौते को पारित किया था। जिसके बाद से हर वर्ष 20 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। बाल अधिकार संधि ऐसा पहला अंतरराष्ट्रीय समझौता है जो सभी बच्चों के नागरिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकारों को मान्यता देता है। इस समझौते पर विश्व की अधिकतर सरकारों ने हस्ताक्षर करते हुए अपने देश में सभी बच्चों को जाति, धर्म, रंग, लिंग, भाषा, संपति, योग्यता आदि के आधार पर बिना किसी भेदभाव के संरक्षण देने का वचन दिया है। भारत ने भी संयुक्त राष्ट्र संघ बाल अधिकार संधि को 1992 में हस्ताक्षर कर अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की है। 
    इसमें कोई शक नहीं कि इस संधि ने भारत सहित दुनिया भर के लोगों में बच्चों के प्रति नजरिये और विचारों को बदला है, लेकिन स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है। पिछले 25 वर्षों में मानवता आगे बढ़ी है और इसने कई ऊचाईयां तय किए हैं, परंतु अभी भी हम ऐसी दुनिया नहीं बना पाए हैं जो बच्चों के हित में और उनके लिए सुरक्षित हो। 
    भारत द्वारा बाल अधिकार समझौते को अंगीकार किये जाने के इस साल 25 साल पूरे हो रहे हैं लेकिन 25 साल बीत जाने के बावजूद आज भी हमारे देश में समाज और सरकारों का बच्चों के प्रति नजरिया उदासीन बना हुआ है। राज्य की तरफ से तो फिर भी बच्चों के पक्ष में सकारात्मक पहल किए गए हैं, लेकिन एक समाज के रूप में हम अभी भी बच्चों और उनके अधिकारों को लेकर गैर-जिम्मेदार और असंवेदनशील बने हुए हैं।
     पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कुछ क्षेत्रों में अभूतपूर्व तरक्की की हैं, लेकिन बाल अधिकारों को लेकर विभिन्न इंडिकेटर इस उजले तस्वीर में काले दाग की तरह हैं, हमारा मुल्क अभी भी भूण हत्या, बाल व्यापार, यौन दुव्र्यवहार, लिंग अनुपात, बाल विवाह, बाल श्रम, स्वास्थ्य, शिक्षा, कुपोषण, मलेरिया, खसरा और निमोनिया जैसी बीमारियों से मरने वाले बच्चों के हिसाब से दुनिया के कुछ सबसे बदतर देशों में शामिल है, हम एक राष्ट्र और समाज के रूप में अपने बच्चों को हिंसा, भेदभाव, उपेक्षा शोषण और तिरस्कार से निजात दिलाने में विफल साबित हुए हैं।
    हालांकि यूएनसीआरसी को स्वीकार करने के बाद भारत ने अपने कानूनों में काफी फेरबदल किया है, बच्चों को ध्यान में रखते हुए कई नए कानून, नीतियाँ और योजनाएं बनाईं गई हैं। इसकी वजह से बच्चों से सम्बंधित कई सूचकांकों में पहले के मुकाबले सुधार देखने में आया है, लेकिन इन सब के बावजूद भारत को अभी भी संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकार संधि के तहत किए गए वादों को पूरा करने के लिए लम्बा सफर तय करना बाकी है। इस सफऱ में कई कानूनी, प्रशासनिक एवं वित्तिय बाधाऐं है, जिन्हें दूर करना होगा और सबसे जरूरी एक राष्ट्र के रुप में हमें बच्चों को अधिकार देने के लिए ओर अधिक सकारात्मक दृष्टिकोण एवं माहौल बनाने की जरुरत है।
    अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार समझौता बच्चों के चार मूल सिद्धांतों पर आधारित हैं जिसमें जीने का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार, विकास और सहभागिता का अधिकार शामिल है। आमतौर पर पहले तीनों अधिकारों की महत्ता समाज में स्थापित हो गयी है लेकिन अभी यह सोच नहीं बन पायी है कि बच्चों का भी अपना स्वतन्त्र विचार और नजरिया हो सकता है जिसे जगह और सम्मान मिलना चाहिए।  बच्चों को लेकर हम बड़ों के बीच यह नजरिया हावी है कि वे खुद से सोचने, समझने, निर्णय लेने और किसी बात पर अपने विचार व्यक्त करने में सक्षम नहीं होते, हम उन्हें देश का भविष्य मानते हैं लेकिन वे वर्तमान भी तो है। माना कि वर्तमान में भले ही वे वोटर ना हों लेकिन वे भविष्य के नागरिक नहीं है।  वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 0 से 18 आयु समूह के 472 मिलियन बच्चे हैं जो कि भारत के वर्तमान बाशिंदे हैं और उनको इसे नजरिये से देखने की जरूरत है। राज्य की तरफ से इस दिशा में जरूर प्रयास देखने को मिले हैं जिसमें राष्ट्रीय बाल नीति 2013 सबसे महत्वपूर्ण है जिसमें जीवन से जुड़े हर क्षेत्र में ऐसा तंत्र विकसित करने की वकालत की गयी है जहाँ बच्चे बिना किसी डर के अपनी बात रख सकें। 
    इसी तरह से राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा इस सम्बन्ध में राज्यों को यह निर्देश जारी किया गया है कि वे बच्चों से संबंधित संस्थानों जैसे स्कूल, होस्टल, होम आदि में ऐसे फोरम की स्थापना सुनिश्चत करें जहाँ बच्चे अपने विचारों को रख सकें। लेकिन अगर भारत जैसे देशों में जब तक बाल सहभागिता को लेकर लोगों की सोच में व्यापक रूप बदलाव नहीं होगा इस तरह के प्रयास महज कागजी कवायद ही साबित होंगें । 
    दुर्भाग्य से हमारे समाज में बच्चों की सोच के लिये कोई मूल्य है हमें यह समझना होगा कि अगर बच्चों को मौका मिले तो वे खुद को अपनी पूरी स्वाभिकता और सरलता के साथ अभिव्यक्त करते हैं और ऐसा करते हुये वे हम बड़ों की दुनिया को चुनौती देते भी नजर आते है। उनकी मौलाकिता बहुमूल्य है जो हमारी दूनिया को और खूबसरत बना सकती है। हम उनसे सीख सकते हैं कि कैसे अपनी स्वाभिकता को बरकरार रखते हुए मौलिकता को साधा जाता है।
    पिछले दिनों सामाजिक संस्था विकास संवाद और साथी संस्थोओं द्वारा बच्चों की आवाज पर आधारित रिपोर्ट जारी की गयी है जिससे पता चलता है कि अगर बच्चों को सहज मौका और मंच दिया जाये तो वे हम बड़ों को आईना दिखा सकते हैं। यह रिपोर्ट मध्यप्रदेश के 2300 बच्चों के साथ गतिविधि आधारित सर्वेक्षण पर आधारित है जिसमें 78 प्रतिशत बच्चों ने कहा है कि सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए। क्या यह जवाब सुनकर हमें बच्चों को अपनी तरह बनाने की कोशिश छोड़कर खुद उनकी तरह बननी की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

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Posted Date : 19-Nov-2017
  • सौतिक बिस्वास
    हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक रिटायर्ड जज के कथित भ्रष्टाचार के मामले की सुनवाई को दौरान कुछ असाधारण गतिविधियां हुईं।
    एक ब्लैकलिस्टेड मेडिकल कॉलेज में कथित भ्रष्टाचार की जांच से जुड़ी एक याचिका को लेकर वरिष्ठ जजों में खुले तौर पर आपसी मतभेद दिखा। जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया है कि एक रिटायर्ड जज इशरत मसरूर कुद्दुसी कॉलेज को फिर से खुलवाने के लिए कोर्ट का ऑर्डर सुरक्षित करवाने की कोशिश में थे। कुद्दुसी को सितंबर में गिरफ्तार किया गया था और वो अभी जमानत पर बाहर हैं।
    पिछले सप्ताह कोर्ट में वरिष्ठ वकील और इस मामले में याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण और चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के बीच तीखी बहस देखने को मिली जब जब भूषण ने मिश्रा पर सार्वजनिक रूप से इस मामले में हितों के टकराव का आरोप लगाया। इसने न्यायिक अनुशासनहीनता और देश के वरिष्ठ जजों के प्रति घटते भरोसे को उजागर किया है।
    दुनिया के सबसे ताकतवर कोर्ट के लिए ये एक अच्छी खबर नहीं है। कई समीक्षकों ने कोर्ट पर एक साथ सवाल उठाए हैं, जो पहले कभी नहीं देखा गया। समीक्षकों के मुताबिक पिछले एक हफ्ते की घटनाओं से सर्वोच्च पदों पर बैठे जजों पर भरोसा बहुत कम हुआ है। समीक्षकों के मुताबिक इसके कारण न्यायपालिका के भविष्य पर भी सवाल खड़े हुए हैं।
    समीक्षकों का कहना है कि आम लोगों का जो न्यायपालिका पर भरोसा है और इसके लिए इज्जत है, उसे बचाए रखने में वकील और जज दोनों ही नाकाम रहे हैं।
    जाने-माने स्तंभकार प्रताप भानु मेहता का मानना है कि आपातकाल के बाद सुप्रीम कोर्ट के लिए ये सबसे बड़ा संकट का समय है। आपातकाल सुप्रीम कोर्ट का सबसे खराब समय था जब उसे उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आगे झुकना पड़ा था। वो सही भी हो सकते हैं।
    बेंगलुरू के एक लीगल सलाह देने वाले एडवाइजरी गु्रप विधि लीगल पॉलिसी के शोधकर्ता आलोक प्रसन्ना कुमार के मुताबिक कि आपातकाल के समय सरकार ने जजों को डराकर कमजोर कर दिया था। लेकिन अब जो हम देख रहे हैं, वो एक अदरूनी संकट है। 
    प्रसन्ना के मुताबिक कि जिन जजों पर इस संस्था को बचाए रखने की जिम्मेदारी है, ऐसा लग रहा कि उन्हें एक-दूसरे पर ही भरोसा नहीं है। ये इस महान संस्था को खोखला कर रहा है
    सुप्रीम कोर्ट देश की न्यायपालिका की आखिरी सीढ़ी है, उसके पास संवैधानिक अधिकार हैं और आम लोगों के लिए ये बहुत महत्वपूर्ण है। ये सबसे व्यस्त कोर्ट भी है। साल 2015 में इसने 47,000 केसों का निपटारा किया। पिछले साल फरवरी तक सुप्रीम कोर्ट में 60 हजार केस लंबित थे।
    कई लोगों का मानना है कि ये दिखा रहा है कि लोगों का भरोसा न्यायपालिका में घट रहा है। कई भारतीय जजों को अब निष्पक्ष और ईमानदार नहीं मानते हैं। सुनवाई कई वर्षों तक या कई दशकों तक चल सकती है। जिला अदालतों में तीन करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं।
    पिछले एक दशक में देश की आबादी और अर्थव्यवस्था बढ़ी है लोकिन सिविल मुकदमों की संख्या में कमी आई है। इससे ये लगता है कि ज्यादातर लोग कोर्ट के बाहर पुलिस या चुने हुए नेताओं की मदद से ही विवाद सुलझा रहे हैं। जानकारों के मुताबिक पिछले एक दशक में उच्च न्यायालय भी त्रुटिपूर्ण नजर आने लगे हैं।
    दिल्ली के सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च और सुप्रीम कोर्ट पर एक किताब की लेखक शिलाशरी शंकर के मुताबिक निचली अदालतें की हालत बुरी थी, लेकिन हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट संदेह से परे थे। लेकिन अब ऐसा नहीं रहा, जो कि डरावना है
    जब से मीडिया और स्वतंत्र संस्थाओं ने इन बड़ी अदालतों की समीक्षा शुरू हुई है, लोगों का गुस्सा बढ़ रहा है। पिछले एक साल में ही ये कोर्ट कई गलत कारणों के चलते सुर्खियों में रहें हैं।
    उनमें से कुछ विवाद हैं-
    जनवरी में एक राज्य सरकार ने साल 2014 के कोर्ट के फैसले से अलग बैलों की लड़ाई से जुड़े एक खेल पर से रोक हटा दी थी। लोगों के भारी विरोध के बाद ये फैसला लिया गया था और वो खेल फिर से शुरू हो गया।
    जून ने सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के एक वरिष्ठ जज से उसके सभी न्यायिक ताकतें छीन कर उन्हें जेल भेज दिया। कोर्ट ने उन्हें अवमानना का दोषी माना। जज ने पीएम को एक चि_ी लिखकर जजों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की थी।
    होटलों और रेस्त्रां के विरोध के बाद सभी हाईवे पर शराब की बिक्री को रोकने वाले फैसले पर भी कोर्ट को दिसंबर में ढील बरतनी पड़ी थी। नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बजाने का आदेश दिया, जिसका कई सिनेमा प्रेमियों ने विरोध किया।
    कोर्ट को सूचना के अधिकार के अंतर्गत लाने में झिझक के कारण भी काफी विरोध हुआ है। समीक्षक कोलिजियम सिस्टम के खिलाफ भी बोलते रहे हैं जिससे अंतर्रत मुख्य न्यायाधीश समेत पांच सबसे वरिष्ठ जजों की कमेटी दो दर्जन से अधिक हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति करती है।
    कोर्ट में अलिखित क्षेत्रीय और और लैंगिक कोटे और वकीलों और जजों के बीच अच्छे रिश्तों के लेकर भी काफी बातें होती हैं। जजों के मुताबिक उनपर राजनीतिक दबाव भी होता है और कई लोग रिटायरमेंट के बाद सम्मानीय सरकारी पदों पर भी जाते हैं।
    इसके पीछे का मुख्य कारण जजों की कम तनख्वाह है। पिछले 67 वर्षों में जजों की तनख्वाह सिर्फ चार बार बढ़ाई गई है, वो भी सांसदों की तुलना में कम रेट से। इसके बाद ये भी आशंका जताई जाती है कि शीर्ष पदों पर बैठे जजों के पास काफी ज्यादा काम होता है।
    अपने किताब के लिए रिसर्च करते समय डॉक्टर शंकर ने पाया कि एक हाईकोर्ट जज दिन में करीब 100 केस सुनता है। एक हाई कोर्ट जज ने अपने साथ काम करने वाले को बताया कि उन्होंने एक दिन 300 केस सुने थे। सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने चार साल में अकेले 6000 केस सुने थे।
    कुछ लोगों का मानना है कि जजों का कार्यकाल बहुत छोटा होता है, एक बड़ी कोर्ट में औसतन कार्यकाल चार साल से कम होता है जिसके कारण उनके अंदर अपने कोर्ट पर अधिकार की भावना नहीं आती और वो सही नेतृत्व नहीं कर पाते।
    आलोक कुमार प्रसन्ना के मुताबिक कि इनती जल्दी एक संस्था का चार्ज लेना मुमकिन नहीं होता है। कोर्ट के फैसले उदारपंथी और रूढि़वादी मानकिसताओं का एक मिश्रण रहे है। कोर्ट ने गे सेक्स को नकार दिया लेकिन ट्रांसजेंडर को तीसरे जेंडर की तरह स्वीकृति दे दी। कोर्ट ने मनमाने तरीके से राष्ट्रगान को सिनेमा हॉल में बजाना अनिवार्य कर दिया, वहीं दूसरी तरफ निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार भी मान लिया।
    अंत में, कई लोगों का कहना है कि पिछले कुछ दिनों की घटनाएं इस ओर इशारा कर रही हैं कि इस समय जब संस्थाए अपनी साख खोती जा रही हैं, कोर्ट आपस में बंटे हुए हैं और जनतंत्र में इनकी भूमिका चिंता का विषय है। डॉक्टर शंकर के मुताबिक ये सुनिश्चित करना बहुत जरूरी है कि न्यायपालिका लोगों को प्रति जिम्मेदार रहे। शंकर के मुताबिक  कि न्यायपालिका जनतंत्र से ऊपर नहीं है. (बीबीसी)

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Posted Date : 18-Nov-2017
  • एचएस पनाग, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल
    जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे को राजधानी हरारे में उनके घर में नजरबंद कर लिया गया है। दावा किया जा रहा है कि सेना ने वहां तख्तापलट कर सत्ता पर कब्जा कर लिया है। इससे पहले तुर्की और वेनेजुएला में तख्तापलट की असफल कोशिशें हो चुकी हैं। पाकिस्तान में देश की आजादी के कुछ ही दिनों बाद से तख्तापलट का जो सिलसिला चला वो हाल तक जारी रहा।
    लेकिन अफ्रीका और लातिन अमरीका या फिर मध्यपूर्व के कुछ देशों की तरह भारत में तख्तापलट जैसी कोई घटना नहीं घटी। भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं इतनी मजबूत हैं कि भारत में सेना के लिए तख्तापलट करना बिल्कुल भी असंभव है। इसके बहुत स्वाभाविक कारण हैं। भारत की सेना की स्थापना अंग्रेजों ने की थी और उसका ढांचा पश्चिमी देशों की तर्ज पर बनाया था। इस बात पर गौर किया जा सकता है कि पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में तख्तापलट की घटनाएं नहीं हुईं।
    हालांकि 1857 की जो बगावत के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने सेना का पुनर्गठन किया। उन्होंने पूरे भारत से सैनिकों की भर्ती की। हालांकि उन्होंने जाति आधारित रेजिमेंट भी बनाईं लेकिन जो दस्तूर और अनुशासन उन्होंने बनाए वो बिल्कुल एंग्लो सेक्शन कल्चर की तर्ज पर थे।
    यही कारण रहा है कि भारतीय फौज बहुत अनुशासनात्मक रही है। साल 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध तक भारती फौज की अच्छी खासी तादाद थी और ऐसा नहीं होता तो फौज को विद्रोह करने से कोई बात नहीं रोक सकती थी, लेकिन उस समय अलग-अलग रजवाड़ों और रियासतों की वजह से उतनी एकता नहीं थी और सेना में भी क्षेत्र और जातीय आधार पर रेजिमेंटें बनीं थीं। यही कारण रहा कि भारतीय फौज बरकरार रही।
    इसके बाद द्वितीय विश्वयुद्ध का समय आया। उस दौरान आजाद हिंद फौज के गठन की कोशिश हुई तब भी केवल 12 से 20 हजार सैनिक ही आईएनए का हिस्सा बने। जबकि 40 से 50 हजार भारतीय सैनिक विरोधियों के कब्जे में थे। पर सेना का अनुशासन नहीं टूटा।
    साल 1946 में बांबे में नेवी विद्रोह हुआ। लेकिन उस समय तक भारतीय सेना की तादाद 25 लाख के आस पास पहुंच चुकी थी। उस लिहाज से देखें तो नेवी विद्रोह भी एक अपवाद ही था क्योंकि उसमें केवल 10 हजार के करीब सैनिकों ने हिस्सा लिया वो भी नेवी के।
    एक बात ध्यान देने की बात है कि उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध का समय था, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन भी अपने चरम पर था और इससे सैनिक भी अछूते नहीं थे। नेवी विद्रोह का असर कई जगह रहा लेकिन कुल मिलाकर भारतीय फौज एकजुट ही रही। इसी तरह का अपवाद 1984 में सामने आया जब स्वर्ण मंदिर पर कार्रवाई के विरोध में कुछ सिख यूनिटों ने विद्रोह कर दिया था। लेकिन बाकी फौज एकजुट रही इसलिए इन विद्रोहों को दबा दिया गया। साठ के दशक में जनरल सैम मानेकशॉ और मौजूदा सरकार के बीच अनबन की खबरें आईं, लेकिन उसका भी स्वरूप कोई व्यापक नहीं था।
    असल में जब पहली बार अंतरिम सरकार बनी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय सेना को लोकतांत्रिक सरकार के नियंत्रण में रहने का सिद्धांत रखा। इसके लिए सबसे पहले उन्होंने कमांडर इन चीफ का पद खत्म कर दिया। इस पद पर अंग्रेजी हुकूमत में अंग्रेज अफसर तैनात होते थे और बाद में इस पद पर जनरल करियप्पा को नियुक्त किया गया था।
    नेहरू ने कहा कि जब फौज का आधुनिकीकरण हो रहा है तो थल सेना, नौसेना और वायुसेना की अहमियत बराबर होगी और उसी समय तीनों के अलग अलग चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बना दिए गए। इन तीनों के ऊपर रक्षामंत्री को रखा गया जो चुनी हुई सरकार के कैबिनेट के तहत काम करता है। जनरल करियप्पा को पहला थल सेना अध्यक्ष बनाया गया। उस समय कमांडर इन चीफ का आवास तीन मूर्ति होता था। बाद में नेहरू ने उसे अपना घर बनाया।
    ये एक बहुत ही सांकेतिक काम था और संदेश साफ था कि देश में लोकतांत्रिक सरकार ही सुप्रीम सत्ता रहेगी। एक बार जनरल करियप्पा ने सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना की तो नेहरू उन्हें पत्र लिखकर और बुलाकर नागरिक सरकार के कामों में दखल न देने की हिदायत दी थी।
    दरअसल भारत में लोकतंत्र की जो नींव रखी गई, सेना भी उसका हिस्सा बन गई। बाद में चुनाव आयोग, रिजर्व बैंक जैसी लोकतांत्रिक संस्थाएं खड़ी हो गईं, इसने लोकतंत्र की नींव को काफी मजबूत किया। इसके बाद पाकिस्तान की तरह के तख्तापलट के खतरे लगभग समाप्त से हो गए। पाकिस्तान में तो 1958 में ही तख्तापलट हो गया। उसी दौरान अफ्रीकी और दक्षिणी अमरीकी देशों में तख्तापलट हुए।
    भारतीय लोकतंत्र जब अपने पैर जमा रहा था, उस नाजुक दौर का खतरा खत्म हो गया। इसमें भारतीय फौज का अराजनीतिक प्रकृति और जनरल करियप्पा की बड़ी भूमिका रही। बाद के समय में जनरल सैम मानेक शॉ के साथ एक विवाद जुड़ा। दिल्ली में उस दौरान कोई प्रदर्शन चल रहा था और सैम मानेक शॉ ने सेना की एक ब्रिगेड की दिल्ली में तैनात की थी, ताकि किसी अप्रिय घटना से निपटा जा सके। हालांकि उन्होंने आलोचना करने वालों को जवाब देते हुए कहा था कि घबराने की कोई बात नहीं ये कोई तख्तापलट की कोशिश नहीं है।
    देश में सेना की सात कमान है और ये संभव नहीं है कि एक जनरल एक साथ सातों कमान को आदेश दे। तब जबकि इनके कमांडर सेनाध्यक्ष से महज एक या दो साल पीछे होते हैं। किसी आदेश को इतनी आसानी से वे नहीं मान सकते जो अनुशासन से संबंधित हो। बाद के समय में हम देखते हैं कि तत्कालीन जनरल वीके सिंह जोकि सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति में आकर मौजूदा सरकार में मंत्री बन गए हैं, उन्होंने पूर्ववर्ती यूपीए सरकार को चुनौती दी थी, लेकिन वो भी कोर्ट में।
    हालांकि इंडियन एक्सप्रेस ने कुछ आर्मी टुकडिय़ों के दिल्ली की ओर मार्च की खबर प्रकाशित की थी, लेकिन उसमें भी किसी तख्तापलट जैसा कुछ नहीं था। भले ही ये दावा किया गया हो कि सरकार में उस समय हड़कंप मच गया था और टुकडिय़ों को तुरंत वापस जाने के आदेश दिए गए थे। असल में सेना को तख्तापलट का तब मौका मिलता है जब देश में बहुत अस्थिरता हो, राजनीतिक विभाजन चरम पर हो और लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हों या भेदभाव या अराजकता की स्थिति हो।
    भारत में ऐसी स्थिति कभी पैदा ही नहीं हुई। यहां तक कि इमरजेंसी के दौरान भी सेना राजनीति से अलग रही और कुछ लोग इस बात के लिए उसकी आलोचना भी करते हैं कि तीनों सेनाध्यक्षों को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलकर इमरजेंसी के बारे में बात करनी चाहिए थी।
    फिर भी सेना राजनीति से दूर रही। क्योंकि की नींव में अनुशासन का ऐसा सिद्धांत मौजूद है जो उसे एकजुट रखता है और साथ ही नागरिक प्रशासन में हस्तक्षेप से दूर रखता है।
    (बीबीसी संवाददाता संदीप राय से बातचीत के आधार पर।)

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Posted Date : 18-Nov-2017
  • आलोक कु. गुप्ता,  एसोसिएट प्रोफेसर,  दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि
    भारतीय विदेश नीति पिछले कई दशक से 'लुक वेस्ट पॉलिसी' में सफलता के लिए हर संभव तरीके से प्रयासरत थी। कारण था, पाकिस्तान के साथ हमारे संबंधों की अस्थिरता। लेकिन, पश्चिम की तरफ रास्ते न खुलने के कारण पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के समय 'लुक इस्ट पॉलिसी' का आगाज हुआ, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'एक्ट इस्ट पॉलिसी' में तब्दील करने की वकालत की और पूरब की तरफ हमें कई प्रकार की सफलताएं हासिल हुईं। पूरब के देशों के साथ हमारे व्यापार और राजनीतिक संबंध पश्चिम की अपेक्षा कई गुना सफल और अग्रसर हैं। बीते 29 अक्तूबर को पहली बार भारत के कांडला बंदरगाह से अफगानिस्तान के लिए प्रथम शिपमेंट चाबहार बंदरगाह भेजा गया। यह भारतीय विदेश नीति की सफलता है, क्योंकि इसके साथ ही भारत और ईरान के बीच कनेक्टिविटी के लिए चाबहार बंदरगाह ऑपरेशनल हो गया, जिसका इंतजार कई वर्षों से था। भारतीय विदेश नीति एवं राष्ट्रीय हित के लिए इसके कई दूरगामी परिणाम मिलेंगे।
    पहला, यह सफलता स्वयं में पाकिस्तान को और उसके साथ चीन को मुहतोड़ जवाब है। क्योंकि, पाकिस्तान को शायद ऐसा लग रहा था कि भारत को पश्चिम की तरफ अपनी पहुंच बनाने हेतु पाकिस्तान की सरजमी से ही गुजरना होगा। ज्ञात हो कि भारतीय नौसेना के अधिकारी कुलभूषण जाधव, जिसे उसने जासूसी आरोप लगाकर अपने यहां जेल में बंद कर रखा है, से उनकी पत्नी को मानवीय आधार पर मिलने की इजाजत दी है। ऐसा कहा जा सकता है कि पश्चिम की ओर भारत की इस सफलता के मद्देनजर पाकिस्तान दबाव में आकर भारत के साथ वार्ता आरंभ करने को इच्छुक हो।
    दूसरा, यह मार्ग चीन के लिए भी सामरिक चिंता का विषय बनेगा। क्योंकि चीन द्वारा पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को विकसित किया गया है। ग्वादर के रास्ते चीन सीपीइसी को विकसित कर रहा है, जो उसके अब तक के प्रशांत महासागर के मार्ग से हो रहे व्यापार के रास्ते को कई गुना कम कर देगा। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत चीन भारत को भी उसमें शामिल करने का प्रयास कर रहा है, जो चीन की एक सामरिक चाल है।  गौरतलब है कि सीपीइसी 'पाक-अधिकृत कश्मीरÓ की विवादित भूमि से गुजर रहा है। अत: भारत के इसमें शामिल होते ही इस भूमि पर पाकिस्तान की वैधता कायम हो जाती।  
    तीसरा, इससे भारत-ईरान के बीच कनेक्टिविटी बढ़ेगी, जिससे भारत को फायदा मिलेगा। ईरान सरकार द्वारा चाबहार को मुक्त व्यापार और औद्योगिक क्षेत्र के रूप में नामित किया गया है, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में इसकी मुख्य भूमिका को इंगित करता है।  
    चाबहार से अफगानिस्तान तक रेल और सड़क मार्ग विकसित करने पर बात चल रही है। इसके तहत भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच चाबहार बंदरगाह का उपयोग करते हुए परिवहन एवं मालवहन गलियारा बनाने की कोशिश है। भारत 'लुक वेस्ट पॉलिसी' के तहत बेसब्री से पश्चिम की ओर कनेक्टिविटी बढ़ाने को लालायित है, जो भारत को सामरिक दृष्टि से भी अरब सागर में मजबूत करेगा।
    चौथा, इससे मध्य एशिया और यूरोप तक भारत द्वारा शिपमेंट भेजने का खर्च और समय लगभग आधा हो जाएगा। यह एक महत्वपूर्ण व्यापारिक रास्ता है, जो भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया का द्वार खोलता है। मध्य एशिया के रास्ते ही भविष्य में यूरोप होते हुए रूस के बाजार में पहुंचने के मार्ग सुगम हो जाएंगे। चाबहार बंदरगाह सामरिक और ऊर्जा के लिहाज से काफी समृद्ध है।  इस बंदरगाह तक भारत के पश्चिम तट से फारस की खाड़ी के रास्ते सीधा पहुंचा जा सकता है। यह मार्ग इस क्षेत्र पर चीन के एकाधिकार को समाप्त कर अच्छी प्रतिस्पर्धा देगा। चाबहार से ग्वादर बंदरगाह मात्र 72 किमी की दूरी पर है। इस कारण चाबहार को विकसित करने हेतु भारत और ईरान के बीच 2003 से ही बात आरंभ हो चुकी थी, परंतु ईरान पर लगे प्रतिबंध के कारण यह कार्य धीमी गति से चल रहा था।  
    पांचवां, अंतरराष्ट्रीय संबंधों के नजरिये से यह भी महत्वपूर्ण है कि अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने बीते 24-25 अक्तूबर के भारत दौरे पर यह स्पष्ट कर दिया कि ईरान के साथ वैध कारोबार पर अमेरिका को कोई नाराजगी नहीं है। वर्तमान में भारत के लिए अमरीका का आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक महत्व बहुत ज्यादा है, जिसे वह खोने की स्थिति में नहीं है। अत: अमेरिका का सॉफ्ट रुख भारतीय कुटनीति के परिपक्व होने का परिचायक है। चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के जवाब में भारत जिस विकल्प की तलाश में था, वह कार्यक्रम तो चल पड़ा, परंतु इस सफलता का भविष्य इस पर निर्भर करेगा कि भारत इसके लिए फंड की व्यवस्था कहां से और कैसे करेगा। क्योंकि, इस प्रोजेक्ट का मुख्य किरदार रूस अभी आर्थिक रूप से इतना सक्षम नहीं दीखता। 
    इसमें ईरान और मध्य एशिया के देश कितना रुचि लेते हैं, वही भारत के इस अल्टरनेटिव 'ट्रेड रूट' का भविष्य तय करेगा। अब भारत की विदेश नीति एवं कूटनीति को सक्रिय एवं गतिशील होने की आवश्यकता है, क्योंकि हमारे दोनों पड़ोसी देश- पाकिस्तान और चीन, दोनों इस अल्टरनेटिव को विफल करने का भरपूर प्रयास करेंगे। http://www.prabhatkhabar.com/

     

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Posted Date : 18-Nov-2017
  • कुलदीप कुमार
    यूं तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हर समय खतरा मंडराता रहता है लेकिन पिछले वर्षों में स्थिति कुछ ज्यादा ही गंभीर हो गई है। हर प्रकार के कट्टरपंथी साहित्य, चित्रकला, सिनेमा और वैचारिक विमर्श पर अंकुश लगाना चाहते हैं और इसके लिए वे धमकी, हिंसा और अन्य किसी भी किस्म के गैरकानूनी तरीके अपनाने में भी गुरेज नहीं करते। वे सरकारें भी अक्सर इनके दबाव के आगे झुक जाती हैं जो इनसे सहमत नहीं होतीं। और, जो सहमत होती हैं, वे तो इनकी बात मानती ही हैं।
    दो ताजातरीन उदाहरणों से स्थिति की नजाकत समझ में आ सकती है। गोवा में 20 नवंबर से अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव शुरू होने वाला है लेकिन उसके शुरू होने से पहले ही अंतरराष्ट्रीय निर्णायक मंडल के तीन सदस्य इस्तीफा दे चुके हैं क्योंकि निर्णायक मंडल द्वारा चुनी गई तीन फिल्मों के प्रदर्शन पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने रोक लगा दी है क्योंकि हिंदुत्ववादी तत्व उन्हें अश्लील बता कर उनका विरोध कर रहे थे। उधर जाने-माने फिल्म निदेशक संजय लीला भंसाली की 1 दिसंबर को रिलीज होने जा रही फिल्म 'पद्मावतीÓ को लेकर देश भर में बवाल मचा हुआ है।
    फिल्म की नायिका दीपिका पादुकोण की सुरक्षा बढ़ाई जा रही है क्योंकि उनकी नाक काटने से लेकर उनके खिलाफ अन्य किस्म की हिंसा करने की खुलेआम धमकियां दी जा रही हैं। अनेक राजपूत संगठन और हिन्दू जागरण मंच के साथ-साथ स्वयं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ फिल्म के खिलाफ प्रचार में लगे हैं क्योंकि उनका आरोप है कि सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के स्वप्न में उसके और पद्मावती के बीच प्रेमदृश्य दिखा कर भंसाली ने राजपूती आन-बान का अपमान किया है। यह बात दीगर है कि फिल्म सेंसर बोर्ड के सदस्यों के अलावा अभी तक यह फिल्म किसी ने भी नहीं देखी है और बोर्ड ने इसे प्रदर्शन के लिए प्रमाणपत्र दे दिया है।
    ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का एक दूसरे मामले की सुनवाई के दौरान यह फैसला आना कि कलात्मक अभिव्यक्ति को संरक्षण देना उसका कर्तव्य है और इस क्षेत्र में साधारणत: अदालतों को दखल नहीं देना चाहिए, बेहद राहत देने वाला है। 
    सुप्रीम कोर्ट का काम संविधान का संरक्षण और उसकी व्याख्या है और आम नागरिक अपने अधिकारों की हिफाजत के लिए उसी की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि किसी फिल्म को सेंसर बोर्ड ने प्रदर्शन के लिए प्रमाणपत्र दे दिया है तो फिर अदालतों को उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। संस्थाओं की स्वायत्तता और उनकी गरिमा की रक्षा करने की दिशा में यह टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
    पिछले कई दशकों के दौरान इतिहास, साहित्य और कलाओं पर लगातार इस आधार पर हमले होते रहे हैं कि उनसे इस या उस जाति अथवा धार्मिक समुदाय की भावनाएं आहत होती हैं। जिस तरह आज राजपूत संगठन संजय लीला भंसाली की फिल्म के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं, जबकि यह सिद्ध हो चुका है कि पद्मिनी/पद्मावती सोलहवीं सदी के सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित पूर्णत: काल्पनिक पात्र है। उसी तरह कुछ वर्ष पहले प्रसिद्ध इतिहासकार सतीश चन्द्र की मध्यकालीन इतिहास पर पुस्तक के खिलाफ जाट समुदाय के लोग आंदोलन करने लगे थे। पिछले दिनों राजस्थान की सरकार ने पाठ्यपुस्तकों में बदलाव करके हल्दीघाटी की लड़ाई में अकबर के बजाय राणा प्रताप को विजयी दिखाये जाने का आदेश जारी किया। कुछ वर्षों पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी के पाठ्यक्रम से एके रामानुजन का रामायण की विविधतापूर्ण परंपरा पर लिखा प्रसिद्ध निबंध निकाल दिया गया था क्योंकि हिंदुत्ववादी तत्व उसे हिन्दू भावनाओं को आहत करने वाला बता रहे थे।
    सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह रुझान समाप्त हो जाएगा, ऐसी आशा किसी को भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय और शक्तिशाली तत्व एकाएक निष्क्रिय नहीं हो सकते। लेकिन इस आदेश से उनके उत्साह और उन्माद पर कुछ अंकुश अवश्य लगेगा और वे जरा-जरा सी बात पर अदालत का दरवाजा खटखटाने और अपने विरोधियों को परेशान करने से पहले कुछ क्षण रुक कर जरूर सोचेंगे।   (डॉयचे वैले)

     

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Posted Date : 17-Nov-2017
  •  प्रमोद जोशी
    श्रीश्री रविशंकर की पहल के कारण मंदिर-मस्जिद मसला एक बार फिर से उभर कर सामने आया है। देखना होगा कि इस पहल के समांतर क्या हो रहा है और यह भी कि इस पहल को संघ और सरकार के शीर्ष नेतृत्व का समर्थन है या नहीं। आमतौर पर ऐसी कोशिशों के वक्त चुनाव की कोई तारीख करीब होती है या फिर 6 दिसम्बर जिसे कुछ लोग शौर्य दिवस के रूप में मनाते हैं और कुछ यौमे गम। संयोग से इस वक्त एक तीसरी गतिविधि और चलने वाली है।
    पिछले डेढ़ सौ साल से ज्यादा समय में कम से कम नौ बड़ी कोशिशें मंदिर-मस्जिद मसले के समाधान के लिए हुईं और परिणाम कुछ नहीं निकला। पर इन विफलताओं से कुछ अनुभव भी हासिल हुए हैं। हल की तलाश में श्री श्री अयोध्या का दौरा कर रहे हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से मुलाकात भी की है।
    पृष्ठभूमि में इस मसले से जुड़े अलग-अलग पक्षों से उनकी मुलाकात हुई है। कहना मुश्किल है कि उनके पीछे कोई राजनीतिक प्रेरणा है या नहीं। गुजरात में कांग्रेस पार्टी ने दलितों, ओबीसी और पाटीदारों यानी हिन्दू जातियों के अंतर्विरोध को हथियार बनाया है जिसका सहज जवाब है हिन्दू अस्मिता को जगाना।
    गुजरात में बीजेपी दबाव में आएगी तो वह ध्रुवीकरण के हथियार को जरूर चलाएगी। पर अयोध्या की गतिविधियाँ केवल चुनावी पहल नहीं लगती। गुजरात के चुनाव के मुकाबले ज्यादा बड़ी वजह है सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर 5 दिसम्बर से शुरू होने वाली सुनवाई। इलाहाबाद हाईकोर्ट के सन् 2010 के फैसले के सिलसिले में 13 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। अब इन पर सुनवाई होगी।
    कुछ पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि पार्टी 2019 के पहले मंदिर बनाना चाहती है। कुछ महीने पहले सुब्रमण्यम स्वामी ने ट्वीट किया था, राम मंदिर का हल नहीं निकला तो अगले साल, यानी 2018 में अयोध्या में वैसे ही राम मंदिर बना दिया जाएगा। स्वामी के अनुसार तब तक संसद के दानों सदनों में भाजपा के पास बहुमत होगा। उस वक्त कानून बनाकर राम मंदिर बना दिया जाएगा। इस ट्वीट को हवाई उड़ान मान भी लें, पर यह असम्भव नहीं है।
    बीजेपी के सांसद साक्षी महाराज ने भी पिछले दिनों कहा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी मंदिर निर्माण शुरू करने के बाद ही उतरेगी। लगता है कि पार्टी के भीतर किसी स्तर पर मंदिर को लेकर विमर्श चल रहा है।
    अदालती मध्यस्थता से समझौता सम्भव है। हाल में संघ के एक अनुषंगी संगठन के रूप में श्रीराम मंदिर निर्माण सहयोग मंच भी उभर कर आया है। इस संगठन की मंदिर निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका होगी। यह संगठन इन दिनों सक्रिय है।
    सुब्रमण्यम स्वामी के ट्वीट के एक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को आपसी सुलह के जरिए हल करने की सलाह दी थी। कोर्ट ने कहा था कि दोनों पक्ष बैठकर इस मामले पर अपनी सहमति बना लें। यदि उसके बाद भी सुलह नहीं होती है तो कोर्ट दखल देने को तैयार है।
    भाजपा के सूत्र संकेत दे रहे हैं कि अदालती फैसला आखिरी होगा और उस पर सभी को सहमत होना चाहिए। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जिलानी मानते हैं कि बातचीत या मध्यस्थता से यह मसला हल नहीं हो सकता। पर वे मानते हैं कि मामले का हल कोर्ट से निकल सकता है।
    बाहरी समझौते में बहुत पचड़े हैं। बीजेपी के भीतर मंदिर आंदोलन के नेताओं का एक अलग समूह है। इन नेताओं के स्वतंत्र स्वर हैं। मसलन विनय कटियार किसी चैनल पर इस पहल को लेकर अपने अंदेशे को व्यक्त कर रहे थे।
    संतों-महंतों में कई गुट हैं जिनमें आपसी टकराव है। राम जन्मभूमि ट्रस्ट के सदस्य रामविलास वेदांती ने कहा है, हम मंदिर आंदोलन में 25 बार जेल गए और 35 बार नजरबंद हुए। हमारी उपेक्षा नहीं की जा सकती। अयोध्या के साधु-संतों को विश्वास में लेना होगा। मुसलमानों के बीच भी मतभेद हैं। शिया-सुन्नी संगठनों के बीच मतभेद हैं। शियाओं और सुन्नियों के बीच भी आंतरिक मतभेद हैं।
    सबसे बड़ा सवाल है कि संघ क्या चाहता है? मंदिर मुद्दा बीजेपी के लिए रामबाण का काम करता है, पर इसे ज्यादा समय तक टाला नहीं जा सकता। एक लम्बे अरसे तक पार्टी को इस मुद्दे से किनाराकशी करनी पड़ी।
    सन 1992 के बाद पार्टी राजनीतिक स्तर पर अछूत होती चली गई। मई 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी की पहली सरकार को इसका स्वाद चखना पड़ा। उसके बाद उसने सहयोगी दलों को साधा और 1998 और 1999 में एनडीए की सरकारें बनीं। साल 1989 से 2009 तक पार्टी अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाने का वादा करती रही। पर सन् 2014 के 42 पेजों के चुनाव घोषणापत्र में 41वें पेज पर महज दो-तीन लाइनों में यह वादा किया गया। वह भी संभावनाएं तलाशने का वादा। और यह भी कि यह तलाश सांविधानिक दायरे में होगी।
    बीजेपी को 2019 के फॉर्मूले की तलाश है। पार्टी ने सन् 2009 की पराजय के बाद माना था कि दिल्ली की कुर्सी पर बैठना है तो जनता के सवालों को उठाना होगा। सन 2009 में पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद नितिन गडकरी ने दिसम्बर में अपने पहले संवाददाता सम्मेलन में विकास की बात की, मंदिर की नहीं। उन्होंने इंदौर में पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में कहा था कि अगर मुस्लिम विवादित भूमि पर दावा छोड़ देते हैं तो मंदिर के पास ही मस्जिद भी बनवाई जाएगी।
    यह मस्जिद कहाँ बनेगी? एक तबका कहता है कि सरयू पार बने और दूसरा कहता है कि कहीं पास में ही बने। (बीबीसी)

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Posted Date : 17-Nov-2017
  • प्रकाश दुबे
     दीया तले, नकदी चले
     ढोल नोटबंदी के नुकसान बता रहा था। दूसरी तरफ सत्ता का नगाड़ा पिट-पिट कर शुभ-लाभ गिना रहा था। दो पाटन के बीच में जनता की तूती की आवाज दब गई। सब्जी और किराने की दुकान पर नकदी के बजाए मशीन से भुगतान करने का जमकर प्रचार हुआ था। कहावत तो पक्की-पुरानी है कि दूर के ढोल सुहावने। दीया तले अंधेरा तय है। इसलिए नहीं, कि दीया अब किसी पार्टी का चुनाव-चिन्ह नहीं रहा। इसलिए, कि हवाई अड्डïा बस्ती से कई किलोमीटर दूर रहता है। दिल्ली विमानतल पर पुलिस की टैक्सी सेवा की स्वाइप मशीन बंद है। नकद भुगतान करना पड़ता है। इसकी जानकारी दिल्ली पुलिस, मंत्री अशोक गजपति राजू तक नहीं पहुंची। प्रधानमंत्री टैक्सी से जाते नहीं।   
      आव जो
    राहुल बाबा से लेकर मौनी बाबा मनमोहन सिंह तक गुजरात में प्रचार कर चुके हैं। कांग्रेस को सौराष्टï्र के आम फलों से लदे नजऱ आ रहे हैं। डर है, कोई अमितयां न लूट ले जाए। ज्योतिरादित्य सिंधिया का गुजरात-कनेक्शन है। फिर-फिर जाएंगे। सैम पित्रोदा अमेरिकावासी हैं। कन्फूजिया मत जाना। वे क्रिस्तान नहीं है जैसा कि बरसों पहले बाल ठाकरे अनजाने में  बोल गए थे। सैम भाई को गुजरात के अखाड़े में ताल ठोंकने का न्यौता मिला। हर हाथ को काम मिले या न मिले। सैम पित्रोदा के सहयोग से राजीव गांधी हर हाथ में मोबाइल अवश्य थमा गये। कई कांग्रेसी अनजान हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अभा कांग्रेस कमेटी के सागरपार विभाग के अध्यक्ष सैम पित्रोदा हैं।    
    एक हृदय हो भारत जननी
    प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने तमिल दैनिक दिनथंति के समारोह में चाय बनाना तो नहीं सिखाया। लफ्फाज पत्रकारों को सीख अवश्य दी कि राजनीतिक जागरूकता फैलाने के लिए सरल भाषा का प्रयोग करें। पुरानी तकनीक छोड़कर नए ढांचे में ढलें। मोदी को किसी ने बताया कि थंति का हिन्दी में अर्थ तार होता है। तारघर अतीत में विलीन हो चुके हैं। लेकिन थंति प्रतिदिन निकल रहा है। बातों के तार जोडऩे में प्रधानमंत्री का सानी नहीं। तार सेवा के जिक्र के बाद कहा-अब तो सबके हाथ में मोबाइल हैं। हर मोबाइलधारी समाचार के आदान-प्रदान का स्रोत है। तार ऐसा जुड़ा, कि तमिलनाडु के राजभवन में शिक्षक तमिल सिखाने जाता है। शिक्षार्थी हैं-बनवारी लाल पुरोहित। वणक्कम-धन्यवाद।       
     सर्वोत्तम सीट फिसड्डïी को 
    तय करने वाले करें कि सूझबूझ सुरेश प्रभू की थी या मनोज सिन्हा की?  नाम तो पीयूष गोयल और अश्वनी लोहानी का लिया जाएगा। दोनों महानुभावों के प्रभार संभालने के बाद सर्वोत्तम फिसड्डïी की तलाश आरम्भ हुई। दिल्ली से जबलपुर तक और मुंबई से इलाहाबाद तक रेलवे ने दो सर्वोत्तम फिसड्डïी तलाश कर लिए। दोनों से कहा गया कि फटाफट अफसर बन जाओ। हुआ यूं, कि रेलवे के वाणिज्य विभाग में अफसरों की भर्ती हुई। परीक्षा में असफल व्यक्तियों से दो सर्वोत्तम फिसड्डïी यानी बेस्ट अमंग फेलुअर केंडीडेट्स तलाश किए गए। आरक्षण न दे पाने के लिए बदनाम रेलवे में इस तरह का आरक्षण तो संविधान लिखने वालों ने सपने में नहीं सोचा होगा।    
    (लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

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Posted Date : 17-Nov-2017
  •  डॉ. लखन चौधरी
     पिछले दो-एक दशक से भारत सहित दुनियाभर में महिला जागरण, महिला जागरूकता एवं महिला चेतना अभियान एवं आन्दोलनों में भारी तेजी, प्रगति एवं गतिशीलता देखी जा रही है। अपने अधिकारों के प्रति बड़ी ही सजगता एवं आक्रामकता के साथ संघर्ष करती हुई महिलाएं अब अपनी बेहतरी, बदलाव एवं विकास के लिए प्रत्येक क्षेत्र में ना सिर्फ अपनी गंभीर, जरूरी एवं अनिवार्य उपस्थिति दर्ज करा रही हैं, बल्कि अपनी सकारात्मक, संवेदनशील एवं सजग मुखरता से समाज में एक नई क्रांति का आग़ाज भी जोरशोर से कर रही हैं। 
    यह बहुत अच्छा है क्योंकि महिलाएं सदियों से अत्याचार, शोषण एवं दोयम दर्जे का शिकार रही हैं। इसके लिए एक सशक्त, मुखर एवं प्रखर आवाज उठानी ही चाहिए और उठानी ही होगी, तथा ऐसा लगने भी लगा है कि अब महिलाएं रूकने वाली नहीं हैं।
    वैसे तो आदिकाल से लेकर भारतीय महिलाएं श्रद्धा, सम्मान और शक्ति स्वरुपा के रुप में घर, परिवार, समाज एवं देशभर में पूजनीय रहीं हैं। जीवन मूल्यों एवं जीवन सूत्रों को सहेजने से लेकर आर्थिक प्रबंधन तक व्यक्ति, परिवार एवं समाज की सामाजिक आर्थिक बदलाव, परिवर्तन एवं विकास की प्रत्येक कड़ी में पुरूषों के लिए एक सशक्त, समर्थ एवं सबल प्रेरणा स्रोत रहीं हैं। कला-साहित्य, धर्म-संस्कृति, ज्ञान-चरित्र की आधार, सूत्रधार और अंतिम रक्षक भी रहीं हैं। लेकिन इसके बावजूद महिलाओं पर अत्याचार कम नहीं हुआ और नहीं हो रहा है।
     आज भी देश की तीन-चौथाई से अधिक महिलाओं की स्थिति, उनकी दशा एवं विकास की दिशा के संबंध में अनेकों प्रकार की विसंगतियां, विकृतियां, विषमताएं एवं विरोधाभास देखने को मिलती हैं। ऐसी स्थिति में महिलाओं की स्थिति-दशा एवं महिलाओं के नाम पर चलाये जा रहे आन्दोलनों की भूमिका पर गंभीरतापूर्वक विचार एवं चिंतन करना भी जरुरी, समसामयिक एवं प्रासंगिक लगता है। 
    निश्चित रुप से आज देश-दुनिया का कोई भी क्षेत्र महिलाओं के योगदान से अछूता नहीं रह गया है। वह चाहे कृषि एवं कृषि सहायक क्षेत्र हो अथवा औद्योगिक क्षेत्र अथवा कोई भी सेवा क्षेत्र हो महिलाओं की भागीदारी न सिर्फ बराबरी की है, अपितु कई क्षेत्रों में तो महिलाएं पुरूषों से आगे निकल चुकी हैं। 
    घर, परिवार, समाज और राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की सकल आर्थिक एवं गैर आर्थिक भागीदारी एवं सेवा को जोड़ें तो उनका योगदान दो तिहाई से उपर बैठता है। इसके बावजूद तीन-चौथाई से अधिक महिलाओं की स्थिति, प्रस्थिति, परिस्थिति एवं सामाजिक स्थिति में कोई सकारात्मक बदलाव दिखलाई नहीं दे रहा है। नवीन स्थानीय शासन व्यवस्था के तहत अब पंचायतों एवं नगरीय निकायों में महिलाओं के लिए सीधा 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान भी हो चुका है, मगर ग्रामीण परिवेश में भी इसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई नहीं दे रहा है।  समकालीन भारत में आज महिलाओं के समक्ष सबसे बड़ी समस्या उनकी दोहरी जिम्मेदारी एवं भूमिका को लेकर है। इसके कारण महिलाओं के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। कस्बों, शहरों एवं नगरों-महानगरों में महिलाओं के समक्ष अलग तरह की समस्याएं हैं। तमाम प्रकार सुरक्षा, चेतावनी के बावजूद दुष्कर्म जैसी घटनाएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। आर्थिक स्वावलंबन और मजबूती के नाम पर महिलाओं में अविवाहित रहने, घर-परिवार से अलग रहने, ससुराल में तालमेल न बिठा पाने, तलाक की स्थिति आदि और इनके कारण उपजे एकाकीपन, तनाव-कुण्ठा आदि समस्याएं बड़ी तेजी के साथ बड़ रही हैं। 
    आज की आधुनिक महिलाएं आधुनिकीकरण, पश्चिमीकरण की अंधी दौड़ में विज्ञापनवाद, बाजारवाद, उपभोक्तावाद की बड़ी तेजी के साथ शिकार होती जा रहीं हैं। शिक्षा के विकास प्रचार-प्रसार और बड़े पैमाने पर महिलाओं द्वारा नौकरी करने के कारण हांलाकि अब दहेज जैसी समस्याओं का दंश एवं अभिशाप थोड़ा जरुर कम होने लगा है।  इधर महिलाओं की समस्याओं पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि महिलाओं से जुड़ी समस्याओं का एक दुखद पहलू यह है कि आज भी महिलाओं का विकास, कल्याण और संरक्षण पुरुषों पर निर्भर है। 
    महिला उत्थान, महिला जागरूकता, महिला जागरण, महिला मुक्ति, महिला समानता और महिला स्वतंत्रता से जुड़े सारे कार्यक्रमों, संगठनों, योजनाओं और अभियानों के सूत्रधार एवं दिशा निर्देशक कहीं न कहीं पुरुष ही होते हैं, जिनका उद्धेश्य महिलाओं का किसी ना किसी प्रकार से शोषण करना होता है। महिलाओं के शोषण जैसी घटनाओं के लिए अधिकांश मामलों में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से कोई ना कोई महिला ही जिम्मेदार पाई जाती है। 
    सोशल मीडिया व इलेक्ट्रानिक मीडिया के साथ बढ़ती संचार क्रांति ने महिलाओं की अस्मिता, नैतिकता और उनकी सीमाओं-मर्यादाओं को लेकर कुछ गंभीर सवाल और प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिए हैं, जो आने वाले समय में घर, परिवार और समाज के लिए शायद! संकट खड़ा कर सकते हैं। 
    आने वाले समय में महिलाओं के समक्ष कुछ और समस्याएं आ सकती हैं जैसे बराबर के कानूनी अधिकार से क्या बराबर का सम्मान मिल पायेगा? बिगड़ते लिंगानुपात का महिलाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा? पंजाब, हरियाणा, राजस्थान आदि राज्यों का उदाहरण अच्छा नहीं माना जा सकता है। आने वाले समय में महिलाएं क्या अपने से कम योग्य और कम पढ़े-लिखे पुरुषों या जीवनसाथी के साथ स्वाभीमान और सम्मान के साथ रह पायेंगी? आर्थिक स्वतंत्रता-स्वावलंबन और मजबूती तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता की लहर क्या महिलाओं को अलगाव और तलाक जैसी विकृतियों से बचा पायेगी? इस तरह के अनेक सवाल हैं जिन पर आज समाज को भी चिंतन करने की आवश्यकता है। आज महिलाओं को यह सोचने की जरूरत है कि महिलाओं के लिए चलाये जा रहे आन्दोलनों का प्रभाव महिलाओं की स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन एवं बदलाव के लिए कितना हो रहा है? कहीं ऐसा ना हो कि आन्दोलनों के भंवर में फंसकर महिला अपनी वास्तविक दिशा एवं दशा ही भूल जायें?
    दोहरी जिम्मेदारी, दोहरी कार्यव्यवस्था, दोहरी अर्थव्यवस्था और दोहरी सोच तथा दोहरी मानसिकता के बीच पिसती 21वीं सदी की आधुनिक पढ़ी-लिखी महिलाओं को उनसे जुड़ी समस्याओं, उनके समक्ष आने वाली भावी चुनौतियों तथा इसके उचित और सार्थक समाधान के बारे में भी उन्हे स्वयं सोचना होगा। उन्हे अब स्वयं यह निर्णय लेना होगा कि उनके लिए सही क्या है? और गलत क्या है? बदलाव, विकास और परिवर्तनों को आत्मसात करने का उनका पैमाना क्या होगा एवं क्या होना चाहिए? अब समय आ गया है कि महिलाएं अपनी स्थिति, दशा एवं दिशा के बारे में स्वयं सोचें और गंभीरतापूर्वक विचारविमर्श करें। महिलाओं की स्थिति, प्रस्थिति एवं आर्थिक-सामाजिक स्थिति को सम्मान एवं स्वाभीमान के स्तर तक सुधारने का यही एक सही, सार्थक एवं सकारात्मक कदम हो सकता है।
    (वरिष्ठ सहा. प्रोफेसर अर्थशास्त्र, कल्याण स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय भिलाईनगर-दुर्ग)

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Posted Date : 16-Nov-2017
  • शशांक, पूर्व विदेश सचिव 
    अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ताजा गतिविधियां गौर करने लायक हैं। एशियाई देशों की उनकी 12 दिनों की यात्रा मंगलवार को खत्म हो गई। अंतिम पड़ाव में उन्होंने आसियान बैठक में शिरकत की, जहां हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी उनकी मुलाकात हुई। राष्ट्रपति ट्रंप ने अब तक इतना लंबा दौरा किसी भी क्षेत्र का नहीं किया है। यहां तक कि किसी अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष ने करीब दो दशक के बाद एशियाई महाद्वीप का इतना लंबा दौरा किया है। यह स्थिति तब है, जब खुद ट्रंप द्वारा 'अमरीका फस्र्टÓ का नारा बुलंद किया गया है। ट्रंप की इस यात्रा से तीन तरह की तस्वीरें उभरती हैं, खासकर ट्रंप प्रशासन द्वारा अफगान व एशिया नीति घोषित करने के बाद से। पहली तस्वीर यह है कि अब पाकिस्तान पर अमेरिका का भरोसा कम हुआ है। 
    अब तक अफगानिस्तान के मसले पर अमरीका  की निर्भरता पाकिस्तान पर बनी हुई थी। फिर चाहे इसके पीछे अफगानिस्तान में राजनीतिक स्थिरता कायम करने की मंशा हो अथवा वहां मौजूद अमेरिकी सैनिकों को रसद व अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना। इसके लिए पिछले दस वर्षों में अमरीका ने करीब 30 अरब अमेरिकी डॉलर की इमदाद पाकिस्तान को दी है। मगर अब उसकी इस रणनीति में बदलाव दिख रहा है। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि जिस ओसामा बिन लादेन को ढूंढऩे के लिए अमरीका जहां-तहां हाथ-पांव मार रहा था, वह उसे पाकिस्तान में ही मिला।
    दूसरी तस्वीर, समुद्री रणनीति में भारत की अहमियत को समझना है। अमेरिका ने हाल ही में अपनी 'मैरीटाइम पॉलिसीÓ का एलान किया है। इसमें उसने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान दिया है। इसमें हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में एक रिश्ता बताते हुए कहा गया है कि अमेरिका व भारत एक-दूसरे के सहयोगी हैं। बताया यह भी गया है कि यह समुद्री कारोबार नियम आधारित होगा।
    ऐसा नहीं होगा कि कोई भी देश इसमें जोर-आजमाइश करे, जैसा कि 'दक्षिण चीन महासागरÓ में चीन करता रहता है। साफ है, पहले के मुकाबले अब अमेरिकी नीतियों में भारत को कहीं ज्यादा अहमियत मिल रही है। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय रिश्तों को पूरी तरह से परिभाषित कर दिया गया है, पर जिस तरह की रूपरेखा बनती दिख रही है, उससे साफ है कि भारत को साथ लेकर चलने की मंशा अमेरिका की है। 
    तीसरा परिदृश्य उत्तर कोरिया के संकट के बहाने एशियाई देशों को साथ लेकर चलने का दिख रहा है। ऐसा लगता कि अमेरिका सभी देशों को साथ लेकर उत्तर कोरिया पर दबाव बनाना चाहता है। संभवत: इसीलिए आसियान देशों से बात की जा रही है और उत्तर कोरिया के पड़ोसी देश जापान व दक्षिण कोरिया से भी। यानी अमेरिका एक तरफ इस मसले पर अपनी संवेदनशीलता दिखा रहा है और दूसरी तरफ तमाम देशों से मशविरा करके संकट का समाधान ढूंढऩे की कोशिश भी कर रहा है। यह उसके रुख में आई नई तब्दीली है।
    इन तीनों तस्वीरों के बरक्स अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाकात को देखें, तो साफ जाहिर होता है कि उस मुलाकात में द्विपक्षीय संबंधों पर भी बात हुई है और क्षेत्रीय रिश्तों पर भी। बैठक के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने मीडिया से मुखातिब होकर जो कुछ कहा, उसका सार यही है कि द्विपक्षीय रिश्तों और क्षेत्रीय स्थिरता में भारत की भूमिका को लेकर अमरीका गंभीर तो है ही, अन्य अंतरराष्ट्रीय मसलों व मानवता के लिहाज से भी वह नई दिल्ली के योगदान को समझ रहा है। पुराने दौर में हमने देखा है कि भले ही अमेरिका यह दावा करता रहा हो कि भारत के साथ उसके अच्छे रिश्ते हैं, पर बराक ओबामा जैसे राष्ट्रपति ने 'जी-2Ó की संकल्पना की थी। 
    इस समूह का दूसरा देश चीन था। बिल क्लिंटन ने भी कभी चीन से मदद मांगी थी, क्योंकि उन्हें भारत और पाकिस्तान का परमाणु परीक्षण करना काफी नागवार गुजरा था। एशिया प्रशांत पॉलिसी से भारत को बाहर रखने की भी कभी वकालत की गई थी। मगर अब सब कुछ बदल गया है। अब ऐसा लगता है कि जापान, ऑस्ट्रेलिया, भारत जैसी तमाम क्षेत्रीय ताकतों के साथ मिलकर अमेरिका एक मजबूत रिश्ता विकसित करना चाहता है। पहले भले ही 'अमेरिकन पिवटÓ की बातें होती रही हैं, पर अब सभी की भागीदारी और सबके हितों की पूर्ति के बारे में सोचा जा रहा है।
    यह भारत और अमरीकी रिश्तों की एक नई शुरुआत है, जिसमें कारोबारी संबंध की भी बात हो रही है, सुरक्षा संबंधों की भी, क्षेत्रीय देशों की उम्मीदों की भी और समुद्री सहयोग की भी। हालांकि भारत की अपनी चिंताएं भी हैं। चीन को नाराज करने का जोखिम फिलहाल हम नहीं उठा सकते। 
    यह सही है कि हाल ही में डोका ला को लेकर दोनों देश आमने-सामने आ गए थे। चीन की मंशा भूटान और भारत पर दबाने बनाने की थी। मगर इस मसले का समाधान हमारे हित में निकला है। ऐसे में, नई दिल्ली को उम्मीद है कि पाकिस्तान पर दबाव बनाने की कोशिश भी रंग लाएगी। इसकी वजह यह भी है कि चीन अब खुद आतंकवाद का दंश झेलने लगा है और पाकिस्तान को बहुत महत्व देने से अफगानिस्तान में उसके हित भी प्रभावित हो सकते हैं। इसीलिए बेहतर यही होगा कि भारत और चीन का रिश्ता सौहार्दपूर्ण तरीके से आगे बढ़े।
    अच्छी बात यह है कि आसियान जैसे मंचों से भी हमें पर्याप्त सहयोग मिल रहा है। भले ही आसियान देशों के साथ इन्फ्रास्ट्रक्चर कनेक्टिविटी के मामले में हम चीन से पीछे हों, लेकिन उनके साथ हमारे रिश्ते तेजी से विकसित हो रहे हैं। आगामी गणतंत्र दिवस के मौके पर आसियान देशों के तमाम शासनाध्यक्षों को नई दिल्ली का आमंत्रण इसी की अगली कड़ी है। उम्मीद है कि केंद्र सरकार ऐसे फ्रेमवर्क की ओर बढ़ेगी, जिसमें भारत के सभी पुराने मसलों का निपटारा तेज गति से होगा और तमाम देश एक मजबूत बंधन में बंधकर तरक्की करेंगे।  http://www.livehindustan.com/blog/

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Posted Date : 16-Nov-2017
  • अफरोदिति पिना, वरिष्ठ प्राध्यापिका, केंट विवि, इंग्लैण्ड
    पूरी दुनिया में कामकाजी महिलाएं यौन उत्पीडऩ की शिकार हो रही हैं। हाल ही में हॉलीवुड में फिल्म निर्माता हार्वी वाइनस्टीन को लेकर बहुत से कलाकारों ने आवाज उठाई। इसके बाद भारत में भी बहुत सी अभिनेत्रियों ने यौन उत्पीडऩ की बात कही। हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया।
    इस मामले के सामने आने के बाद पूरी दुनिया में महिलाओं ने मी टू हैशटैग के जरिए आपबीती सुनाई और यौन उत्पीडऩ के खिलाफ आवाज उठाई। दफ्तरों और कामकाजी जगहों पर यौन उत्पीडऩ कोई नई बात नहीं। नई बात ये है कि अब इसके खिलाफ जोर-शोर से आवाज उठाई जा रही है। लोग खुलकर इस मसले पर बात कर रहे हैं।
    पहले जहां महिलाएं इसे नियति मानकर सिर झुकाकर मंजूर कर लेती थीं। वहीं, अब वो इसका विरोध कर रही हैं। दफ्तरों में यौन उत्पीडऩ सेक्स क्राइम यानी यौन अपराध के दर्जे में आता है। कुछ कही बातें, कुछ अनकहे इशारे, गलत नीयत से किसी को छूना यौन उत्पीडऩ माना जाता है। ये बलात्कार जैसा ही है।
    आमतौर पर कामकाजी महिलाओं को सेक्स के बदले में फायदा पहुंचाने का वादा किया जाता है। ऑफिस में बड़े अफसर अपनी मातहत महिलाओं को फायदा पहुंचाने का वादा कर के उनका यौन शोषण करते हैं।
    हार्वी वाइनस्टीन के मामले में ऐसा ही हुआ था। हालांकि ऐसे मामले कुल यौन शोषण का महज 3 से 16 फीसदी हिस्सा होते हैं। दफ्तर में बलात्कार के मामले तो और भी कम होते हैं। कुल यौन शोषण के मामलों का महज एक से 6 फीसदी।
    यौन उत्पीडऩ का मतलब है, बेहूदा जुमलेबाजी, बार-बार मिलने की गुजारिश, किसी लड़की के शरीर की बनावट के बारे में टिप्पणी, घूरना, सीटी बजाना और बेहूदा इशारेबाजी।
    कुल यौन उत्पीडऩ के मामलों का 55 प्रतिशत यही बर्ताव होता है। यौन उत्पीडऩ पर आधिकारिक रिपोर्ट पूरी सच्चाई नहीं बताती हैं। दफ्तर में छोटे कर्मचारी अक्सर इसके शिकार होते हैं। वो पीडि़त होने के बावजूद खामोशी अख्तियार करना बेहतर समझते हैं। कई बार तो उनकी शिकायतें भी अनसुनी कर दी जाती हैं। यौन उत्पीडऩ से लड़ाई की पहली शर्त है कि शिकायतों को गंभीरता से लिया जाए।
    बार-बार बुरा बर्ताव भी दफ्तर का माहौल खराब करता है। पीडि़त युवती के काम पर असर डालता है। उसकी सेहत पर भी यौन उत्पीडऩ का बुरा असर पड़ता है। यौन उत्पीडऩ की शिकार महिलाएं अक्सर डिप्रेशन और सदमे की शिकार हो जाती हैं। इसका असर उनके करियर, उनकी तरक्की पर भी पड़ता है। उनकी बुरी हालत से साथी कर्मचारी भी प्रभावित होते हैं।
    महिलाएं यौन उत्पीडऩ से निपटने के कई तरीके अपनाती हैं। ये सामने वाले के बर्ताव और मामले की गंभीरता पर निर्भर करता है। पहले तो वो उत्पीडऩ करने का विरोध करती हैं। उससे दूरी बनाती हैं। अपने दोस्तों, सहयोगियों और रिश्तेदारों से इस बारे में बात करती हैं। वो सीधे-सीधे आरोपी को चुनौती देती हैं। या फिर तंग आकर उसकी शिकायत करती हैं।
    सबसे ज्यादा महिलाएं दूरी बनाने का तरीका अपनाती हैं। हालांकि ये ज्यादा कारगर नहीं होता। क्योंकि अक्सर ऐसे मामलों में आरोपी और हमलावर हो जाता है। बेहतर तरीका है कि यौन उत्पीडऩ करने वाले का सामना किया जाए। उसकी शिकायत की जाए। असल में महिला कर्मचारी यौन उत्पीडऩ से कैसे निपटेंगी, ये बात बहुत कुछ दफ्तर के माहौल पर निर्भर करती है।
    अगर महिला को ये लगेगा कि आरोपी की शिकायत से उसके करियर पर असर पड़ेगा, तो वो खामोश रहना और दूरी बनाना बेहतर समझती हैं। अगर मामला बहुत गंभीर हो जाता है, तो ही वो शिकायत करती हैं। इससे भी पहले वो देखती हैं कि पहले की शिकायतों में दफ्तर की तरफ से क्या कदम उठाए गए।हार्वी वाइनस्टीन के मामले में ये बात सामने आई कि उसका बर्ताव सब को मालूम था। अक्सर उसके दफ्तर के लोग यौन उत्पीडऩ की घटनाओं से आंखें मूंदे रहते थे। यानी वो भी कहीं न कहीं हार्वी के जुर्म में साझीदार थे। उनकी खामोशी ने हार्वी के बर्ताव को हवा दी। उसका हौसला बढ़ाया। दफ्तरों में ऐसा माहौल होने पर महिलाएं खामोशी से सब बर्दाश्त करती हैं।
    वैसे भी अलग-अलग महिलाओं के लिए यौन उत्पीडऩ का दर्जा अलग होता है। कोई छोटी सी बात पर भी बिफर सकता है। किसी के बर्दाश्त करने की हद ज्यादा होती है। या उसे ये समझने में वक्त लगता है कि उसका उत्पीडऩ हो रहा है।
    सबसे जरूरी बात ये है कि इसके खिलाफ आवाज उठाने वालों को डर न लगे। वो खुलकर अपनी बात कह सकें। वो ये बता सकें कि किसी का भद्दा मजाक उन्हें जरा भी पसंद नहीं आया। किसी का भद्दा कमेंट बुरा लगा। दफ्तर के दूसरे लोगों को भी इस बात की आवाज उठाने वालों का समर्थन करना चाहिए।
    ये हमारी जिम्मेदारी है कि हम दफ्तर का माहौल काम करने लायक बनाएं। जिसमें लोग सम्मान के साथ काम कर सकें। उनके मानवाधिकारों का हनन न हो। कर्मचारियों को इसके लिए वक्त-वक्त पर ट्रेनिंग दी जानी चाहिए।
    आज कल आप सोशल मीडिया के जरिए भी दफ्तर में यौन उत्पीडऩ के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं। उन लोगों से अपनी तकलीफ साझा कर सकते हैं, जो उसके शिकार हुए। जैसे कि मी टू अभियान में बहुत से लोगों ने अपनी आवाज बुलंद की और तजुर्बा साझा किया।
    सोशल मीडिया पर ऐसे अभियान दूसरों को सुनने के लिए भी होते हैं और अपना बुरा तजुर्बा बताने के लिए भी। ये हमें सबक भी देते हैं। आप पीडि़तों के साथ हमदर्दी महसूस करते हैं। खुद को उनके करीब पाते हैं। (बीबीसी)

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Posted Date : 15-Nov-2017
  •  ऐना एमएम वेट्टीकाड
    हाल की दो घटनाएं उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक मतभेद के कारगर उदाहरण हैं। रविवार को बेंगलुरु में तमिल, तेलुगू और कन्नड़ अभिनेता प्रकाश राज ने सत्ताधारी बीजेपी पर सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए हर विरोध को चुप कराने का आरोप लगाया। उनकी प्रतिक्रिया हिंदी फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली के उस वीडियो के कुछ देर बाद आई जिसमें भंसाली अपनी फिल्म पद्मावती का विरोध कर रहे असंतुष्ट हिंदुत्व समूह खासकर राजपूत संगठनों को शांत करने की कोशिश करते दिख रहे हैं।
    पिछली सर्दियों के दौरान महाराष्ट्र में उनकी फिल्म के विरोध के जवाब में करण जौहर द्वारा जारी वीडियो की तुलना में भंसाली के स्वर सच में दयनीय नहीं थे।
    नवनिर्माण सेना ने तब पाकिस्तानी कलाकारों के होने के कारण ऐ दिल है मुश्किल का विरोध किया था। हालांकि, हिंसा और तथ्यात्मक रूप से निराधार आपत्तियों के मद्देनजर भंसाली और उनकी टीम अब तक उस फिल्म के लिए समझौताकारी सुर अपनाए हैं जो अभी रिलीज नहीं हुई है।
    इसके विपरीत दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योगों की ओर से करीब एक महीने से बीजेपी को निशाना बना कर लगातार कड़े प्रहार किए जा रहे हैं। तमिल फिल्म दिग्गज कमल हासन ने हाल ही में एक पत्रिका के कॉलम में हिंसक हिंदू कट्टरता के उत्थान की निंदा की है।
    हासन उन सितारों में से थे जिन्होंने तब सुपरस्टार विजय का समर्थन किया जब तमिलनाडु में बीजेपी ने उनकी फिल्म मेरसल में जीएसटी का मजाक उड़ाने पर आपत्ति जताई और उसे हटाने की मांग की। विजय पर मेरसल के दक्षिणपंथी विरोधियों ने उनके ईसाई मूल का होने को लेकर भी हमला किया था जिसका उन्होंने अपने पूरे नाम सी जोसेफ विजय के साथ एक धन्यवाद पत्र जारी कर सामना किया।
    भारतीय कलाकारों को दशकों से उनके काम और बयानों के लिए राजनीतिक संगठनों और धार्मिक समुदायों द्वारा परेशान किया जाता रहा है।
    यहां और विदेश में भी कई उदारवादी समीक्षकों का मानना है कि 2014 में बीजेपी के केंद्र की सत्ता में आने के बाद से पिछले तीन वर्षों के दौरान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कमी आई है।
    ऐसे समय में जब अधिकांश हिंदी फिल्म स्टार बीजेपी के सामने अपने बयान और चुप्पी से नतमस्तक हैं, और बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ आवाज उठाने वाले शाहरुख खान और आमिर खान जैसे कुछ एक बड़े योद्धा भी केंद्र सरकार के निशाने पर आ चुके हैं, बीजेपी और दक्षिण के फिल्मी सितारों के बीच टकराव को उत्तर भारत में आश्चर्य से देखा जा रहा है। कई लोगों द्वारा ये धारणा बनाई जा रही है कि दक्षिण के मुखर अभिनेता राजनीति में अपना करियर तलाश रहे हैं। इन अटकलों को तब और हवा मिली जब कमल हासन ने सक्रिय राजनीति में उतरने की पुष्टि की।
    आखिरकार दक्षिण में ये परंपरा भी रही है कि अभिनेता अपनी स्टार अपील को भंजाते हुए हाई प्रोफाइल राजनीति में कदम रखते हैं, इनमें आंध्र प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री एनटी रामाराव, तमिलनाडु के दिवंगत मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन और जे जयललिता कुछ खास नाम हैं।
    अब तक राजनीति में आने वाला कोई भी हिंदी फिल्म कलाकार सरकार में इस कदर ऊंचाई तक नहीं पहुंचा। हालांकि, दक्षिण भारतीय सितारों के हालिया विरोधी रवैये के पीछे एक वैकल्पिक करियर बनाने की उम्मीद से कहीं अधिक कुछ और ही है। इसमें सबसे पहले फिल्म स्टार्स के नजरिये में उत्तर-दक्षिण के फर्क का होना है।
    उत्तर भारत में आम लोग गंभीर कलाकारों के सामाजिक-राजनीतिक बयानों को तो स्वीकार करते हैं लेकिन वो पॉप कल्चर, खास कर व्यावसायिक सिनेमा से जुड़े स्टार को हल्के व्यक्तित्व के रूप में देखते हैं और उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेते हैं।
    फिल्मों से राज्यसभा पहुंची जया बच्चन द्वारा 2012 में असम से जुड़े एक बहस के दौरान उनकी टिप्पणी पर कांग्रेस के तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे की प्रतिक्रिया में यह देखने को मिलती है। तब शिंदे ने उनसे कहा था कि यह एक गंभीर मसला है, न कि एक फिल्मी मुद्दा।
    यह नहीं कहा जा सकता कि दक्षिण भारत के फिल्म कलाकार कभी राजनीतिक दबाव के आगे नहीं झुके, लेकिन उनसे ऑन स्क्रीन या ऑफ स्क्रीन हमेशा चुप्पी बनाए रखने की उम्मीद नहीं की जाती है।
    हालांकि पूरे दक्षिण भारत को एक नजरिए से नहीं देखा जा सकता, लेकिन यह उल्लेखनीय है कि कन्नड़, तमिल, तेलुगू और मलयालम सिनेमा में मुख्यधारा की बॉलीवुड सिनेमा की तुलना में जाति समीकरण ज्यादा फिल्मों में दिखती हैं। बॉलीवुड में बिरले ही पिछड़ी जाति को लेकर फिल्में बनती हैं।
    यही कारण है कि इस सच के बावजूद कि केरल का फिल्म उद्योग बॉलीवुड की तरह ही पितृसत्तात्मक है, इस उच्च साक्षरता वाले राज्य की महिला फिल्म कलाकारों ने अपने अधिकारों को लेकर इस साल वूमन इन सिनेमा कलेक्टिव बनाने का एक अभूतपूर्व कदम उठाया था।
    दक्षिण भारत के अभिनेताओं की नाराजगी को इस वृहत संदर्भ और केंद्र में बीजेपी के सत्ता में आने से जोड़ कर देखा जाना चाहिए। आजादी के आंदोलन के जमाने से ही दक्षिण भारत में और खासकर तमिलनाडु में उत्तर भारतीय संस्कृति को वहां के लोगों पर थोपने के किसी भी प्रयास का कट्टर विरोध करने की परंपरा रही है।
    अन्य चीजों के अलावा, केंद्र की सत्ता में आने के बाद से बीजेपी द्वारा अन्य भाषाओं की कीमत पर हिंदी को दक्षिण भारत में मजबूती से बढ़ावा देने की कोशिशों ने एक बार फिर दक्षिण भारत में उत्तर भारत के सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के भय को पुनर्जीवित कर दिया है।
    इसके साथ ही, मुख्यत: उत्तर भारत में केंद्रित बीजेपी ने 2014 से ही दक्षिण भारत को लेकर काफी अज्ञानता दिखाई है। उदाहरण के लिए, उत्तर की तुलना में दक्षिण में फिल्मों के फैन हमेशा से ज्यादा संगठित रहे हैं। उसकी सबसे बड़ी वजह है कि वहां दशकों से फैन्स एसोसिएशन ने खुद को काफी संगठित किया है।
    इसीलिए उत्तर की तुलना में दक्षिण में प्रशंसकों की कहीं तेज और संगठित प्रतिक्रिया देखने को मिलती है, जैसा कि बीजेपी को च्मेरसलज् के दौरान देखने को मिला। हालांकि दक्षिण भारत भी धार्मिक तनावों से पूरी तरह मुक्त नहीं है, लेकिन इसके बावजूद तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन और केरल में कम्यूनिस्ट आंदोलन ने साम्प्रदायिकता का जोरदार विरोध किया है।
    एक फिल्म के किरदार के रूप में जीएसटी की आलोचना के जवाब में बीजेपी का ईसाई होने के कारण विजय पर हमला बोलने को तो कम से कम बीजीपी का दुस्साहस ही कहा जाएगा। ईसाई होने के कारण उन पर हमला करने वालों को शायद पता ही नहीं होगा कि दक्षिण भारत में सभी लोगों को पता है कि विजय ईसाई धर्म के मानने वाले हैं लेकिन दक्षिण भारत में फिल्म कलाकारों के धर्म को लेकर कभी कोई मुद्दा बना ही नहीं है।
    यह परिस्थिति में कमल हासन, प्रकाश राज और विजय का प्रतिरोध सामने आया है। वो कोई अनूठे नहीं हैं, हालांकि ऐसा उनलोगों को जरूर लग सकता है जो बॉलीवुड के सत्ता के सामने नतमस्तक होने के आदि हैं। (बीबीसी)

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Posted Date : 15-Nov-2017
  • अध्यक्ष महोदय,
    एक सपना था जो अधूरा रह गया, एक गीत था जो गूँगा हो गया, एक लौ थी जो अनन्त में विलीन हो गई। सपना था एक ऐसे संसार का जो भय और भूख से रहित होगा, गीत था एक ऐसे महाकाव्य का जिसमें गीता की गूँज और गुलाब की गंध थी। लौ थी एक ऐसे दीपक की जो रात भर जलता रहा, हर अँधेरे से लड़ता रहा और हमें रास्ता दिखाकर, एक प्रभात में निर्वाण को प्राप्त हो गया।
    मृत्यु ध्रुव है, शरीर नश्वर है। कल कंचन की जिस काया को हम चंदन की चिता पर चढ़ा कर आए, उसका नाश निश्चित था। लेकिन क्या यह ज़रूरी था कि मौत इतनी चोरी छिपे आती? जब संगी-साथी सोए पड़े थे, जब पहरेदार बेखबर थे, हमारे जीवन की एक अमूल्य निधि लुट गई। भारत माता आज शोकमग्ना है - उसका सबसे लाड़ला राजकुमार खो गया। मानवता आज खिन्नमना है - उसका पुजारी सो गया। शांति आज अशांत है - उसका रक्षक चला गया। दलितों का सहारा छूट गया। जन जन की आँख का तारा टूट गया। यवनिका पात हो गया। विश्व के रंगमंच का प्रमुख अभिनेता अपना अंतिम अभिनय दिखाकर अन्तध्र्यान हो गया।
    महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में भगवान राम के सम्बंध में कहा है कि वे असंभवों के समन्वय थे। पंडितजी के जीवन में महाकवि के उसी कथन की एक झलक दिखाई देती है। वह शांति के पुजारी, किन्तु क्रान्ति के अग्रदूत थे; वे अहिंसा के उपासक थे, किन्तु स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा के लिए हर हथियार से लडऩे के हिमायती थे।
    वह शांति के पुजारी, किन्तु क्रान्ति के अग्रदूत थे; वे अहिंसा के उपासक थे, किन्तु स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा के लिए हर हथियार से लडऩे के हिमायती थे। वे व्यक्तिगत स्वाधीनता के समर्थक थे किन्तु आर्थिक समानता लाने के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने समझौता करने में किसी से भय नहीं खाया, किन्तु किसी से भयभीत होकर समझौता नहीं किया। पाकिस्तान और चीन के प्रति उनकी नीति इसी अद्भुत सम्मिश्रण की प्रतीक थी। उसमें उदारता भी थी, दृढ़ता भी थी। यह दुर्भाग्य है कि इस उदारता को दुर्बलता समझा गया, जबकि कुछ लोगों ने उनकी दृढ़ता को हठवादिता समझा।
    मुझे याद है, चीनी आक्रमण के दिनों में जब हमारे पश्चिमी मित्र इस बात का प्रयत्न कर रहे थे कि हम कश्मीर के प्रश्न पर पाकिस्तान से कोई समझौता कर लें तब एक दिन मैंने उन्हें बड़ा क्रूद्ध पाया। जब उनसे कहा गया कि कश्मीर के प्रश्न पर समझौता नहीं होगा तो हमें दो मोर्चों पर लडऩा पड़ेगा तो बिगड़ गए और कहने लगे कि अगर आवश्यकता पड़ेगी तो हम दोनों मोर्चों पर लड़ेंगे। किसी दबाव में आकर वे बातचीत करने के खिलाफ थे।
    महोदय, जिस स्वतंत्रता के वे सेनानी और संरक्षक थे, आज वह स्वतंत्रता संकटापन्न है। सम्पूर्ण शक्ति के साथ हमें उसकी रक्षा करनी होगी। जिस राष्ट्रीय एकता और अखंडता के वे उन्नायक थे, आज वह भी विपदग्रस्त है। हर मूल्य चुका कर हमें उसे कायम रखना होगा। जिस भारतीय लोकतंत्र की उन्होंने स्थापना की, उसे सफल बनाया, आज उसके भविष्य के प्रति भी आशंकाएं प्रकट की जा रही हैं। हमें अपनी एकता से, अनुशासन से, आत्म-विश्वास से इस लोकतंत्र को सफल करके दिखाना है। नेता चला गया, अनुयायी रह गए। सूर्य अस्त हो गया, तारों की छाया में हमें अपना मार्ग ढूँढना है। यह एक महान परीक्षा का काल है। यदि हम सब अपने को समर्पित कर सकें एक ऐसे महान उद्देश्य के लिए जिसके अन्तर्गत भारत सशक्त हो, समर्थ और समृद्ध हो और स्वाभिमान के साथ विश्व शांति की चिरस्थापना में अपना योग दे सके तो हम उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने में सफल होंगे। संसद में उनका अभाव कभी नहीं भरेगा। शायद तीन मूर्ति को उन जैसा व्यक्ति कभी भी अपने अस्तित्व से सार्थक नहीं करेगा। वह व्यक्तित्व, वह जि़ंदादिली, विरोधी को भी साथ ले कर चलने की वह भावना, वह सज्जनता, वह महानता शायद निकट भविष्य में देखने को नहीं मिलेगी। मतभेद होते हुए भी उनके महान आदर्शों के प्रति, उनकी प्रामाणिकता के प्रति, उनकी देशभक्ति के प्रति, और उनके अटूट साहस के प्रति हमारे हृदय में आदर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
    इन्हीं शब्दों के साथ मैं उस महान आत्मा के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
    -अटल बिहारी वाजपेयी, 29 मई 1964, लोकसभा

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Posted Date : 14-Nov-2017
  • राजू पाण्डेय
    पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्म दिवस पर आयोजित होने वाला बालदिवस पुराने महापुरुषों की पुनव्र्याख्या और नकार के इस दौर में शायद उपेक्षित ही निकल जाए। हो सकता है कि बच्चों की समस्याओं पर चर्चा तब तक टल जाए जब तक कि कोई नया अवसर न तलाश लिया जाए जो शायद किसी नए महापुरुष की रूपाकार लेती छवि से संबंधित हो। जब बाल दिवस समारोहपूर्वक मनाया भी जाता था तब भी इसका स्वरुप औपचारिकताओं की पूर्ति से अधिक कुछ न था। स्वतंत्रता के 70 वर्षों के बाद भी हम अपने बालक बालिकाओं के लिए ऐसा कुछ उल्लेखनीय कर पाने में विफल रहे हैं जिस पर गर्व किया जा सके। इंडियन लेबर आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट बताती है कि देश में 1 करोड़ 30 लाख बाल श्रमिक हैं। इनमें से सत्तर प्रतिशत लड़कियाँ हैं। 
    यह आंकड़े शर्मनाक और चौंकाने वाले हैं और यह भी दर्शाते हैं कि नारी को शोषण के लिए आसान शिकार मानने की हमारी मनोवृत्ति उसकी बाल्यावस्था पर भी रहम नहीं करती। बच्चे-बच्चियाँ हर उस जगह दिख जाएँगे जहाँ उन्हें अभी तो बिलकुल नहीं दिखना चाहिए-कॉटन सीड प्रोडक्शन में, माइनिंग की धुंध में, जरी और कढ़ाई की पेचीदगियों में या फिर जहरीली बारूदी गंध के बीच जख्मी उँगलियों से दियासलाई और पटाखे बनाते हुए। दमघोंटू कृत्रिम खुशबू में मुरझाते जिन्दा फूलों की तरह अपनी घायल उँगलियों से हमारी पूजा के लिए अगरबत्तियां बनाते भी अक्सर वे हमें दिख जाते हैं। कभी हम देश के इन बेशकीमती जीवित रत्नों को बेजान पत्थरों को तराशने में लगा पाते हैं। हम इन दृश्यों के आदी हो गए हैं। हम अब चौंकते तक नहीं, लज्जित होना तो दूर की बात है। 
    ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स के आंकड़े बताते हैं कि भारत में एक करोड़ तिरासी लाख लोग गुलामों जैसा जीवन जीने को विवश हैं। इनमें से एक बड़ी संख्या बाल श्रमिकों की है। पीढिय़ों से चले आ रहे ऋण को चुकाने में असमर्थ कृषि मजदूरों की संतानें शैशव काल से ही बंधुआ मजदूरी के लिए अभिशप्त होती हैं। यूनिसेफ के अनुसार गरीबी और अशिक्षा बाल श्रम के लिए उत्तरदायी हैं। किन्तु इन भयानक समस्याओं के प्रति हमारी संवेदना धीरे धीरे कम होती जा रही है और इनकी चर्चा हमारे लिए अकादमिक आनंद की सृष्टि करने लगी है।  
    अशिक्षा और गरीबी का गुरुत्व बल इतना अधिक होता है कि इनसे बाहर निकलना असम्भव होता है। अशिक्षित व्यक्ति बच्चों के मजदूरी करने को अपनी गरीबी समाप्त करने का एक उपाय मानता है और इस पर अमल करना उसके लिए अशिक्षा और गरीबी की अंतहीन अँधेरी सुरंग में प्रवेश करने जैसा सिद्ध होता है। अशिक्षा और अभाव की विरासत के बोझ तले दबे हुए वंचित समाज के बच्चों का बचपन छीनने के लिए बालश्रम की कुप्रथा आतुरता से प्रतीक्षा करती रहती है। बाल श्रम के नाना रूप हैं। 
    महानगरों के किनारों पर विशालकाय स्लम एरिया की उपस्थिति आज महानगरों की पहचान की एक अनिवार्य विशेषता बन गई है। स्लम एरिया, विकास प्रक्रिया में गौण और उपेक्षणीय बना कर हाशिए पर धकेल दिए मनुष्य की शरणस्थली है। इसी के आसपास दानवाकार कचरे के पर्वतों में अपनी आजीविका की संजीवनी तलाशते नन्हें बच्चे हैं। इन्हें हम इस प्रकार देखते हैं जैसे ये कचरे की संतानें हैं। कभी कभी इन पर इस तरह क्रोधित हो जाते हैं जैसे ये कचरे की वंश वृद्धि के साक्ष्य हों। हो सकता है ये नशे के गुलाम हों, चोर हों, अपराधी हों लेकिन हैं तो बच्चे ही - हमारे देश की संतानें। पता नहीं इनके हाथ में भाग्य रेखा होती भी होगी या नहीं और इनमें से पता नहीं कितने युवावस्था तक बच पाते होंगे! स्वच्छता अभियान के इन अचर्चित बाल दूतों की भूमिका की सराहना करते हुए इन्हें स्वच्छता अभियान से औपचारिक रूप से जोड़कर समाज की मुख्य धारा में लाने के प्रयास तब होते जब इन्हें एक मनुष्य समझा जाता। बाल भिक्षा वृत्ति भी बालश्रम का एक घृणित स्वरुप है। अपने परिवारों से अपहृत कर लाए गए और जबरन विकलांग बना दिए गए बच्चे संगठित गिरोहों द्वारा भिक्षावृत्ति के लिए मजबूर किए जाते हैं। इन्हें देखकर हमारा सामंत जाग उठता है जो कभी भीख दे देता है तो कभी दुत्कार देता है। हर समस्या के समाधान के लिए कानून बनाने में हम बड़े प्रवीण हैं। 
    चाइल्ड लेबर रेगुलेशन एंड प्रोहिबिशन एक्ट(1986),नेशनल पॉलिसी ऑन चाइल्ड लेबर(1987), जुवेनाइल जस्टिस(केअर एंड प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन) एक्ट 2000 और 2006 का इसका संशोधन,राइट टू एजुकेशन एक्ट(2009),अमेंडेड चाइल्ड लेबर एक्ट(मई 2015 तथा 2016) आदि वे विधिक प्रावधान हैं जो बालश्रम उन्मूलन हेतु निर्मित किए गए हैं। 
    इनमें से 2015 का संशोधन विवादित रहा क्योंकि इसने पारिवारिक मालकियत वाले अहानिकर प्रतिष्ठानों में बालश्रमिकों के कार्य करने को वैधानिकता दे दी। 2016 का संशोधन भी 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कुछ विशेष प्रकार के कार्य करने की अनुमति प्रदान करता था। जितने प्रवीण हम नए कानूनों के निर्माण में हैं उतने ही दक्ष हम इन कानूनों को भंग करने की युक्तियां ढूंढऩे में हैं। अपने अधिकारों से अनभिज्ञ,16 से 18 घंटे बहुत कम मजदूरी पर कार्य करने वाले, डांट फटकार और मार से सहम जाने वाले बाल श्रमिकों की सेवाएं हमें बड़ी प्रिय हैं इसीलिए हम इन वैधानिक प्रावधानों का खुल कर उल्लंघन करते हैं।
    यौन उत्पीडऩ बच्चों की एक प्रमुख समस्या है। हमारे समाज में जब तक सेक्स को वर्जना का विषय बनाकर उसकी रहस्यमयता और महत्व को बढ़ाया जाता रहेगा तब तक ऐसी घटनाओं को रोका नहीं जा सकता। वयस्कों के यौन हमलों से बचने की तरकीबों का बच्चों को दिया जाने वाला प्रशिक्षण किसी मृग छौने को शेर से बचने के गुर बताने जैसा ही है। हमारा समाज यौन विकृतियों से सड़ रहा है। कौमार्य और रति सुख संबंधी हमारी पुरानी और कलुषित सोच बाल वेश्यावृत्ति के लिए उत्तरदायी रही है। 
    ऐसा नहीं है कि वे मध्यम और उच्च वर्गीय बच्चे जो अच्छी शिक्षा और पोषक आहार प्राप्त कर रहे हैं उनका जीवन सुखमय है। जिस अंतहीन आपाधापी और भागमभाग युक्त जीवन शैली को इन बच्चों के माता पिता ने अपनाया है उसी जीवन शैली में उनकी संतानों को ढालने के केंद्र आज के विद्यालय बन गए हैं। माता-पिता अपनी नौकरी और व्यवसाय में मसरूफ हैं और बच्चे स्कूल, ट्यूशन, कोचिंग के टाइट शेड्यूल की गिरफ्त में हैं। कुछ चुनिंदा नौकरियों और व्यवसायों को प्राप्त करना सब की जिंदगी का मकसद बना दिया गया है। 
    इस कारण गलाकाट प्रतिस्पर्धा की स्थिति बनी है। बच्चे को विनर और लूजर की भाषा में सोचने को बाध्य किया जा रहा है। किन्तु इस भाषा में खिलाड़ी भावना नहीं है। यहाँ विनर के लिए जन्नत है और लूजर के लिए मौत। पारस्परिक संवाद का सेतु भंग हो रहा है। बच्चों की रचनात्मक गतिविधियों और हॉबीज़ के लिए भी पेशेवर संस्थान उपलब्ध हैं जो इन्हें म्यूजिक, डांस, राइटिंग, ड्राइंग आदि की जानकारी दे रहे हैं। 
    इन संस्थानों की कार्यप्रणाली कुछ इस तरह की है कि ये बच्चों की उड़ान को नई ऊँचाइयाँ और विस्तार देने के बजाए इसे सीमित,संक्षिप्त और वस्तुनिष्ठ बनाने का कार्य कर रहे हैं। ये एक तरह से हॉबीज़ का, कल्पना का,रचनात्मकता का यंत्रीकरण करने के केंद्र हैं। मनुष्य को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की कला ही मैनेजमेंट है जिसे चन्द मनोवैज्ञनिक फॉर्मूलों का प्रयोग करते हुए सिखाने की चेष्टा आधुनिक मैनेजमेंट गुरु कर रहे हैं। जिन अर्थ आधारित उपभोगवादी मूल्यों को हमने अपनाया है उनमें बच्चों के बचपने के लिए कोई स्थान नहीं है और यह समय की बर्बादी के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। 
    बच्चे को सिखाया जा रहा है कि वह कुशल मैनेजर कैसे बने। उसे अपने फायदे के लिए सबको मैनेज करना है -समय को, ज्ञान को, संबंधों को, रिश्तों को,भावनाओं को। यह आधुनिक युग की गीता का ज्ञान है। इस प्रकार की प्रोग्रामिंग से जो बच्चा गढ़ा जा रहा है वह स्मार्ट, सिंसियर और प्रैक्टिकल दिखाई तो देता है लेकिन समस्या दो प्रकार से उत्पन्न होती है- प्रोग्रामिंग में गड़बड़ी के कारण और ऐसी परिस्थितियों के कारण जो प्रोग्रामिंग का हिस्सा नहीं है। जब बच्चा असफल होता है। उसे पता चलता है कि वह लूजर है तो वह अपने लिए खुद सजा ए मौत मुकर्रर कर लेता है। उसकी प्रोग्रामिंग उसे यह नहीं बताती कि असफलता अंत नहीं अवसर है। कई बार ऐसा भी होता है कि विनर बनने की जल्दीबाजी में वह छल,कपट,हिंसा और हत्या की ओर अग्रसर हो जाता है। अनेक बार जब सच्ची दोस्ती या सच्चे प्यार से उसका सामना होता है, जिसका मुकाबला करने के लिए उसे प्रोग्राम नहीं किया गया है तो उसकी अपरिपक्वता उजागर हो जाती है। 
    यदि वह बच्चा माता-पिता, भाई-बहनों और अन्य परिवारजनों के साथ सघन भावनात्मक रिश्तों का अनुभव प्राप्त कर चुका होता तो ऐसी भावनात्मक समस्याओं का बेहतर समाधान सोच सकता था किंतु हमने उसे प्रोग्रामिंग पर ही इस कदर निर्भर बना दिया है कि उसका भावनात्मक विकास संतुलित रूप से हो नहीं पाता है। हमने बच्चों के जीवन को युद्धों से भर दिया है। पढ़ाई तो उनके लिए युद्ध बन ही गई थी, खेल भी अब युद्ध का रूप ले रहे हैं जिनमें सफलता और सर्वोच्चता को हमने अनिवार्य बना दिया है। 
    इस कारण से खेलों से हार कर भी जीतने वाली खिलाड़ी भावना समाप्त हो रही है। बच्चों के लिए खेल अब मनोरंजन और मानसिक विश्राम के साधन नहीं रहे। हमने बालक को वास्तविक जगत से मिलने वाली भावनात्मक परितुष्टि और मनोरंजन से वंचित कर दिया है। यही कारण है कि वह बहिर्मुख होने के अवसर उपलब्ध होते हुए भी अंतर्मुख होता जा रहा है और सहज प्राप्य आभासी जगत में प्रवेश करता जा रहा है। वह आभासी जगत के खेलों में रूचि लेने लगता है। इन खेलों में रोमांच है तो हिंसा भी है। आभासी दुनिया के खेलों में हिंसा पुरस्कृत और रोमांचित करती है। लेकिन जब ब्लू व्हेल जैसे गेम इस हिंसा को यथार्थ जगत में क्रियान्वित कराते हैं तो यह आत्मघाती सिद्ध होती है। आभासी दुनिया के अन्य युद्ध आधारित खेल भी अवचेतन पर प्रभाव डालकर हिंसा की वृत्ति को प्रोत्साहित करते हैं। गूगल ने ज्ञान पर व्यक्ति संस्था और सत्ता के आधिपत्य को तोड़ा है। हर तरह की जानकारी बच्चों के पास उपलब्ध है किंतु इस जानकारी का उपयोग किस तरह करना है यह विवेक उनके पास नहीं है। इस कारण यह अनसेंसरड ज्ञान उनके लिए लाभ से ज्यादा हानिप्रद हो सकता है।
    यदि उपभोग और उपयोगिता की भाषा में बात करें तो आज के बच्चे किसी आधुनिक पाक कला गुरु की फटाफट रेसेपी की तरह होते जा रहे हैं जिसके स्वाद का मुकाबला स्नेह,लगन, अपनापे और तसल्ली से बने माँ के हाथ के खाने से नहीं किया जा सकता। किन्तु उपभोग और उपयोगिता की यह भाषा लुभावनी के साथ साथ अमानवीय और खतरनाक भी है। बच्चे अपने भोलेपन और मासूमियत के कारण ईश्वर का रूप कहलाते हैं और उनके इन गुणों की रक्षा में ही बाल कल्याण की सारी योजनाओं की सफलता का रहस्य छिपा है। हमें चाहिए कि कम से कम बच्चों के साथ वह व्यवहार न करें जो हम ईश्वर के साथ कर रहे हैं।

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Posted Date : 14-Nov-2017
  • भारत में लगभग 60 प्रतिशत लोगों की रोजी रोटी का जरिया जमीन ही है, लेकिन एक किसान परिवार के लिए खेती बाड़ी से होने वाली आमदनी 1980 के दशक के मुकाबले घट कर एक तिहाई रह गई है। विकास अर्थशास्त्री माइकल लिप्टन कहते हैं, पार्ट टाइम खेती करने की बहुत गुंजाइश है। इसका मतलब है कि अगर कहीं और अवसर दिखाई दें तो खेती करने वालों को वहां चले जाना चाहिए। और जब खेती के लिए अच्छी संभावनाएं हो तो उन्हें वापस आ जाना चाहिए।
    पिछले दस साल में भारत में हजारों किसानों ने आत्महत्या की है जिसका मुख्य कारण कर्ज ना चुका पाना था। भारत के किसान आम तौर पर मॉनसून पर निर्भर होते हैं। अगर अच्छी बारिश ना हो तो अच्छी फसल की उनकी उम्मीदों पर पानी फिर जाता है। इसके अलावा कई बार फसल का अच्छा दाम न मिल पाने के कारण भी उन्हें घाटा उठाना पड़ता है।
    मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और तलिमनाडु में इस साल किसानों ने व्यापक विरोध प्रदर्शन किए  जिसके बाद उन्हें कर्ज माफी का आश्वासन मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले पांच सालों में किसानों की आमदनी दोगुनी करने की बात करते हैं।
    शोध संस्थान मैककिंसे ग्लोबल इंस्टीट्यूट का कहना है कि 2011 से 2015 के बीच कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर 2.6 करोड़ कम हुए हैं। 
    भारत में ग्रामीण इलाकों में रहने वाले हर दस में सात लोगों के पास या तो जमीन नहीं है और अगर है तो वह ढाई एकड़ से कम है।
    बिना जमीन वाले किसान न तो सरकार से लोन हासिल कर सकते हैं और न ही उन्हें फसल बीमा जैसी सुविधा मिलती है। लेकिन एचएसबीसी इंडिया की एक रिपोर्ट कहती है कि भूमिविहीन किसान जमीन वाले किसानों से ज्यादा कमा लते हैं क्योंकि वे बीच में जाकर दूसरी नौकरियां भी करते हैं। ऐसे लोग ग्रामीण इलाकों में चलने वाली परियोजनाओं में काम कर लेते हैं जिनमें सड़क या फिर दूसरे निर्माण कार्य शामिल हैं।
    एचएसबीसी इंडिया के मुख्य अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी कहते हैं, अच्छे मानसून के बाद मजदूरों की मांग बढ़ जाती है। इसी के कारण मेहनताना भी बढ़ जाता है और इससे भूमिविहीन किसानों को फायदा होता है। वहीं जमीन वाले किसान आमदनी के लिए सिर्फ खेती पर निर्भर होते हैं और जब फसल का अच्छा दाम नहीं मिलता तो उनके लिए मुश्किलें बढ़ जाती हैं। (डॉयचे वैले)

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Posted Date : 13-Nov-2017
  • - अशोक वाजपेयी
    आज याने 13 नवम्बर 2017 को गजानन माधव मुक्तिबोध अगर जीवित होते तो अपनी आयु के 101वें वर्ष में प्रवेश कर रहे होते। यह, सब कुछ के बावजूद, हिंदी की आलोचना-बुद्धि की शक्ति और तेजस्विता को पहचानने की उसकी सामथ्र्य का ज्वलंत प्रमाण है-अपने जीवनकाल में अपना पहला कविता संग्रह तक प्रकाशित न देख पाने वाले मुक्तिबोध, अपनी मृत्यु के आधी सदी बाद भी आज प्रासंगिकता और सार्थकता के शिखर पर हैं।
    यह भी उल्लेखनीय है कि उनकी उत्कृष्टता पर जो मतैक्य विकसित हुआ है और उन्हें लेकर जो लिखा गया है उसका श्रेय सिर्फ विचारधारात्मक प्रयत्नों को ही नहीं दिया जा सकता। वाम से असहमत रहने वाले अनेक लेखकों ने उन पर गइराई और समझ के साथ लिखा है। इस मतैक्य में उनकी भी भागीदारी है जो उन्हें, पिछले लगभग 75 वर्षों के दौरान, हिंदी का एक श्रेष्ठ लेखक मानते रहे हैं।
    मुक्तिबोध के लेखन में एक बुनियादी अंतर्विरोध लगभग शुरू से रहा है। अपनी कविता में वे बराबर अंत तक आत्मसंशयग्रस्त रहे लेकिन अपनी आलोचना में उनका आत्मविश्वास अनेक रूपों में प्रगट और विन्यस्त होता है। यह बात पहले भी कई बार कही जा चुकी है कि अपने जीवनकाल में मुक्तिबोध को कभी इसकी आश्वस्ति नहीं थी कि वे एक बड़े लेखक हैं: यह कोई ओढ़ा हुआ विनय नहीं था - यह एक आत्मचेतस् लेखक का ईमानदार खरा संशय था। यह भी दिलचस्प है कि उनके निकट जो लेखक-मित्र थे - नेमिचन्द्र जैन, शमशेर बहादुर सिंह, हरिशंकर परसाई, नरेश मेहता, श्रीकांत वर्मा, प्रमोद वर्मा आदि - उनमें से कोई भी उन्हें आश्वस्त नहीं कर पाया जबकि उनमें से हरेक बहुत शिद्दत से उनके महत्व को महसूस करता था।
    साहित्य के इतिहास में दोनों तरह के उदाहरण मिलते हैं: ऐसे बड़े लेखक जो मुक्तिबोध की तरह संशयग्रस्त रहे और ऐसे भी जो आत्मविश्वास से भरे-पूरे थे। यह तर्क किया जा सकता है कि कम से कम हमारे समय में जब सब कुछ प्राय: संशय-ग्रस्त हो गया है, संशय ही बड़े सृजन का आधार बन सकता है, उसका अभाव नहीं। पर संशय प्रतिभा का हनन भी कर सकता है। लेकिन वह बड़ी प्रतिभा का ऐसा हनन नहीं कर पाता।
    याद करें कि महान कथाकार फ्रैंज काफ्का को अपने साहित्य की अकिंचनता पर इतना भरोसा था कि उन्होंने अकालमृत्यु से पहले अपने घनिष्ठ मित्र से सारी पांडुलिपियां नष्ट करने का मित्राग्रह किया था जो, सौभाग्य से, उसने नहीं माना। बाद में वे सभी कृतियां प्रकाशित हुई और काफ्का की अक्षय कीर्ति का आधार बनीं।
    अपनी उपलब्धि और कीर्ति के इस व्यापक एहतराम पर मुक्तिबोध को कभी यकीन न आता। उनकी ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान इतने प्रखर और प्रश्नवाची थे कि वे कुछ भी आसानी से स्वीकार नहीं कर सकते थे। आज जब बहुत सारे महत्वाकांक्षी युवा मान्यता के लिए तरह-तरह के जतन और समझौते करते हैं तो उन्हें उस उजले मुक्तिबोध की याद दिलाना चाहिये।
    मुक्तिबोध को भाषा-शिल्पी नहीं माना जाता है। उनकी भाषा के अटपटेपन और उनकी कविता के अराजक शिल्प को काफी देखा-समझा गया है। पर यह भी याद करने की जरूरत है कि उनके गढ़े अनेक पद हिंदी आलोचना में बहुमान्य रहे हैं- 'सभ्यता-समीक्षाÓ, 'ज्ञानात्मक संवेदनÓ, 'संवेदनात्मनक ज्ञानÓ, 'सत्-चित्-वेदनाÓ आदि।
    इधर उनकी प्रसिद्ध कहानी 'पक्षी और दीमकÓ फिर पढ़ते हुए उसके अंतिम अंश की ओर ध्यान गया, विशेषत: इस पंक्ति की ओर: 'बारीक बेइमानियों का सूफियाना अन्दाज उसमें कहांÓ! आगे का अंश आख्यानपरक नहीं एक तरह का आत्मस्वीकार या आत्माभियोग है जो, वैसे भी मुक्तिबोध की विशेषता है, भले हिंदी कहानी में वह उनसे पहले या बाद में कम ही नजर आते हैं।
    अंश है: 'और अब मुझे सज्जायुक्त भद्रता के मनोहर वातावरण वाला अपना कमरा याद आता है...अपना अकेला धुंधला-धुंधला कमरा। उसके एकांत में प्रत्यावर्तित और पुन: प्रत्यावर्तित प्रकाश के कोमल वातावरण में मूल-रश्मियों और उनके उद्गम स्रोतों पर सोचते रहना, खयालों की लहरों में बहते रहना कितना सरल, सुंदर और भद्रतापूर्ण है। उससे न कभी गर्मी लगती है, न पसीना आता है, न कभी कपड़े मैले होते हैं। किन्तु प्रकाश के उद्गम के सामने रहना, उसका सामना करना, उसकी चिलचिलाती दोपहर में रास्ता नापते रहना और धूल फांकते रहना कितना त्रासदायक है! पसीने से तरबतर कपड़े इस तरह चिपचिपाते हैं ओर इस कदर गंदे मालूम होते हैं कि लगता है... कि अगर कोई इस हालत में हमें देख ले तो वह बेशक हमें निचले दर्जे का आदमी समझेगा। सजे हुए टेबल पर रखे कीमती फाउंटेनपेन (जैसे नीरव) शब्दांकनवादी हमारे व्यक्तित्व, जो बड़े खुशनुमा मालूम होते हैं- किन्हीं महत्वपूर्ण परिवर्तनों के कारण - जब वे आंगन में और घर-बाहर चलती झाडू- जैसे काम करने वाले दिखायी दें तो इस हालत में वे यदि सड़क-छाप समझे जायें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। लेकिन, मैं अब ऐसे कामों की शर्म नहीं करूँगा, क्योंकि जहां मेरा हृदय है, वहीं मेरा भाग्य है।
    यह कहानी 1959 के बाद कभी लिखी गयी ओर 1962 में 'कल्पनाÓ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। उस समय किसी कहानी का समापन ऐसा नहीं होता था। कथा में मनोजगत आदि का प्रवेश हो चुका था लेकिन शायद ही कोई किसी कहानी का समापन ऐसे वाक्य से कर सकता था- ...क्योंकि जहां मेरा हृदय है, वहीं मेरा भाग्य है।Ó एक दुर्दम्य बौद्धिक साहित्यकार बुद्धि और ज्ञान पर नहीं संवेदना पर जोर दे रहा है और उसे भाग्यविधायक बता रहा है। यह अनूठा है - मुक्तिबोध के यहां ज्ञान, बुद्धि और संवेदना के बीच की दूरियां उनकी आत्मा के ताप में पिघलकर एकमेक हो जाती थीं। आज के 'तुमुल कोलाहलÓ में क्या हममें यह ताब बची है कि हम 'हृदय की बातÓ सुन सकें जिसे मुक्तिबोध ने दारुण संत्रणा के बावजूद कहा और सुना था? क्या हमारे समय में हम लगभग रोज बारीक बेइमानियों को सूफियाना अंदाज में जाहिर होते नहीं देख रहे हैं?
    1956-57 की बात है। श्रीकांत वर्मा ने बिलासपुर से एक पत्रिका निकाली थी 'नयी दिशाÓ। उस समय वे संभवत: किसी मिडिल स्कूल में अध्यापक थे। उसमें एक विज्ञापन छपा था जिसमें यह सूचना थी कि गजानन माधव मुक्तिबोध के संपादन में मध्यप्रदेश के युवा कवियों का एक संकलन प्रकाशित होने जा रहा है जिसका नाम होगा 'नर्मदा की सुबहÓ। उनके बड़े बेटे रमेश मुक्तिबोध को अपने दिवंगत पिता के कागजात में इस संकलन के लिए एकत्र की गयी कविताओं की पांडुलिपि मिल गयी है। रायपुर के राजेन्द्र मिश्र ने इस पांडुलिपि को देखकर उसे विन्यस्त किया है। मुक्तिबोध शती के दौरान उसे प्रकाशित करने की योजना है।
    जिस समय मुक्तिबोध यह उपक्रम कर रहे थे उस समय बल्कि उसके आठ साल बाद तक, उनकी मृत्यु होने तक उनका अपना कोई कविता-संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ था। फिर भी उनकी कोशिश, इस संचयन के माध्यम से, मध्यप्रदेश की युवा प्रतिभा को सामने लाने की थी। यह संकलन प्रकाशित नहीं हो पाया और अब लगभग 60 वर्ष बाद प्रकाशित होने जा रहा है।
    संकलन में कुल आठ कवि शामिल किये जा रहे थे: श्रीकांत वर्मा, प्रमोद वर्मा, श्रीकृष्ण अग्रवाल 'शैलÓ, जीवनलाल वर्मा 'विद्रोहीÓ, विपिन जोशी, हरि ठाकुर, रामकृष्ण श्रीवास्तव, अनिल कुमार और रामकृष्ण श्रीवास्तव। इन कवियों में से श्रीकांत और प्रमोद वर्मा ही आगे चलकर कुछ यश और उपलब्धि अर्जित कर पाये। यह कहना कठिन है कि इस संकलन के पीछे एक चुनौती के रूप में उस समय तक प्रकाशित और अज्ञेय द्वारा संपादित 'तार सप्तकÓ और 'दूसरा सप्तकÓ की क्या भूमिका थी। 'तार सप्तकÓ में तो स्वयं मुक्तिबोध भी शामिल थे।
    अपनी समवर्ती रचनाशीलता में किसी लेखक की दिलचस्पी और उसमें हस्तक्षेप करने के कई रूप हो सकते हैं। बहुत सारे लेखक पत्रिकाएं निकालते हैं। कई अपनी समवयसियों पर आलोचना लिखते और पुस्तकों की समीक्षा करते हैं। आजकल फेसबुक इत्यादि पर आत्मसंवद्र्धन का जो बड़ा मंच मिल गया है उसमें परस्पर टिप्पिणयों की बाढ़ भी ऐसी ही कोशिश का हिस्सा है। बहुत कम अज्ञेय और मुक्तिबोध की तरह इस तरह के संकलन कर ऐसी अधिक एकाग्र और सुनियोजित कोशिश करते हैं।
    अब यह देखा जा सकता है कि उस समय मध्य प्रदेश में जो कवि थे उनमें से मुक्तिबोध का किया चयन विवादास्पद ही हो सकता था। यह भी स्पष्ट है कि उनमें से बहुत कम आगे चलकर प्रसिद्धि या उपलब्धि पा सके। पर, यह एक ऐतिहासिक दस्तावेज फिर भी है। अगर तभी प्रकाशित हो जाता तो निश्चय ही यह तबके मध्यप्रदेशीय परिदृश्य में एक विचारोत्तेजक हस्तक्षेप होता। यह भी उल्लेखनीय है कि इस चयन में मुक्तिबोध ने अपनी वैचारिक दृष्टि को थोपने का यत्न नहीं किया और उनकी संपादकीय दृष्टि समावेशी है। अज्ञेय और मुक्तिबोध दोनों ने ऐसे संपादन में ऐसी समावेशी दृष्टि और रुचि का परिचय दिया था: ऐसा समावेश आज कितना दुर्लभ है! (सत्याग्रह)

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