विचार / लेख

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  • मणींद्र नाथ ठाकुर, एसोसिएट प्रोफेसर, जेएनयू
    पिछले कुछ सप्ताह में मैं जहां भी गया, लोग मुझसे पूछते रहे कि 2019 में क्या होगा? इसके पहले शायद ही कभी ऐसा हुआ होगा कि संसदीय चुनाव में दो साल से ज्यादा बाकी हो और लोग ऐसा पूछें। लोग ऐसा क्यों पूछते हैं? और क्या इसका कुछ जवाब दिया जा सकता है? ऐसा पूछने का कारण तो शायद यह है कि बहुत दिनों के बाद भारत में कांग्रेस पार्टी के अलावा किसी एक दल को इतना बड़ा बहुमत मिला है। यह सच है कि नरेंद्र मोदी में जनता को आकर्षित करने का चुंबकीय गुण है। लेकिन, यह भी सच है कि भाजपा की इतनी बड़ी बहुमत के पीछे कांग्रेस की बिगड़ी छवि और नेतृत्व की कमजोरी का भी बड़ा हाथ था।
    ऐसे में एक ऐसा व्यक्ति जो पहली बार विधानसभा में सदस्य बना और मुख्यमंत्री बन गया, पहली बार संसद सदस्य बना और प्रधानमंत्री बन गया, जाहिर तौर पर लोगों को आकर्षित कर सकता था। लोगों में यह उत्सुकता होना लाजमी है कि क्या यह व्यक्ति भारत में लंबे समय तक प्रधानमंत्री बना रहेगा? 
    इस उत्सुकता का एक कारण यह भी है कि वर्तमान नेतृत्व ने प्रचारतंत्र का भरपूर उपयोग किया और जो वादे किए गए, उनका फ्रेम दस से पंद्रह सालों का रखा। लोगों को यह लगना वाजिब है कि क्या इतने लंबे समय के लिए इनका सरकार में बने रहना संभव है? लेकिन इसका महत्वपूर्ण कारण शायद यह है कि इस नये नेतृत्व ने भारत के राजनीतिक स्वरूप में आमूल परिवर्तन करने का प्रयास किया है। 
    स्वतंत्रता के बाद पहली बार उन मूल्यों को, उन संरचनाओं को विस्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है, जिसके लिए भारत को विश्व में जाना जाता है। भारत के लोग सत्ता विस्थापन तो स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन क्या मूल्यों का विस्थापन भी स्वीकार करेंगे? इसी महत्वपूर्ण सवाल का जवाब लोग चाहते हैं। घोषित तौर पर संविधान में जिसकी आस्था न हो, गांधी में आस्था न हो, नेहरू को नकारा प्रधानमंत्री मानता हो, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद पर जिसका विश्वास न हो, क्या आम भारतीय जनमानस लंबे समय तक उसे अपना नेता मान सकता है?
    साल 2014 के चुनाव में इन सब बातों को जानते हुए भी लोगों ने भाजपा को भारी बहुमत दिया। इससे एक बार यह लगने लगा था कि भारत का जनमानस बादल रहा है। 
    लेकिन, उस बहुमत को यदि ठीक से देखा जाये, तो लोगों ने इन बातों के लिए बहुमत नहीं दिया था। बल्कि, आर्थिक विकास के लुभावने वादों के लिए अपनी सहमति दी थी, जिन्हें बाद में जुमला कह दिया गया। आज हर व्यक्ति विकास चाहता है और उसमें अपनी हिस्सेदारी खोजता है। और उसे लगता है कि यह राज्य का दायित्व है कि वह विकास की उपलब्धियों को आम जनता तक पहुंचाये। अब मनरेगा जैसी योजनाओं से लोग संतुष्ट नहीं हैं। लेकिन, इसका मतलब है कि सुखों के वितरण के लिए वे और भी प्रभावकारी व्यवस्था चाहते हैं, न कि मनरेगा को हटाना चाहते हैं। 
    यहीं पर वर्तमान सरकार की भूल हो रही है। उसने जनतंत्र को चुनाव तक ही सीमित कर दिया है और चुनाव को केवल प्रबंधन तक। चुनाव को जीत लेने पर सत्ता वालों को लगता है कि शिक्षा और स्वास्थ्य को भी निजी हाथों में देने का उन्हें समर्थन मिल गया है; उन्हें उनकी पूरी विचारधारा के लिए समर्थन मिल गया है। 
    शायद चुनाव को ही वे जनता का स्थायी 'मूड ऑफ दि नेशनÓ मान लेते हैं। पूंजीवादी में बाजार व्यवस्था के तर्ज पर जनतंत्र को व्यवस्थित करने का प्रयास किया जाता है। बाजार में बने रहने के लिए प्रचार तंत्र पर ज्यादा खर्च किया जाता है। आजकल 'माइक्रो मैनेजमेंटÓ की एक नयी तकनीक विकसित हुई है, जो जनतंत्र को ओवरटेक कर रही है। लेकिन, यह समझना जरूरी है कि चुनाव हमारे जनतंत्र का साधन है, साध्य नहीं। जनतंत्र का साध्य है संसाधनों के बंटवारे में बराबर की भागीदारी। 
    यह सब मैं इसलिए कह रहा हूं कि पिछले कुछ दिनों में जो संकेत मिल रहे हैं, उससे सत्तारूढ़ पार्टी को चिंतित होना चाहिए। कहीं जनसमर्थन की उसकी जमीन खिसक तो नहीं रही है, इस बात के संकेत को समझने का प्रयास करना चाहिए। 
    ऐसा लगता है कि चंडीगढ़ में भाजपा अध्यक्ष के बेटे के द्वारा किसी लड़की का पीछा किये जाने से लेकर, अहमद पटेल की जीत, जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय और राजस्थान के छात्र संघों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) की हार आदि कुछ ऐसी घटनाएं हैं, जिसके दूरगामी परिणाम भी हो सकते हैं और उसके संकेत भी। 
    चंडीगढ़ की घटना में पहली बार खबरिया चैनलों ने खुलेआम सत्तारूढ़ दल को दोषी ठहराना शुरू किया। और न चाहते हुए भी हरियाणा के नेतृत्व को अपना विचार बदलना पड़ा। कुछ लोगों का विश्लेषण यह है कि शायद इन चैनलों के मालिकों और पत्रकारों के बीच इस सरकार को लेकर मतभेद बढ़ता जा रहा है। जबकि, कुछ लोगों का कहना है कि चैनलों पर सोशल मीडिया भारी पड़ रहा है और अपनी लोकप्रियता को बचाने के लिए उन्हें ऐसा करना पड़ रहा है।
    अहमद पटेल के चुनाव में लोगों को यह साफ लगने लगा कि यह खेल बिना पैसा का तो नहीं चल सकता है। इसी तरह जेएनयू में तोप लगाने के मामले में सत्तारूढ़ दल की घोर आलोचना शुरू हुई थी। 
    क्या यह कहा जा सकता है कि विश्वविद्यालयों, छात्र और शिक्षक संघों में मिली हार इसी कड़ी में है? क्या भाजपा और इसके नेतृत्व की लोकप्रियता घटती जा रही है? इतना तो जरूर है कि भारत की राजनीतिक संस्कृति की नींव जिन महान लोगों ने रखी है, उसका व्यापक प्रभाव जनमानस पर है। वहीं जनता का अपना नैतिक मापदंड होता है। 
    वह सही और गलत को गौर से देखती और पहचानती रहती है। यहां राजनीतिक चालाकियां एकाध बार से ज्यादा चल सकती हैं। भले ही जनता कुछ बोलती नहीं है या यदि बोलती भी है, तो राजनेता उसे सुन नहीं पाते हैं। 
    इसलिए मौका आने पर जनता अपने नैतिक मानदंड का परिचय देने से नहीं चूकती है। तर्क में जीतना और दिल जीतना दो अलग-अलग बातें हैं। राजनीति में विश्वास का क्या महत्व है, इसका परिचय गांधीजी ने हमसे करवाया है। राजनेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत की जनता की सामूहिक चेतना का निर्माण उस स्वतंत्रता संग्राम से हुआ है, जिसका गांधीजी भी हिस्सा हुआ करते थे। http://www.prabhatkhabar.com/

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  • मनोज श्रीवास्तव
    क्या किसी स्त्री के बारे में सिर्फ उसके भागे होने के कथित तथ्य पर उसे अपराधी और चरित्रहीन की तरह प्रस्तुत करना प्रेस या मीडिया की स्वतंत्रता का हिस्सा बन सकता है? क्या किसी स्त्री को जो अभी ठीक से किसी न्यायालय में ड्डष्ष्ह्वह्यद्गस्र भी नहीं हुई हो, के निजी जीवन का चटखारा लेना मीडिया का मौलिक स्वतंत्रता है?
    यह कौन सी मीडिया स्वतंत्रता हैं जो स्त्री को एक वस्तु की तरह टीआरपी के मुकाम पर बेचते हैं? क्या पुलिस के द्वारा बंद हवालात में किया जाने वाला टार्चर खुलेआम किसी स्त्री की अंतर्हित गरिमा के साथ खुलकर किए जाने वाले टीवी टार्चर से विशेष बदतर है?
    क्या टीवी की बहस के लिए उपलब्ध न होना स्त्री के लिए इतना काफी है कि भारतीय संविधान में दिया गया वह अधिकार भी उसके लिए बेमानी हो जाए कि no person accused of any offence shall be compelled to be witness against herself.
    यदि कोई स्त्री दोषी सिद्ध होने तक निर्दोष की पूर्वधारणा की अधिकारिणी है तो क्या इस अधिकार को कुचलना मीडिया के अधिकार का हिस्सा हो सकता है? यह स्त्री के जीवन में इस तरह घुसने वाला मीडिया क्या उसके यश:काय के साथ दिन-दहाड़े बलात्कार नहीं करता? क्यों माइरा हिंडली जैसी महिला 30 साल की सजा भुगतकर भी रिलीज हो तो भी मीडिया उसे माफ नहीं करता? क्यों मैक्सिन कार अपनी पूरी सजा काटकर भी निकले तो भी यह मीडिया उस स्त्री को दानवीकृत करने से बाज नहीं आता? क्यों लिंडी चैम्बरलेन को मीडिया ट्रायल मात्र के आधार पर निर्दोष होने के बावजूद छ: साल जेल में बिताने पड़े? क्या मीडिया को किसी क्षतिपूर्ति का अपना कोई नैतिक दायित्व महसूस हुआ?
    क्या राइट टू फेयर ट्रायल का संवैधानिक वादा मीडिया ट्रायल की देहरी तक आते आते दम तोड़ देता है? यदि अमरीका में उच्चतम न्यायालय को ऐसी televising अमरीकी संविधान में दी गई due process of law के विरुद्ध लगती है तो हमारे यहां क्यों चुप्पी है?
    और अमरीका  में तो सन ऑफ सेम लॉ है कि जो अपराधियों को अपने अपराधों के प्रचार से लाभ प्राप्त करने से रोकता है लेकिन मान लो भारत की स्त्रियां अपने पतन की कहानियां बेचने लगीं तब मीडिया के तो वारे न्यारे हो जाएंगे लेकिन हमारा सार्वजनिक विमर्श इन्हीं सेमी-पोर्न गुदगुदाहटों में ग्रस्त हो जाएगा।
    और जब इन चीजों की तलब लग जाए तो शोषण और लूट की कारपोरेट संरचनाओं की असल विद्रूपताओं पर परदा ही डल जाएगा। स्त्री की इज्जत को सरेआम उघाड़ कर पूंजी अपने हिजाब तैयार करती है ।

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  • - ध्रुव गुप्त
    इस्लामी वर्ष यानी हिजरी सन् के पहले महीने मुहर्रम की शुरुआत हो चुकी है। इस महीने को इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार किया जाता है। अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद ने इसे अल्लाह का महीना कहा है। इस पाक माह में रोज़ा रखने की अहमियत बयान करते हुए उन्होंने कहा है कि रमजान के अलावा सबसे अच्छे रोज़े वे होते हैं जो अल्लाह के महीने यानी मुहर्रम में रखे जाते हैं। मुहर्रम के दसवे दिन को यौम्र आशुरा कहा जाता है जिसका इस्लाम ही नहीं, मानवता के इतिहास में एक बेहद महत्वपूर्ण स्थान है। यौमे आशुरा वह दिन है जब सत्य, न्याय और मानवीयता के लिए संघर्षरत हजऱत मोहम्मद के नवासे हुसैन इब्न अली की कर्बला के युद्ध में उनके बहत्तर स्वजनों और दोस्तों के साथ शहादत हुई थी।
     हुसैन विश्व इतिहास की ऐसी कुछ ऐसे महानतम विभूतियों में हैं जिन्होंने अपनी सीमित सैन्य क्षमता के बावज़ूद आततायी यजीद की विशाल सेना के आगे आत्मसमर्पण करने के बजाय लड़ते हुए अपनी और अपने समूचे कुनबे की कुर्बानी देना स्वीकार किया। कर्बला में इंसानियत के दुश्मन यजीद की अथाह सैन्य शक्ति के विरुद्ध हुसैन और उनके स्वजनों के प्रतीकात्मक प्रतिरोध और अंतत: उन सबको भूखा-प्यासा रखकर यजीद की सेना द्वारा उनकी बर्बर हत्या के किस्से पढ़-सुनकर आज भी आंखें नम हो जाती हैं। 
    मनुष्यता के हित में अपना सब कुछ लुटाकर भी कर्बला में उन्होंने सत्य के पक्ष में अदम्य साहस की जो रोशनी फैलाई, वह सदियों से न्याय और उच्च जीवन मूल्यों की रक्षा के लिए लड़ रहे लोगों की राह रौशन करती आ रही है। भविष्य में भी करती रहेगी ! कहा जाता है कि च्कत्ले हुसैन असल में मरगे यज़ीद हैं / इस्लाम जि़न्दा होता है हर कर्बला के बाद। इमाम हुसैन का वह बलिदान दुनिया भर के मुसलमानों के लिए ही नहीं, संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। हुसैन मुसलमानों के ही नहीं, हम सबके हैं। यही वज़ह है कि यजीद के साथ जंग में लाहौर के एक ब्राह्मण रहब दत्त के सात बेटों ने भी शहादत दी थी जिनके वंशज ख़ुद को गर्व से हुसैनी ब्राह्मण कहते हैं। मरहूम अभिनेता सुनील दत्त इन्हीं हुसैनी ब्राह्मणों के वंशज थे। 
    इस्लाम के प्रसार के बारे में पूछे गए एक सवाल के ज़वाब में एक बार महात्मा गांधी ने कहा था- मेरा विश्वास है कि इस्लाम का विस्तार उसके अनुयायियों की तलवार के ज़ोर पर नहीं, इमाम हुसैन के सर्वोच्च बलिदान की वज़ह से हुआ। नेल्सन मंडेला ने अपने एक संस्मरण में लिखा है - कैद में मैं बीस साल से ज्यादा गुज़ार चुका था। एक रात मुझे ख्याल आया कि मैं सरकार की शर्तों पर आत्मसमर्पण कर इस यातना से मुक्त हो जाऊं, लेकिन तभी अचानक मुझे इमाम हुसैन और करबला की याद आई। उनकी याद ने मुझे वह ताकत दी कि मैं विपरीत परिस्थितियों में भी स्वतंत्रता के अधिकार के लिए खड़ा रह सकूं।
    लोग सही कहते हैं कि इमाम हुसैन आज भी जि़न्दा हैं, मगर यजीद भी अभी कहां मरा है? यजीद अब एक व्यक्ति का नहीं, एक अन्यायी और बर्बर सोच और मानसिकता का नाम है। दुनिया में जहां कहीं भी आतंक, ज़ुल्म, अन्याय, बर्बरता, अपराध और हिंसा है, यजीद वहां-वहां मौज़ूद है। 
    यही वज़ह है कि हुसैन हर दौर में प्रासंगिक हैं। मुहर्रम उनके मातम में अपना ही खून बहाने का नहीं, उनके सर्वोच्च बलिदान से प्रेरणा लेते हुए मनुष्यता,समानता,अमन, न्याय और अधिकार के लिए उठ खड़े होने का अवसर है।

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  • अनुराग भारद्वाज
    गुरमीत राम रहीम पर फैसला आने के बाद से उपजी हिंसा और उसके बाद के हालात पर राजनैतिक चुप्पी कोई नयी बात नहीं है। गलत के साथ अगर किसी के हित जुड़े हुए हों तो फिर उसमें इसे गलत कहने की इच्छाशक्ति बहुत कम ही देखी जाती है।
    महाभारत में भीष्म, द्रोणाचार्य आदि जीवन भर 'गलतÓ के साथ जुड़े रहे। आज गुरमीत राम रहीम वाले मामले में हमारे राजनीतिक नेतृत्व के साथ कुछ ऐसी ही स्थिति दिखती है। प्रतिकार कर सकते हैं, पर करते नहीं हैं। सबके अपने-अपने हित जुड़े हैं।
    तीन तलाक वाले मुद्दे पर सबका फायदा था। सब एक सुर में बोल पड़े। गुरमीत राम रहीम के अनुयायी बहुत बड़ा वोट बैंक हैं। सब चुप रह गए। यह राजनैतिक चुप्पी या एक सुर में चहचहाना कदम ताल जैसा लगता है। लेकिन सैनिकों की कदम ताल विश्वास जगाती है। राजनेताओं की कदम ताल समाज को डराती है। पर ऐसे भी उदाहरण हैं जब प्रभाव रखने वाले व्यक्तियों ने इस 'गलतÓ के खिलाफ आवाज उठाई और दुनिया ने उसे सुना भी। चाहे नुकसान का खतरा कितना भी बड़ा क्यों न रहा हो, ये लोग झुके नहीं।
    महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन अपने चरम पर था। सरकार बिलकुल ठप्प हो गयी थी। बस कुछ दिन और गुजर जाते तो शायद घुटनों पर आ जाती। गांधी अपनी शर्तों पर 1922 में ही देश की तकदीर बदल सकते थे। तभी चौरा-चौरी हत्याकांड हो गया। 22 पुलिसकर्मी एक थाने में जलाकर मार दिए गए। गांधी स्तब्ध रह गए। सोचने लगे कि उनसे क्या भूल हुई जो शांतिप्रिय आंदोलन एकदम से हिंसक हो उठा।
    राष्ट्रपिता के सामने आंदोलन की सार्थकता और देश की आजादी का सवाल खड़ा हो गया था। बहुत लाजमी था कि उद्देश्य को ध्यान में रखकर वे आंदोलन को चलने देते। पर उनकी अंतरात्मा ने ऐसा करने से मना कर दिया। उनके लिए साध्य और साधन, दोनों महत्वपूर्ण थे। नतीजतन असहयोग आन्दोलन बंद कर दिया गया। देश भर में उनकी आलोचना हुई। कांग्रेस उनके फैसले से हैरान थी।
    लेकिन गांधी के मन में कोई संशय नहीं था। खुद को हिंसा का दोषी मानते हुए वे प्रायश्चित स्वरूप उपवास पर चले गए और जाते जाते कह गए कि हिंसा के जरिये प्राप्त की गई आजादी का कोई मूल्य नहीं है। उनका मानना था कि शायद समाज अभी अहिंसा के मर्म को समझा नहीं है और आजादी के लिए तैयार नहीं है। बाकी इतिहास है।
    1964 में तब मार्टिन लूथर किंग को नोबेल शान्ति पुरस्कार प्रदान किया था। अटलांटा निवासी मार्टिन लूथर तब महज 37 वर्ष के थे और अमरीका के अश्वेत आन्दोलन के प्रणेता थे। किंग के सम्मान में शहर के मेयर इवान एलन ने एक सामूहिक रात्रि भोज का आयोजन किया इसमें उन्होंने शहर के रसूखदार लोगों को आमंत्रित करने का फैसला किया। लोगों ने मेयर इवान एलन के आमंत्रण को तवज्जो नहीं दी। कारण कि शहर में श्वेत लोग बहुसंख्यक थे और उन्हें किसी अश्वेत को सम्मानित करना अपनी तौहीन लगी।
    मेयर ने कोका-कोला कंपनी के भूतपूर्व प्रेसिडेंट रोबर्ट वुडरूफ को हालात से रूबरू कराया और उनसे अटलांटा के बड़े उद्योगपतियों को उनका निमंत्रण स्वीकार करने की अपील करने को कहा। कोका कोला कंपनी तब वैश्विक या बहुराष्ट्रीय कंपनी बनने की प्रकिया में थी और अटलांटा में उसका हेडक्वार्टर था। अटलांटा शहर तब इस बात के लिए भी जाना जाता था कि कोका कोला का दफ्तर उस शहर में है। यह शहर के लिए एक सम्मान से कम नहीं था।
    रोबर्ट वुडरूफ ने तब कंपनी के सीईओ जे पॉल ऑस्टिन को मेयर की मदद करने को कहा। जे पॉल ऑस्टिन ने दक्षिण अफ्रीका में 14 साल बिताये थे और रंगभेद के समाज और व्यवसाय पर प्रभाव को काफी नजदीक से देखा था। उन्होंने एक मीडिया कॉन्फ्रेंस बुलाई और कह दिया, अगर यह शहर (अटलांटा) मार्टिन लूथर का सम्मान नहीं कर सकता तो हम कोका-कोला के दफ्तर को इस शहर से कहीं और ले जायेंगे चाहे कितना भी नुकसान क्यों न हो।
    उनकी बात ने असर किया। मेयर इवान एलन का मार्टिन लूथर किंग के सम्मान में दिया गया भोज सफल रहा। लगभग 1600 लोगों ने इसमें हिस्सा लिया। इस सम्मान से अभिभूत हुए मार्टिन लूथर किंग ने अपने भाषण में कहा, मेरे अपने शहर में मेरा इतना शानदार स्वागत और यह सम्मान मुझे ताउम्र याद रहेगा। इसी भोज में सब लोगों ने खड़े होकर अमरीका का मशहूर गाना 'वी शेल ओवरकमÓ गाया।
    कब राजनीतिक पार्टियां और हम अपना हित छोड़कर अपनी अंतरात्मा की आवाज के हिसाब से फैसला लेंगे? हम कब यह गाना गाने के लिए खड़े होंगे? सोचने की बात है। (सत्याग्रह)

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  • पंकज चतुर्वेदी
    हर समय तर रहने वाला बस्तर अब पूरे साल बूंद-बूंद पानी को तरस रहा है। खासतौर पर शहरी इलाकों का विस्तार जिन तालाबों को सुखा कर किया गया, अब कंठ सूख रहे हैं तो लोग उन्हीं को याद कर रहे हैं। दो दशक पहले तक बस्तर इलाके में 25,934 तालाब हुआ करते थे, हर गांव में कम से कम तीन-चार ताल या जलाशय। ये केवल पानी की जरूरत ही नहीं पूरा करते थे, आदिवासियों की रोजी रोटी व इलाके के मौसम को सुहाना बनाने में भी भूमिका अदा करते थे। वर्ष 1991 के एक सरकारी दस्तावेज के मुताबिक इलाके के 375 गांव-कस्बों की सार्वजनिक जल वितरण व्यवस्था पूरी तरह तालाबों पर निर्भर थी। 
    आज हालात बेहद खराब हैं। सार्वजनिक जल प्रणाली का मूल आधार भूजल हो गया है और बस्तर के भूजल के अधिकांश स्त्रोत बेहद दूषित हैं। फिर तालाब ना होने से भूजल के रिचार्ज का रास्ता भी बंद हो गया। इन दिनों वहां जम कर बारिश हो रही है और शहर-कस्बे लबालब है। सड़कों, घरों में पानी भर रहा है, लेकिन तालाब खाली हैं और बाशिंदों के कंठ भी रीते हैं। यहां के तालाब महज जल संासधन ही नहीं हैं, बल्कि बड़ी आबादी के लिए मछली, कमल गट्टा आदि के  माध्यम से जीवकोपार्जन का साधन भी हैं। तालाबों के दूषित होने से हजारों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट भी खड़ा है।
    यह बात सरकारी दस्तावेज में दर्ज है कि जब बस्तर, केरल राज्य से भी बड़ा एक विशाल जिला हुआ करता था, तब उसके चप्पे-चप्पे पर तालाब थे। आज जिला मुख्यालय बन गए जगदलपुर विकासखंड में 230,कांकेर विकासखंड में 275, नारायणपुर में 523, कोंडागांव में 623, बीजापुर में 302 और दंतेवाड़ा में 175 तालाब हुआ करते थे। दुगकोंदल में 410, फरसगांव में 678 कोंटा में 440, कोयलीबेड़ा विकासखंड में 503 तालाब हुआ करते थे। 
    सुकमा, दरभा, भोपालपट्नम जैसे दूभर इलाकों का जनजीवन तो तालाबों पर ही निर्भर था। सनद रहे कि इलाके में ग्रेनाईट, क्वार्टजाइट जैसी चटटनों का बोलबाला है और इसमें सरंध्रता बहुत कम होती है। इसके चलते बारिश का जल रिसता नहीं है व तालाब व छोटे पोखर वर्षा को अपने में समेट लेते थे।
     आज के तालाबों के हालात तो बेहद दुखद हैं।  बस्तर संभाग का मुख्यालय जगदलपुर है। बस्तर तो एक गांव है, कोंडागांव से जगदलपुर आने वाले मार्ग पर। सन् 1872 में महाराज दलपत राय अपनी राजधानी बस्तर गंाव से उठा कर जगदलपुर लाये थे। इसी याद में विशाल दलपत सागर सरोवर बनवाया गया था। कहा जाता है कि उस समय यह झीलों की नगरी था और आज जगदलपुर शहर का जो भी विस्तार हुआ है, वह उन्हीं पुराने तालाबों को पाट कर हुआ है। दलपत सागर का रकबा अभी सन् 1990 तक साढ़े सात सौ एकड़ हुआ करता था जो अब बामुश्किल सवा सौ एकड़ बचा है। पानी की पूरी सतह जलकुंभियों से पटी है व सफाई के अभाव में तालाब बेहद उथला हो गया है। थोड़ा-सा पानी बरसने पर शहर की कई कालोनियां पानी में डूब जाती हैं और वहां के वाशिंदे हल्ला-ग्ुाल्ला करते हैं कि पानी उनके घर में घुस रहा है। जबकि हकीकत तो यह है कि ये पूरी रिहाईश ही पानी के घर में घुस कर बसाई गई हैं। जल निधियों से समृद्ध ऐसे शहर में अब दलपत सागर तथा गंगा मुंडा तालाब को छोड़कर अन्य तालाबों का कोई अता-पता नहीं है। 
    चार दशक पूर्व तत्कालीन टाऊन प्लानिंग के अनुसार जगदलपुर में करीब आधा दर्जन से अधिक तालाब हुआ करते थे। जिसका उपयोग यहां के लोग निस्तार के लिए किया करते थे। तब दलपत सागर व गंगामुंडा के अलावा नयामुुंडा तालाब, बाला तराई, केवरामुंडा, रानमुंडा तथा तत्कालीन अघनपुर तथा वर्तमान में गुरूगोविंद सिंह व छत्रपति षिवाजी वार्ड में दो तालाब थे। लेकिन यहां देखने के लिए महज दो ही तालाब रह गये है। हालांकि अभी कोई तीन तालाब शहरी क्षेत्र में मौजूद है जिनकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। 
    दंतेवाड़ा में लाल आतंक व पुलिस अत्याचार के ही इतने किस्से होते हैं कि जनता भूल गई है कि वे पानी के लिए भी तरस रहे हैं। यहां भी पुराने तालाबों में हो रहे अतिक्रमण और पटते तालाबों के गहरीकरण को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। दक्षिण बस्तर जिले के कारली, मांझीपदर, चितालंका, पुरनतरई, टेकनार, कुम्हाररास, चितालूर, दंतेवाड़ा, तुमनार, समलूर, बिंजाम, नागफनी आदि स्थानों में सदियों पुराने विशाल जलाशय हैं। बारसूर को तो तालाबों और मंदिरों की नगरी ही कहा जाता है, यहां के 147 तालाबों में सौ से ज्यादा तालाब खेतों में तब्दील हो चुके हैं। पुरनतरई, कुम्हाररास, टेकनार, चितालूर, बारसूर के तालाबों से लगे जिन किसानों की खेत हैं, वे अपने खेतों का रकबा तालाबों की सीमा के अंदर तक बढ़ा चुके हैं।
     कांकेर शहर में पानी का संकट स्थाई तौर पर डेरा डाले हुए है। उदयनगर, एमजी वार्ड जैसे घने मुहल्ले में नल बमुश्किल आधा घंटा टपकते हैं। वहीं जमीन पर देखें तो कांकेर के चप्पे-चप्पे पर प्राचीन जल निधियां हैं जो अब पानी नहीं, मच्छर व गंदगी बांटती हैं। शहर की शान कहे जाने वाले डंडिया तालाब को चौपाटी निर्माण योजना के चलते आधे से ज्यादा हिस्सा पाट दिया गया है। पालिका की चौपाटी की योजना तो चौपट हुई उसके चलते तालाब का हिस्सा भी चौपट हो गया।
    शहर के माहुरबंद पारा वार्ड के बीचों-बीच स्थित डबरी है तो अब लोगों को याद ही नहीं है क्योंकि उस तक पहुंचने का रास्ता ही भूमाफिया चट कर गए है। इसके साथ ही तालाब के बड़े हिस्से पर दुकानें बना दी गईं। शीतलापारा के दीवान तालाब को कचरे से पाट दिया गया। शहर के बीचों बीच स्थित गोसाई तालाब का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है, क्योंकि उसे बाकायदा सुख कर हजारों मकान बना दिए गए। कांकेर नगरपालिका दफ्तर के ठीक सामने स्थित दुधावा तालाब को बिल्डर देखते ही देखते हड़प गए व सरकारी रिकार्ड में वहां कालोनी दर्ज हो गई। सुभाष वार्ड की डबरी हो या फिर मेला भाठा स्थित काकालीन तालाब, सरकारी अफसरों, नेताओं व बिल्डरों की मिलीभगत से पाट दिए गए। 
    हालात अकेले शहरों के ही नहीं दूरस्थ अंचलों के भी भयावह हैं। बस्तर संभाग के 70 फीसदी सिंचाई तालाबों का पानी सूख चुका है अथवा बहुत थोड़ा पानी बचा है। 

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  • एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ तमिल पत्रकार
    तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के दो परस्पर-विरोधी गुटों की महीनों पुरानी तकरार निर्णायक दौर में पहुंच गई है। एक गुट का नेतृत्व मुख्यमंत्री ई पलानीसामी कर रहे हैं, तो दूसरे के सेनापति शशिकला के भतीजे टीटीवी दिनाकरन हैं। पर इस तकरार के लंबा और कटु होने की आशंका है, क्योंकि अंतिम जंग अदालत में लड़ी जा सकती है। सोमवार को राज्य विधानसभा अध्यक्ष पी धनपाल ने दिनाकरन गुट के 18 विधायकों को अयोग्य घोषित करके एक नए विवाद को हवा दे दी। ये वही विधायक हैं, जो कर्नाटक के एक रिजॉर्ट में रुके थे। अध्यक्ष ने यह कार्रवाई दल-बदल कानून से जुड़े संविधान के अनुच्छेद-10 के तहत की है। इन सभी विधायकों को अध्यक्ष ने नोटिस जारी करके उनके समक्ष उपस्थित होने को कहा था, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। अलबत्ता, उन्होंने गवर्नर विद्यासागर राव से मुलाकात करके समर्थन वापसी का अपना-अपना पत्र सौंपकर मुख्यमंत्री पलानीसामी को हटाने की मांग कर दी।
    सदस्यता रद्द होने के साथ ही तमिलनाडु विधानसभा में विधायकों का संख्या-बल कम हो गया है और इसीलिए राज्य सरकार आसानी से विश्वास मत हासिल कर सत्ता में रह सकेगी। मुमकिन है कि यह दांव मुख्यमंत्री ने खेला हो, ताकि अपनी लडख़ड़ाती सरकार को वह बचा सकें। पर दिनाकरन गुट के विधायकों ने इसके खिलाफ अदालत में जाने का फैसला किया है।
    विधानसभा अध्यक्ष की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि तमिलनाडु विधानसभा की 18 सीटों को अब खाली समझा जाए। जाहिर है, अब नए प्रतिनिधियों के चुनाव के लिए मतदान हो सकते हैं। मगर यह भी सच है कि दोनों में से कोई भी गुट फिलहाल मतदाताओं का सामना नहीं करना चाहता। इसका अंदाजा स्थानीय निकाय चुनावों से भी लगाया जा सकता है, जिससे सरकार अपने पांव खींच रही है, जबकि अदालत ने जल्द से जल्द इन चुनावों को कराने का आदेश दिया है।
    विधानसभा अध्यक्ष की इस कार्रवाई पर कई लोगों ने आपत्ति जताई है। वे इस फैसले को पक्षपातपूर्ण मानते हैं। विपक्ष की प्रतिक्रिया आई है कि विधानसभा अध्यक्ष पी धनपाल ने गरिमापूर्ण आचरण की बजाय उस गुट को निशाना बनाया, जो मुख्यमंत्री के खिलाफ मोर्चा लिए हुए है। यह ऐसा सियासी दांव है, जो नैतिकता की बलि देकर सरकार को बचाने के लिए खेला गया है। दूसरी तरफ, धनपाल अपनी कार्रवाई को उचित बता रहे हैं। उनका कहना है कि गवर्नर के पास मुख्यमंत्री की शिकायत ले जाना ही यह बताता है कि विधायकों का उन पर भरोसा नहीं है, और इसका अर्थ है कि उन्होंने खुद ही विधानसभा की सीट छोड़ दी है। कानूनविदों की मानें, तो विधानसभा अध्यक्ष की यह दलील अदालत में टिकने वाली नहीं।
    संविधान का 10वें अनुच्छेद में उन प्रावधानों का जिक्र है, जिनके द्वारा विधायकों को दल-बदल के आधार पर अयोग्य ठहराया जा सकता है। संसद या विधानसभा का वह सदस्य अयोग्य हो सकता है, जिसने स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ी हो या सदन में मतदान की प्रक्रिया में पार्टी व्हिप का उल्लंघन किया हो। दिनाकरन गुट का कहना है कि अयोग्य घोषित किए गए सभी सदस्य अन्नाद्रमुक के चुनाव-चिह्न पर चुनकर आए हैं और वे आज भी पार्टी के सदस्य हैं। उन्होंने पार्टी तोड़कर कोई दूसरा दल नहीं बनाया, न ही पार्टी व्हिप की अवहेलना की है और न ही विपक्ष के साथ किसी तरह का गठजोड़ किया है। 
    साफ है कि उन्हें मनमाने तरीके से सदन से बाहर किया गया है। हालांकि मुख्यमंत्री के प्रवक्ता इन सबसे इत्तफाक नहीं रखते। उन्होंने यह आरोप लगाया है कि विरोधी गुट विपक्षी द्रमुक के साथ मिलकर मुख्यमंत्री को हटाने की कोशिश में है। पिछले हफ्ते दिनाकरन गुट के उस वक्त अदालत जाने को मुख्यमंत्री खेमा बतौर सुबूत पेश कर रहा है, जब द्रमुक विश्वास मत हासिल करने संबंधी याचिका लेकर कोर्ट गई थी। द्रमुक ने आशंका जताई थी कि राज्य सरकार विश्वास मत बनाए रखने के लिए कुछ विधायकों को अयोग्य ठहरा सकती है।
    इस घटनाक्रम ने एक बार फिर विधानसभा अध्यक्ष की सांविधानिक शक्तियों को सुर्खियों में ला दिया है। यह मुद्दा अदालत में विचाराधीन है, इसलिए दिनाकरन गुट को अपनी लड़ाई पर भरोसा है। वे सवाल उठाते हैं कि अगर टीटीवी समर्थकों को आज निष्कासित किया जा सकता है, तो अध्यक्ष महोदय ने फरवरी में तब कार्रवाई क्यों नहीं की, जब ओ पन्नीरसेल्वम ऐसी ही परिस्थिति में अपने 10 समर्थकों के साथ सदन में विश्वास मत के लिए पहुंचे थे? हालांकि सियासी नजरिये से देखें, तो नया घटनाक्रम टीटीवी दिनाकरन के लिए किसी बड़े धक्के से कम नहीं है। वह फिलहाल मुख्यमंत्री, उप-मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी, तीनों के निशाने पर हैं। इन सभी की ख्वाहिश है कि शशिकला गुट को राज्य की राजनीति से बाहर कर दिया जाए। इससे पहले शशिकला को अन्नाद्रमुक से बाहर किया ही गया है।
    बहरहाल, सात महीने से मुख्यमंत्री की कुरसी पर आसीन पलानीसामी अपनी सरकार बचाने, सियासी बाधाओं को दूर करने, अन्नाद्रमुक का पूरा प्रभार लेने, 'दो पत्तीÓ वाले चुनाव चिह्न पर दावा हासिल करने और केंद्र के साथ करीबी रिश्ते को उत्सुक हैं। विरोधियों के इस हमले पर कि केंद्र की भाजपा सरकार पिछली सीट पर बैठकर राज्य की सियासत चला रही है, पलानीसामी यही जवाब देते हैं कि 'केंद्र के साथ मिलकर काम करने में आखिर बुराई क्या है?Ó यह सही है कि अन्नाद्रमुक की आपसी लड़ाई अब निर्णायक बिंदु पर पहुंचती दिख रही है, पर सच यह भी है कि राज्य का सियासी संकट फिलहाल खत्म होता हुआ नहीं दिखता। बीते 18 महीने में वास्तविक तौर पर बिना किसी शासन के भी जो तमिलनाडु देश में 'सर्वश्रेष्ठ शासित राज्यÓ का दर्जा हासिल कर सका था, वहां कृषि संकट, शिक्षा क्षेत्र में निराशा, सरकारी कर्मियों का आंदोलन, कानून-व्यवस्था की बिगड़ती हालत जैसे तमाम संकेत उभर रहे हैं। जयललिता के निधन और करुणानिधि की खराब सेहत की वजह से यह सूबा एक विश्वसनीय नेतृत्व की तलाश में है। मतदाताओं को भरोसा है कि राजनीतिक वर्ग मौके की नजाकत को देखकर जागेगा और राज्य में एक स्थिर सरकार की ओर बढ़ेगा। मगर फिलहाल यह दूर की कौड़ी ही लगती है।

     

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  • तुलिका कुशवाहा
    आजकल देश में पुलिस, सीबीआई, इंटेलीजेंस ब्यूरो और रॉ के अलावा कुछ दूसरी खुफिया एजेंसियां भी काम कर रही हैं। ये एजेंसियां हर मुद्दे में चार एंगल ढूंढती हैं, खुफिया जानकारी निकालती हैं और स्टिंग ऑपरेशन करती हैं। एक के बाद एक शो बनाकर ये एजेंसियां किसी भी मुद्दे के नतीजे पर पहुंचने के लिए बेताब होती हैं लेकिन कभी कोई निचोड़ नहीं निकलता क्योंकि ये उनका इरादा भी नहीं है। ये एजेंसियां पहले पत्रकारिता करती थीं, अब वायरल झूठ के पीछे का सच ढूंढती हैं, देश में नागों, भूतों, तांत्रिकों के ऊपर रिसर्च में पैसे फूंकती हैं, चोटीकटवा पर शो बनाती हैं और अगर कहीं कोई अप्रिय घटना हो गई, किसी नेता ने उल्टा-पुल्टा बोल दिया तो हैशटैग चलाती हैं।
    लेकिन इन्हें सबसे ज्यादा पसंद है क्राइम इन्वेस्टीगेशन। खासकर किसी नेता, बाबा या सेलेब्रिटी का सेक्स स्कैंडल हो तो इनकी टीआरपी के वारे-न्यारे हो जाते हैं। फिर इनका इन्वेस्टीगेशन किसी सेक्स सीडी पर ही जाकर खत्म होता है।
    पिछले दिनों भक्तों के स्वयंभू भगवान बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह ने अपनी फिल्मी जिंदगी का क्लाइमेक्स जेल में जाकर देखा। उम्मीद है कि फिल्म खत्म हो गई है, क्योंकि बाबा ने पूरी फिल्म में जितने एक्शन किए हैं, उनका मजमून निकले, तो अब वो कभी बाहर आने से रहा। बाबा के एक-एक मूवमेंट पर कैमरे गड़ाए इन स्पेशल खुफिया एजेंसियों ने बाबा के जेल जाने के बाद एक और सोने का अंडा देने वाली मुर्गी ढूंढ ली है। बाबा की बेहद करीबी मानी जाने वाली हनीप्रीत इंसा आजकल न्यूज चैनलों की टीआरपी का सहारा बनी हुई है। इन एजेंसियों यानी न्यूज चैनलों की टीआरपी के पीछे पागल प्रोड्यूसरों, एडिटरों और मैनेजरों को पता है कि कौन नंबर लाएगा कौन नहीं।
    हनीप्रीत के अंदर उन्हें अपना उज्ज्वल हफ्ता दिखाई दे रहा है। हर रोज ये एजेंसियां हनीप्रीत के ऊपर दो-चार शो बनाकर असली न्यूज के लिए टकटकी लगाए दर्शकों के मुंह पर दे मारती हैं। और चूंकि सारी एजेंसियां यही कर रही हैं, तो न दर्शकों के पास कोई रास्ता है न शो का आइडिया ढूंढ रहे, पैकेज लिख रहे प्रोड्यूसरों के पास। हनीप्रीत पर आते हैं। न्यूज चैनलों ने ये पता लगाने के लिए हनीप्रीत कहां है, अपने अंदर के खोजी पत्रकार के गुण को बिल्कुल निचोड़ लिया है लेकिन कुछ पता नहीं चल पा रहा क्योंकि वो काम पुलिस का है, लेकिन हर रोज के लिए इसी बात पर तो पैकेज नहीं बन सकता न कि हनीप्रीत कहां भाग गई, इसलिए और भी बहुत कुछ पता लगाने की कोशिश की जा रही है। मसलन, हनीप्रीत बाबा के कितने करीब है या डेरे में चल रहे गलत कामों में हनीप्रीत की कितनी हिस्सेदारी थी। एक बड़ी न्यूज वेबसाइट ने ये भी पता लगाने की कोशिश की कि क्या हनीप्रीत ही बाबा की लव चार्जर है?
    एक न्यूज चैनल ने तो नाट्य रूपांतरण करके डेरे के अंदर चलने वाले माफीनामे यानी बाबा की रासलीला की दो पार्ट में फिल्म ही बना दी। हनीप्रीत का बाबा से क्या संबंध था? हनीप्रीत की अपनी शादी क्यों सफल नहीं रही? हनीप्रीत बाबा के इतने करीब क्यों थी? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो न्यूज चैनलों ने बनाए हैं और इसके जवाब ढूंढने में उन्हें बहुत मजा आ रहा है। उन्हें कभी हनीप्रीत हरियाणा में दिखाई देती है, कभी राजस्थान में तो कभी नेपाल में। अब तो बिहार में हनीप्रीत के मोस्ट वांटेड के पोस्टर भी लग चुके हैं।
    लेकिन क्या आपको याद है कभी किसी बड़े अपराधी के किसी करीबी पर टीवी ने इतना ध्यान दिया है? न्यूज चैनलों को हनीप्रीत पर इन्वेस्टीगेशन करने में इतना मजा क्यों आ रहा है? सीधी-सीधी बात है अगर यही बाबा रेप के मामले में अंदर नहीं गया होता और डेरे में गुफा के अंदर बाबा के रासलीला की खबरें नहीं आतीं, तो हनीप्रीत कभी इनके निशाने पर नहीं होती। बाबा की मुंहबोली बेटी हनीप्रीत सुंदर है, बाबा की फिल्मों को डायरेक्ट किया है, उनमें रोल किए हैं और हर फंक्शन में बाबा के साथ खड़ी रही है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि वो बाबा जितनी दोषी हो गई और टीवी वालों को उसके नाम पर रोज छीछालेदर मचाने का अधिकार मिल गया।
    अगर वो अपराधी है भी तो भी टीवी पर उसका नाम रटते रहने से उसे सजा नहीं मिल जाएगी। टीवी ये तय नहीं करता कि कौन अपराधी है कौन नहीं। ये काम पुलिस के जिम्मे रहने दीजिए। और वैसे भी पुलिस ने अब तक इस मुद्दे पर कहा क्या है? क्या पुलिस ने कह दिया है कि हनीप्रीत के बाबा से अवैध संबंध थे? या वो बाबा के साथ डेरे में सेक्स रैकेट चलाती थी? क्या पुलिस ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि हनीप्रीत गंभीर अपराध करके भाग रही है या पुलिस ने हनीप्रीत के खिलाफ चार्जशीट फाइल कर ली है? फिर आप किस बात पर बेचैन हुए जा रहे हैं? लगता है ये चैनल भूल गए हैं कि बाबा जब अपनी फिल्मों का प्रमोशन करता था, तो यही लोग हाथ जोड़-जोड़कर उसे अपने चैनल पर बुलाते थे। इन्हीं की उस बाबा और हनीप्रीत के सामने चूं-चपड़ करने की हिम्मत नहीं होती थी।
    टीवी वालों को पता है कि बाबा के प्रति उभरे गुस्से को हनीप्रीत का चीरहरण करके भुनाया जा सकता है, इसलिए वो इस मामले को ताजा बनाए रखना चाहते हैं। उनकी सेक्स सीडी की तलाश वैसे भी हार्ड डिस्क तक पहुंच चुकी है, हो सकता है सेक्स सीडी तक भी पहुंच जाए। दिलचस्प और जरूरी सवाल ये है कि अगर यही हनीप्रीत एक बदसूरत औरत होती, तो ये न्यूज चैनल कितने शो बनाते?
    मत भूलिए, आप एक ऐसी औरत के नाम पर न्यूज चलाने का धंधा कर रहे हैं, जिसपर पुलिस अभी तक कोई आपराधिक केस नहीं दर्ज कर पाई है। केस तो छोडि़ए, हनीप्रीत तो पुलिस के हाथ ही नहीं लगी है अभी। पुलिस इस मामले में कितनी तेज है, सब दिख रहा है। लेकिन आपको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। हनीप्रीत के नाम पर न्यूज चैनल जो कुछ भी कर रहे हैं वो सरासर बदतमीजी है। जासूस बनना बंद कर दीजिए, पुलिस को उसका काम करने दीजिए।
    न्यूज चैनलों में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं दिखती। हो सकता है स्थितियां और बिगड़े हीं। लेकिन यही हाल रहा तो वो वक्त भी आएगा, जब या तो ये न्यूज चैनल खुद को ही बचाने का केस लड़ रहे होंगे या इन्हें ये बात समझ लेनी होगी कि ये न्यूज चैनल हैं न कि खुफिया एजेंसी। (फस्र्टपोस्ट)

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  • शिवप्रसाद जोशी
    भुखमरी पर अपनी तरह की इस पहली रिपोर्ट स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रीशन इन द वर्ल्ड, 2017 में बताया गया है कि कुपोषित लोगों की संख्या 2015 में करीब 78 करोड़ थी तो 2016 में यह बढ़कर साढ़े 81 करोड़ हो गई है। हालांकि सन 2000 के 90 करोड़ के आंकड़े से यह अभी कम है लेकिन लगता है कि आगे बढऩे के बजाए मानव संसाधन की हिफाजत के पैमाने पर दुनिया पीछे ही खिसक रही है। कुल आबादी के लिहाज देखें तो एशिया महाद्वीप में भुखमरी सबसे ज्यादा है और उसके बाद अफ्रीका और लातिन अमेरिका का नंबर आता है।
    संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट भुखमरी के कारणों में युद्ध, संघर्ष, हिंसा, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदा आदि की तो बात करती है लेकिन नवसाम्राज्यवाद, नवउदारवाद, मुक्त अर्थव्यवस्था और बाजार का ढांचा भी एक बड़ा कारण है। आखिर उसके गिनाये कारणों की जड़ में भी तो कुछ है। लेकिन उस पर संयुक्त राष्ट्र चुप है। एशिया का एक बड़ा भूभाग गरीब और विकासशील देशों से बना है। ऐसे देश जिन्हें गुलामी से मुक्ति पाए ज्यादा समय नहीं बीता है। फिर भी इसी भूभाग में ऐसे देश भी हैं जो आर्थिक मोर्चे पर बड़ी ताकतों के समकक्ष माने-जाने लगे हैं, जिनकी आर्थिक क्षमता के आगे बड़े बाजार नतमस्तक हैं। 
    इन देशों में चीन, कोरिया, जापान और भारत शामिल हैं। बल्कि इनमें से चीन तो घोषित महाशक्ति है। अन्य चार देश सामरिक तौर पर विश्व के अग्रणी देशों में आ गये हैं। अंतरराष्ट्रीय जलवे के विपरीत, एशिया में भुखमरी की दर का विस्तार बताता है कि इस महाद्वीप की सरकारों की प्राथमिकताएं क्या हैं।  दुनिया के कुपोषितों में से 19 करोड़ कुपोषित लोग भारत में हैं। भारतीय आबादी के सापेक्ष भूख की मौजूदगी करीब साढ़े 14 फीसदी की है। भारत में पांच साल से कम उम्र के 38 प्रतिशत बच्चे सही पोषण के अभाव में जीने को विवश है जिसका असर मानसिक और शारीरिक विकास, पढ़ाई-लिखाई और बौद्धिक क्षमता पर पड़ता है। रिपोर्ट की भाषा में ऐसे बच्चों को स्टन्टेड कहा गया है। पड़ोसी देश, श्रीलंका और चीन का रिकॉर्ड इस मामले में भारत से बेहतर हैं जहां क्रमश: करीब 15 प्रतिशत और 9 प्रतिशत बच्चे कुपोषण और अवरुद्ध विकास के पीडि़त हैं। भारतीय महिलाओं के हाल भी कोई अच्छे नहीं। रिपोर्ट बताती है कि युवा उम्र की 51 फीसदी महिलाएं एनीमिया से पीडि़त हैं यानी उनमें खून की कमी है।
    भारत में कुपोषण से निपटने के लिए योजनाएं बनी हैं लेकिन उन पर सदाशयता और शिद्दत से अमल होता नहीं दिखता। महंगाई और खाद्य पदार्थों की कीमतों में उछाल ने गरीबों और निम्न आय के लोगों को असहाय बना दिया है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली हांफ रही है और मिड-डे मील जैसी आकर्षक परियोजनाएं भ्रष्टाचार और प्रक्रियात्मक विसंगतियों में डूबी हैं।
    उधर किसान बिरादरी कर्ज और खराब मौसम की दोहरी मार में पिस रही है। बीज और खाद की उपलब्धता का रास्ता निजी कंपनियों से होकर जा रहा है, पानी सूख रहा है, खेत सिकुड़ रहे हैं, निवेश के जोन पनप रहे हैं, तेल और ईंधन की कीमतें उछाल पर हैं और लोग जैसे-तैसे बसर कर रहे हैं। इस दुर्दशा में उस अशांति, हिंसा और भय को भी जोड़ लीजिए जो कभी धर्म-जाति के नाम पर कभी खाने-पीने या पहनने-ओढऩे के नाम पर बेतहाशा हो रही है।
    कहा जा सकता है कि खराब तस्वीर बता रहे हैं। हाल इतना भी बुरा नहीं तो फिर ये आंकड़े गलत हैं? या वो दृश्य फर्जी हैं जो वहां से फूट रहे हैं जहां असली भारत बसता है? क्या किया जाना चाहिए से पहले इस चिंता को अपनी आगामी सक्रियता का आधार बनाना चाहिए कि हालत नहीं सुधरे तो सारी भव्यताएं, सारा ऐश्वर्य, सारी फूलमालाएं सूखते देर नहीं लगेगी और भूख और अन्य दुर्दशाएं हमें एक कबीलाई हिंसा में धकेल देंगी। 
    सरकारी योजनाएं दीर्घकालीन और सख्ती से लागू होनी चाहिए, सुनिश्चित क्रियान्वयन के लिए एक मुस्तैद पारदर्शी मशीनरी बनायी जाए, गैर-योजनागत मदों के खर्चों में कटौती हो, गरीबों से सब्सिडी न छीनी जाए, बैंकों को उन्हें राहत देने को कहा जाए, किसानों के लिए सस्ते और टिकाऊ संसाधन विकसित किए जाएं, अंधाधुंध शहरीकरण और निर्माण को बंद किया जाए, स्कूली बच्चों की शिक्षा में देहात, किसानी, गरीबी और पोषण से जुड़े विषय अनिवार्य किए जाएं, विशेषज्ञ दौरा करें, वंचित तबकों के बच्चों को पोषणयुक्त आहार के लिए केंद्र खोले जाएं, बीमार हों तो उन्हें सही समय पर सही इलाज मिल सके, लोगों में सामूहिकता और भागीदारी की भावना का विकास करने के लिए अभियान चलाए जाएं, खाते-पीते घरों के स्कूली बच्चों को फूड वेस्टेज के नुकसान के बारे में शिक्षित और जागरूक किया जाए। 
    महंगी दावतों और मध्यवर्गीय विलासिताओं पर अंकुश लगाया जाए, विज्ञापन कंपनियों को भी दिशा निर्देश दिए जाएं, होटलों और शैक्षिक संस्थानों, दफ्तरों, कैंटीनों, बैठकों, शादी और अन्य समारोहों और अन्य संस्थाओं में खाना बेकार न किया जाए। इस खाने के वितरण की हर राज्य में जिला स्तर पर और भी यथासंभव निचले स्तरों पर मॉनीटरिंग की व्यवस्था हो। इस तरह ऐसे बहुत से तरीके होंगे जो हम अपने समाज की बदहाली और कुपोषण से छुटकारे के लिए कर सकते हैं। आखिर में खुद से पूछना चाहिए कि क्या हम अशांत, अस्थिर, हिंसक और अस्वस्थ समाज चाहते हैं या उसे बदलना चाहते हैं? (डॉयचे वैले)

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  •  डी भट्टाचार्य, रिसर्च फेलो, इंडियन काउंसिल ऑफ वल्र्ड अफेयर्स
    पिछले महीने अगस्त की 21 तारीख को ट्रंप की दक्षिण एशिया और अफगान नीति की घोषणा के बाद पाकिस्तान में एक प्रकार का संकट नजर आया, कि उसका रिश्ता अमरीका के साथ बिगड़ रहा है। अब पाकिस्तान के सामने यही रास्ता है कि वह बाकी दोस्तों के साथ अपने रिश्तों को मजबूत बनाए रखे। दरअसल, पाकिस्तान कहना चाहता है कि उसकी सिर्फ छवि ही खराब है, जबकि वह कोई खराब देश नहीं है। 
    यह तो ट्रंप की नीतियां गलत हैं, जिसके कारण पाकिस्तान की अब ज्यादा बदनामी हो रही है। भारत सरकार बरसों से यह कहता आ रहा है कि पाकिस्तान आतंकवाद को मदद देता है और उसकी जमीन को आतंकवादी इस्तेमाल करते है। जो इतने साल बाद ट्रम्प की दक्षिण एशिया नीति में उभरकर आया है। इसी कारण कहा जा सकता है कि ट्रंप की दक्षिण एशिया नीति के बाद भारत ने पाकिस्तान पर कोई टिप्पणी नहीं की। क्योंकि भारत भी जानता है कि पाकिस्तान अपने रिश्तों को दुरुस्त रखना चाहता है, लेकिन पाकिस्तान की आतंकवादियों की मदद करने की नीतियों के कारण उसे नुकसान उठाना पड़ता है।   
    पाकिस्तान की घरेलू राजनीति से आम पाकिस्तानी जनता की नजर हटाने के लिए हाल ही में ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कंट्रीज (ओआइसी) के द्वारा संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में कश्मीर का मुद्दा उठाया। भारत की संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधि ने इस कदम को दुखद बताया है और ओआइसी के दिए बयान को गलत और भ्रमित बताया है।
    दरअसल, जब उत्तरी कोरिया द्वारा परमाणु परीक्षण करने का जो मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में उठा, तो पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान अचानक यह बयान देते हैं कि उत्तरी कोरिया के परमाणु हथियार पाकिस्तान के हथियारों से काफी आधुनिक हैं। यह सर्वविदित है कि पाकिस्तान ने लीबिया और उत्तरी कोरिया की परमाणु कार्यक्रम में अवैध रूप से सहायता किया, जिसकी पुष्टि अब्दुल कादिर खान ने पहले किया था। अभी ऐसे बयान आने का कोई अर्थ नहीं है, जब उत्तरी कोरिया पर अमेरिका की निगाहें टेढ़ी बनी हुई हैं। अब्दुल कादिर खान का बयान इसलिए भी उचित समय पर आने वाला बयान नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि एक समय में अब्दुल कादिर ने यह खुद ही स्वीकार किया था कि परमाणु हथियारों की टेक्नोलॉजी को उन्होंने बेचा था। शायद इसीलिए भारत ने उत्तर कोरिया की हालिया गतिविधियों की निंदा करते हुए इशारों में ही पाकिस्तान का नाम लिए बगैर कहा है कि इस परमाणु प्रसार संबंधी गतिविधियों की जांच होनी चाहिए। 
    यहां भी ध्यान रहे, भारत ने अब भी पाकिस्तान का नाम नहीं लिया है। पाकिस्तान ने इस तकनीकी का हस्तांतरण 90 के दशक के दौरान किया था। और वर्तमान में उत्तर कोरिया की परमाणु तकनीक पाकिस्तान से जुड़ा हुआ नहीं है।
    पाकिस्तान एक ऐसा देश है जो कि खुद पर पडऩेवाले प्रभावों को ही देखता है, उत्तरी कोरिया से उसका वास्ता नहीं है। वह हर काम अपना फायदा देखते हुए करता है। दरअसल, पाकिस्तान कोई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी की भूमिका में नहीं होता है, बल्कि वह हमेशा क्षेत्रीय खिलाड़ी की भूमिका में होता है। 
    वह जानता है कि वह अगर कश्मीर मुद्दा उठाता है, तो पाकिस्तान के आम लोग उसकी सरकार की बहुत तारीफ करेंगे और इस तारीफ में बाकी सारे जरूरी मुद्दे कहीं खो जायेंगे। पाकिस्तान और उसकी सरकार ऐसे ही चलते रहते हैं, तो फिर उसे उत्तरी कोरिया की गतिविधियों के साथ जाने की जरूरत ही नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ट्रंप क्यों पाकिस्तान को एक टेरर स्टेट घोषित करने की बात कर रहे हैं? जबकि अगर अमरीका ऐसा करता है, तो उसे भी यह पता है कि उस क्षेत्र में अपनी गतिविधियों को अंजाम देने में मुश्किलें होंगी। 
    आपको याद होगा, हॉर्ट ऑफ एशिया में भी पाकिस्तान के खिलाफ ऐसी ही बातें आई थीं कि उसके यहां चल रही आतंकी गतिविधियों को रोकने की जरूरत है। और अब हालिया ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीन के रहते हुए भी पाकिस्तान के कुछ कट्टर समूहों को आतंकवादी संगठनों की सूची में डाल दिया गया था। 
    हालांकि, चीन अरसे से हर हाल में पाकिस्तान का साथ देता रहा है, लेकिन ब्रिक्स सम्मेलन में जो कुछ हुआ, उससे यह साफ जाहिर है कि एक जगह आकर चीन के हाथ भी बंध जाते हैं। वहीं दूसरी बात यह है कि पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली में कई नेताओं ने पहले साफ शब्दों में कहा था कि हम लोग कुछ देशों के लिए अपने जिन आतंकी संगठनों का समर्थन करते हैं, अब हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। पाकिस्तान की यही मुश्किल है।
    इन सब गतिविधियों के बावजूद भी यह कहा जा सकता है कि ट्रंप के लिए पाकिस्तान को टेरर स्टेट घोषित करना मुश्किल होगा, क्योंकि इस पूरे क्षेत्र में पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण देश है अमेरिका के लिए। अगर ट्रंप पाकिस्तान को टेरर स्टेट करार देते हैं, तो यह उनके लिए मुश्किल हो जाएगा कि वह अफगानिस्तान को संभाल सकें। 
    हां, अमरीका इतना जरूर इतना कर सकता है कि पाकिस्तान के कुछ आतंकी संगठनों पर सख्त कदम उठाना और सारे अंतरराष्ट्रीय मंचों द्वारा पाकिस्तान सरकार पर दबाव डाल कर उसकी आतंकवादी नीति को परिवर्तित कर सकता है। (प्रभातखबर)

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  • राजेश प्रियदर्शी
    बदतमीजी, बेहूदगी और बेहयाई पर किसी राजनीतिक समूह का एकाधिकार नहीं है लेकिन इस मामले में सत्ताधारी दल के समर्थकों और नेताओं की लानत-मलामत ज्यादा होती रही है। ऐसा होने की कुछ जायज वजहें भी रही हैं। संयम-शिष्टता का सत्ताधारी दल के नेताओं-समर्थकों का ट्रैक रिकॉर्ड उतना सदाचारी-संस्कारी नहीं रहा है जैसा देश बनाने का वे रोज नारा लगाते हैं। जब पता चला कि पीएम मोदी एक ऐसे व्यक्ति को फॉलो करते हैं जिसने बंगलौर में मारी गई पत्रकार गौरी लंकेश को कुतिया और संवेदना व्यक्त करने वालों को बिलबिलाते पिल्ले कहा है, तो उन्हें कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा।
    सोशल मीडिया में भाषा को लेकर जोरदार बहसें हुईं, पीएम और उनके समर्थकों को काफी प्रवचन सुनना पड़ा कि भाषा से संवेदनहीन सोच का पता चलता है, पीएम से मांग की गई कि वे देशभक्त व्यापारी निखिल दधीच को अनफॉलो करें, उन्होंने इस मांग को अनसुना कर दिया।
    खुद को निष्पक्ष, संतुलित और सभ्य की श्रेणी में रखने वाले लोगों ने भी हिंदुत्व के सैनिक के बहाने उसके सबसे बड़े फॉलोअर को घेरा, ऐसा करना उनका लोकतांत्रिक हक था और उन्हें ये अपना फर्ज भी लगा। पाँच सितंबर को गौरी लंकेश की हत्या होने के बाद कई दिनों तक वही लोग नाराजगी प्रकट कर रहे थे जिन्हें भरपूर अभद्रता के साथ शेखुलर, लिबटार्ड और प्रेस्टीट्यूट कहा जाता है। उन्हें अक्सर इन सवालों का सामना करना पड़ता है कि तब तुम कहां थे? और उस मामले पर क्यों नहीं बोले? ऐसा पूछने का एक मकसद है, पूछने वाले साबित करना चाहते हैं कि जो तबका खुद को पढ़ा-लिखा, संतुलित, उदार, लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और शिष्ट मानता है वो दोहरे मापदंड अपनाता है।
    कई बार इस दांव का इस्तेमाल मुद्दे से ध्यान हटाने या सवाल उठाने वालों को उलझाने के लिए भी किया जाता है, कश्मीरी पंडितों की पीड़ा और केरल में आरएसएस के कार्यकर्ताओं की हत्या की मिसालें भक्तों के सबसे ज्यादा काम आते हैं। वैसे भक्त संबोधन में प्रेस्टीट्यूट जैसा कुछ भी अपमानजनक नहीं है, जब बात निकली है तो बता दें कि प्रेस्टीट्यूट को पहली बार आधिकारिक मान्यता विदेश राय मंत्री वीके सिंह ने दी थी।
    अब लौटें मुख्य मुद्दे पर, जिन्हें भक्त कहा जाता है उनका ये कहना कई बार, कुछ हद तक सही लगता है कि उनसे जिस शिष्टता-शालीनता की उम्मीद की जाती है, वही पैमाना दूसरों के मामले में क्यों नहीं अपनाया जाता।
    मसलन, सात सितंबर को जब दधीच की भाषा पूरे देश में ट्रेंड कर रही थी तब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया, उन्होंने लिखा कि ये मेरा नहीं है, लेकिन इसे पोस्ट करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ। कांग्रेस नेता ने जो ट्वीट किया वो मोदी की एक तस्वीर थी जिस पर लिखा है- मेरी दो उपलब्धियाँ हैं- मैंने भक्तों को चू*या बनाया और चू* या को भक्त बनाया।
    साफ तौर पर इस पोस्ट की भाषा अभद्र थी, ये पहली बार नहीं था कि दिग्विजय सिंह को गैर-जिम्मेदार और फूहड़ ट्वीट के लिए आलोचना झेलनी पड़ी हो लेकिन उनकी वैसी आलोचना नहीं हुई जैसी निखिल दधीच की हो रही थी जबकि वे राह चलते कार्यकर्ता नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी के महासचिव हैं।
    2013 में अन्ना हजारे को भ्रष्ट बताने और इस पर लिखित माफी माँगने वाले मनीष तिवारी को पता नहीं क्या सूझी। उन्होंने भी चू को भ और भ को चू बनाने वाला फूहड़ फिकरा ट्वीट कर दिया। कई लोगों को महसूस हुआ कि इसकी भी उतनी और वैसी आलोचना नहीं हुई जैसी होनी चाहिए थी। कुछ महीने पहले गधे का जिक्र अखिलेश यादव ने यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान छेड़ा था, गधा एक बार फिर चर्चा में आया, वरिष्ठ पत्रकार मृणाल पांडे के ट्वीट की वजह से जिसमें उन्होंने एक गधे की तस्वीर के साथ लिखा- जुमला जयंती पर आनंदित, पुलकित, रोमांचित वैशाखनंदन।
    मृणाल पांडे अब तक अपनी परिष्कृत भाषा-शैली और संयत टिप्पणियों के लिए जानी जाती थीं, उनकी टिप्पणी में परिष्कृत इतना भर है कि उन्होंने गधे की जगह संस्कृत शब्द वैशाखनंदन का प्रयोग किया। मोदी के समर्थकों को गधा कहना वाकई अपमानजनक और आपत्तिजनक है। कोई और वक्त होता तो इसे व्यंग्य, वक्रोक्ति या कटाक्ष समझकर लोग मुस्कुरा देते, लेकिन इन दिनों सोशल मीडिया युद्धभूमि बना हुआ है जिसका एक बड़ा शिकार सेंस ऑफ ह्यूमर है। इन हालात में मोदी के समर्थकों को गधा कहना वाकई अपमानजनक लग सकता है।
    इस टिप्पणी के लिए उन्हें कई वरिष्ठ पत्रकारों और लिबरल कहे जाने वाले लोगों की आलोचना का सामना करना पड़ा है, बीसियों लोगों ने कहा है कि यह ओछी हरकत है जो उन्हें शोभा नहीं देती। लेकिन कई लोग जिन्होंने भक्तों के खिलाफ सोशल मीडिया पर युद्ध छेड़ा हुआ है। वे मृणाल पांडे और मनीष तिवारी का किसी तरह बचाव करने में जुटे हैं। कुछ लोग चू*या शब्द की मीमांसा करने लगे, उसे अपशब्द की जगह भदेस अभिव्यक्ति बताने लगे। ये भी बताने लगे कि उसका स्त्री शरीर के अंग-विशेष से कोई संबंध नहीं है, ये वैसा ही तर्क है जब दधीच ने कहा था कि उनका ट्वीट पड़ोस में रहने वाली कुतिया के बारे में था। इन लोगों की दलील ये है कि सरकार समर्थक ट्रोल आर्मी की बेहूदगियों के मुकाबले इन दोनों प्रतिष्ठित व्यक्तियों के ट्वीट बिल्कुल भी बुरे नहीं हैं।
    इस बचाव से जुड़ी दो बातें समझने वाली हैं- पहला तो ये कि जिनकी बुराई आप करते हैं उनसे मुकाबला करने और जीतने की कोशिश आपको उन्हीं के स्तर पर ले जाएगी। दूसरा, ये कि सोशल मीडिया पर शिष्टाचार और संयम की बात करने वाले लोग अपना मोरल हाइग्राउंड खो देंगे।
    और उससे भी जरूरी बात, अगर आप शिष्ट हैं तो और शिष्ट बनिए, अगर लिबरल हैं तो और उदारता दिखाइए, डेमोक्रेटिक हैं तो विरोधियों को और स्पेस दीजिए, अगर पढ़े-लिखे हैं तो तथ्यों-तर्कों की बात करिए। किसी को गधा और कुत्ता बनाकर आप बड़े नहीं, छोटे ही बनते हैं।  (बीबीसी)

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  • भूजल स्तर में लगातार हो रही गिरावट के बीच हाल में हुए एक शोध में इसके तेजी से प्रदूषित होने के बारे में भी पता लगा है। इंडिया साइंस वायर की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय और ब्रिटिश वैज्ञानिकों द्वारा किया गया यह शोध बताता है कि भूजल में नाइट्रेट, क्लोराइड, फ्लोराइड, आर्सेनिक, सीसा, सेलेनियम और यूरेनियम जैसे हानिकारक तत्वों की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है। यही नहीं, इसमें विद्युत चालकता और लवणता का स्तर भी अधिक पाया गया है। शोधकर्ताओं के अनुसार भूजल में सेलेनियम की मात्रा 10-40 माइक्रोग्राम प्रति लीटर और मॉलिब्डेनम की मात्रा 10-20 माइक्रोग्राम प्रति लीटर पाई गई है। इसके अलावा इसमें लगभग 0.9-70 माइक्रोग्राम प्रति लीटर यूरेनियम की सांद्रता होने का भी पता चला है।
    शोध कहां और कैसे किया गया?
    यह अध्ययन रुड़की स्थित राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों और ब्रिटिश भू-वैज्ञानिकों द्वारा किया गया। अध्ययनकर्ताओं की टीम में जी कृष्ण और एमएस राव के अलावा ब्रिटिश भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण संस्थान के डीजे लैपवर्थ और एएम मैकडोनाल्ड शामिल थे। अपने शोध के लिए उन्होंने पंजाब में सतलुज-व्यास नदी और शिवालिक पहाडिय़ों के बीच स्थित नौ हजार वर्ग किलोमीटर में फैले बिस्त-दोआब क्षेत्र को चुना था।
    शोधकर्ताओं के मुताबिक इस अध्ययन में जलभृत (एक्वाफर) के ऊपरी 160 मीटर हिस्से में मौजूद तत्वों का रासायनिक विश्लेषण किया गया है। अध्ययन क्षेत्र में कृषि, शहरी, ग्रामीण और मध्य मैदानों समेत कुल 19 अलग-अलग तरह के क्षेत्रों की भूमि शामिल थी। इन भागों में उथले (0-50 मीटर) और गहरे (60-160 मीटर) एचफरों से जल के नमूने एकत्र करके भूजल प्रदूषण का अध्ययन किया गया।
    जलभृत या एक्वाफर क्या है?
    पृथ्वी की सतह के भीतर स्थित उस संरचना को एक्वाफर कहते हैं जिसमें मुलायम चट्टानों और छोटे-छोटे पत्थरों के बीच में भारी मात्रा में जल भरा रहता है। एक्वाफर की सबसे ऊपरी परत को वाटर-लेबल कहते हैं। सामान्यत: स्वच्छ भूजल एक्वाफर में ही पाया जाता है।
    इंडिया साइंस वायर के मुताबिक शोधकर्ता भूजल में रासायनिक प्रदूषण बढऩे का सबसे प्रमुख कारण भूमिगत जल के अंधाधुंध दोहन, रासायनिक उर्वरकों के उपयोग और सतह पर औद्योगिक कचरा बहाए जाने को मानते हैं। वैज्ञानिकों ने इस बात के भी स्पष्ट प्रमाण दिए हैं कि मानव-जनित और भू-जनित हानिकारक तत्व तलछटीय एक्वाफर तंत्र से होकर गहरे एक्वाफरों में पहुंच रहे हैं।
    इन लोगों का कहना है कि लगातार दोहन से भूजल का स्तर गिरता है जिससे उथले या ऊपरी एक्वाफरों की खाली जगह में हवा भरने से उसमें ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है। इसे ऑक्सिक भूजल कहते हैं। ऑक्सिक भूजल के कारण नाइट्रेट या नाइट्राइट का गैसीय नाइट्रोजन में परिवर्तन सीमित हो जाता है। इससे उथले भूजल में सेलेनियम और यूरेनियम जैसे तत्वों की गतिशीलता बढ़ जाती है। वहीं, गहरे एक्वाफरों तथा शहरी क्षेत्र के उथले एक्वाफरों में मिलने वाली यूरेनियम की अधिक मात्रा का संबंध उच्च बाइकार्बोनेट युक्त जल से पाया गया है।
    अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि शोध से प्राप्त परिणाम उत्तर-पश्चिम भारत में भूजल के प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। लेकिन, भूजल में सेलेनियम, मॉलिब्डेनम और यूरेनियम जैसे खतरनाक तत्वों का अधिक मात्रा में मिलना काफी ज्यादा चिंताजनक है क्योंकि गहरे एक्वाफरों के प्रदूषित होने पर भूजल की गुणवत्ता सुधरने में बहुत समय लग जाता है। यानी यह और भी बड़ी चेतावनी है क्योंकि भूजल का स्तर तो गिर ही रहा है, बचा हुआ भूजल भी खतरनाक रूप से प्रदूषित हो रहा है। 
    (सत्याग्रह ब्यूरो)

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  • शिवप्रसाद जोशी
    भारत में राजनीतिक हिंसा से लेकर सांप्रदायिक, जातीय, यौन, और घरेलू हिंसा का दुष्चक्र फैलता जा रहा है. अपराधी खुलेआम हैं, पुलिस सुस्त. व्यापक होती हिंसा का पैटर्न चिंताजनक है जिसमें हमलावर भीड़ जहां तहां प्रकट हो रही है.
     दिल्ली के पास गुरुग्राम में एक स्कूली बच्चे की हत्या, दिल्ली में एक बच्ची से रेप, बिहार में युवती से बलात्कार के बाद तेजाब से नहला देने की घिनौनी वारदात, अपने बाबा की गिरफ्तारी के विरोध में भक्तों का सड़कों पर उत्पात, दिनदिहाड़े गोलीकांड, बुजुर्गों की पिटाई, डायन कहकर औरतों से मारपीट और उनकी हत्या, सार्वजनिक संपत्ति की तोड़फ़ोड़, सोशल कहे जाने वाले आभासी मीडिया पर हिंसा और हत्या की धमकियां और लव-जेहाद की बर्बरताएं- कोई भी संवेदनशील नागरिक अपने देश के इस हाल पर अफसोस, कोफ्त और डर से भर उठेगा.
    उत्तराखंड जैसे अपेक्षाकृत शांत राज्य के एक अत्यंत शांत और रमणीक सांस्कृतिक स्थल सतपुली में सिर्फ इस अफवाह से अल्पसंख्यकों की दुकानों में तोड़फोड़ कर दी गयी कि वॉट्सएप या फेसबुक पर कोई आपत्तिजनक पोस्ट शेयर हो गयी थी. उत्तराखंड के पड़ोसी राज्य हिमाचल में पिछले दिनों स्कूल से लौटती किशोरी के साथ एक भीषण बलात्कार कांड हुआ. आरोपी गिरफ्तार हुए और एक आरोपी की जेल के भीतर हत्या कर दी गयी. पड़ोसी राज्य हरियाणा का डेरा कांड लोगों को अब भी दहला रहा है. हरियाणा के ही आधुनिक शहर गुरुग्राम में एक पॉश स्कूल के एक नन्हें छात्र की जान ले ली गयी. इसी के पड़ोस दिल्ली, यानी देश की राजधानी में निर्भया कांड तो जैसे एक भुलायी जा चुकी वारदात हो चुकी है, क्योंकि उसके बाद हादसों, अपराधों और हिंसक वारदातों की नयी तफ्सील आ रही हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2012 के निर्भया कांड के बाद से दिल्ली में रेप की घटनाओं में 350 प्रतिशत उछाल आया है, जो एक भयावह स्थिति है.
    दिल्ली से कहीं का भी रुख करें- पूर्वोत्तर का, पूर्व का, पश्चिमी या दक्षिणी राज्यों का- लगता है जैसे गोली की रफ्तार और इस हिंसा की आमद से भी तेज एक अंधेरा है जो देश में किसी महामारी की तरह फैल रहा है. केरल में राजनीतिक हत्याएं रोजमर्रा की बात हो गयी हैं. तमिलनाडु में दलितों के खिलाफ हिंसा एक मुहावरा ही बन चुकी है. देश का कोई कोना ऐसा नही, जिस पर हिंसा के छींटे न पड़े न हों.
    अमेरिकी विदेश मंत्रालय के ब्यूरो ऑफ डिप्लोमेटिक सिक्योरिटी की वेबसाइट पर भारत आने वाले अमेरिकी यात्रियों को कई हिदायतें दी गयी हैं. मसलन आप सड़क पार करते हुए सावधानी बरतें, किसी राहगीर या गाय से वाहन न टकरा जाए अन्यथा गुस्साई भीड़ के जमा होते देर नहीं लगेगी जो आपको या वाहन को भारी नुकसान पहुंचा सकती है. इसी तरह महिलाओं को अंधेरा होने पर अकेले न निकलने और ‘ड्रेस कंज़रवेटली' की हिदायत है. हैरानी है कि कथित देशभक्तों की नजर भारत के बारे में दर्ज ऐसी बहुत सी खराबियों पर कैसे नहीं पड़ी? क्या अमेरिकी आलोचना बर्दाश्त है और अगर अपना कोई कहे तो उसे कह देंगे पाकिस्तान चले जाओ?
    अमेरिकी नजरिए को परे रख कर अपने भीतर झांक कर देखें. क्या हम सही हैं? आज हमने समाज की क्या तस्वीर बना डाली हैं? आंकड़े भी तर्कों या साक्ष्यों की हिफाजत ज्यादा दूर तक नहीं कर पाते. मिसाल के लिए हम कहें कि भारत में प्रति एक लाख लोगों पर 141 पुलिसकर्मी हैं, जबकि वैश्विक औसत प्रति लाख पर 350 पुलिसकर्मियों का है. अब अगर अपराधी, चोर- उचक्के, बदमाश निर्भय हैं, संगठित गिरोह सक्रिय हैं, एक पूरा नेक्सस फैला हुआ है जो स्वीकार्य पेशे की आड़ में किसी गोरखधंधे में लिप्त है- तो जाहिर है यह पुलिस मशीनरी के विराट आलस्य की निशानी है. लेकिन ये भी देखिए कि पुलिस किन हालात में है- संख्या बल और संसाधन, कार्यस्थितियां, वेतन और प्रमोशन की विसंगतियां, दक्षता और कौशल की ट्रेनिंग का हाल, नए खतरों के प्रति नवोन्मेषी तैयारी के इंतजाम और सबसे बढ़कर जॉब सैटिस्फैक्शन. क्या शासन ये दे पा रहा है?
    आप यह कहकर भी खारिज नहीं कर सकते कि दंगे, हिंसा और अपराध तो पहले भी होते रहे हैं, अभी क्या ऐसी खास चिंता है- तो खास यही है कि हिंसा अब अधिक संगठित, अपराध अब अधिक सुनियोजित और भीड़ अब अधिक प्रकट हो चुकी है. और अगर आप आंकड़ों को ही सबसे पुख्ता साक्ष्य मानते हैं तो यह बता दें कि छिटपुट अपराधों से लेकर यौन हिंसा, सांप्रदायिक हिंसा, भीड़ जनित हिंसा के मामलो में पिछले पांच साल के दौरान लगातार बढ़ोत्तरी ही हुई है. इसे यह कहकर भी हल्का नहीं कर सकते कि अब ज्यादा मामला रिपोर्ट हो रहे हैं लिहाजा आंकड़ों में वो रिफलेक्ट हो रहा है. हिंसा का एक नया द्रुत पैटर्न इधर विकसित हुआ है जो चौतरफा हमलावर है और बर्बर भी. बुद्ध और गांधी का देश या देवभूमि कहकर हम अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकते. आलोचनाओं पर तुनकने के बजाय सोचिए कि कहां गलती है और कैसे ठीक की जा सकती है. 
    भारत का दुर्भाग्य और इस देश की सत्ता राजनीति की ये कमी रही है कि 90 के दशक में शुरू हुए आर्थिक उदारवाद और भूमंडलीकरण की नई बेला में उनका अभिभूतीकरण हुआ. जीडीपी को चमकाने की हड़बड़ी में उदारवाद की बेशुमारियां, अंततः अपने ही लोगों पर अलग अलग ढंग से टूटीं. बेरोजगारी, गरीबी, बेदखली, पलायन, अपराध, अशांति और हिंसा के रूप में. विकास का यह समावेशी मॉडल नहीं था. एक मॉलवादी उपभोग संस्कृति- शहर के भीतर शहर खड़े कर चुकी है, वो निर्बाध फैलती जा रही हैं- अपराध भी इसी गति से फैल रहा है- कुलीन और अभिजात पर्यावरण से लेकर एक अंधेरे टूटेफूटे कोनों तक वो घात लगाकर बैठा रहता है. कारों में अगर अय्याश हिंसक शोहदे हैं तो सड़कों पर उपद्रवी और गलियों नुक्कड़ों पर कुंठित संभावित अपराधी.
    इसी विकास जनित हिंसा के समांतर आज की हिंसा का नया और घिनौना रूप, कथित राष्ट्रवादी हिंसा का है. इसकी छत्रछाया में अन्य हिंसाएं फलफूल रही हैं. पुलिस का ध्यान इन हिंसाओं से निपटने में है और उधर इसका फायदा उठाकर विकृत मनोव्यवहार वाले संभावित अपराधी, संभावित अपराधों के लिए निकल पड़ते हैं. उनकी शिनाख़्त कठिन है. वे हमारे ही बीच के लोग हैं.
    अगर राजनीतिक हिंसा के लिए सत्ता-राजनीति और उसकी बहुसंख्यकवादी विचारधारा जिम्मेदार है, तो समाज में दबी-छिपी इस हिंसा के लिए समाज और उसकी नैतिकता जवाबदेह है. इस हिंसा को चाहे-अनचाहे प्रश्रय भी मिलता रहा है, कभी संकोच और शर्म में घिरे परिवार का तो कभी समाज और राजनीति के दबंगों का. ये खाप मानसिकता है. कोई शासन, पुलिस या अदालत इसे ठीक नहीं कर सकती. घरों और परिवारों से ये सबक निकलने चाहिए. शिक्षा को पवित्रतावादी आडंबर की जरूरत नहीं है उसे एक पारदर्शी विवेक की जरूरत है, जो वर्चस्व, उन्माद, उत्तेजना और नफरत का निषेध है और लिंग, जाति, समुदाय, धर्म का फर्क मिटाता है.
    शिष्टता, सहिष्णुता और शालीनता के लिए बहुत छोटी छोटी चीजों से शुरुआत करनी होगी. सड़क पर कूड़ा फेंक रहे हैं तो आप एक खराब नागरिक बन रहे हैं. आप अभद्र हैं तो अपने भीतर कुंठित और संभावित हिंसक हैं. अगर आप अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करते या सही ठहराते हैं तो आप नैतिक रूप से अस्वस्थ हैं. अगर आप गलत चीज पर तटस्थ हैं या अन्याय की तरफदारी करते हैं तो आप उसमें भागीदार हैं. एक नागरिक, भाड़े का कोई गुंडा नहीं जिसे हिंसा फैलाने के लिए रवाना किया गया है. भाड़े की नागरिकता नहीं चल सकती. इस खतरे को जितना जल्दी पहचान लें, उतना ठीक. ये भी ध्यान रहे कि एक भयभीत समाज अंततः एक हिंसक और अपराधी समाज का ही पोषण करता है. (डायचे वेले)

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  • आजकल

    -  सुनील कुमार
    बहुत से अखबारनवीसों से लेकर अखबारों में हर हफ्ते कॉलम लिखने वालों तक और सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति या विचार के लिए अभियान चलाने वालों तक, कलम के सिपाहियों से लेकर कलम के भाड़े के हत्यारों तक, इनका हौसला थकता ही नहीं है। वे पूरे वक्त अपने मकसद के लिए, या कि अपने रोजगार के लिए जुटे रहते हैं, और ऐसा करते हुए वे सच और झूठ का फर्क करने में अपना वक्त बर्बाद नहीं करते। जब हिटलर के सूचना मंत्री से लेकर अब तक यह माना जाता है कि एक झूठ को अगर काफी बार दुहरा दिया जाए, तो वह सच में तब्दील होने लगता है, या कम से कम सच का एहसास तो कराने लगता है। नतीजा यह है कि लोग सोचे-समझे, मकसदभरे झूठ को बार-बार दुहरा कर उससे सच बनाने में लगे रहते हैं। लोग झूठ को पकड़ भी लेते हैं, तो भी उन्हें शर्म नहीं लगती, क्योंकि वे शर्मिंदगी के हकदार अकेले नहीं रहते, और उनकी तरह और बहुत से लोग इसी काम में लगे रहते हैं। 
    लेकिन सच के बारे में यह कहा जाता है कि उसे अपने अस्तित्व को साबित करने में देर लगती है, खासी देर लगती है, बड़ी मेहनत भी लगती है, लेकिन फिर भी वह साबित तो हो ही जाता है, और आखिर में वह खड़ा रहता है। सवाल यह है कि यह खासी देर कितनी लंबी होती है, और इस बीच में झूठ की फसल जंगल की घास की तरह कितनी फैल चुकी रहती है, और आम लोग उस घास में कितने उलझते चलते हैं, उसके आरपार सच को देखने में उन्हें कितना वक्त लग जाता है, ये तमाम बातें परेशान करती हैं। 
    फिर दूसरी बात यह भी कि झूठ का कारोबार करने वालों के पास झूठों की फौज की एक वर्दी भी होती है, और टोली की ताकत भी। ऐसी गिरोहबंदी के मुकाबले सच बोलने वाले अक्सर किसी हमलावर मकसद के बिना होते हैं, उन्हें किसी वर्दी की ताकत भी नहीं होती, और न ही किसी गिरोह से उन्हें हिफाजत मिली होती है। नतीजा यह होता है कि सच का झंडा लेकर चलने वाले अक्सर अकेले दिखते हैं, और बहुतों को यह भी लगता है कि उनमें कोई दिमागी नुक्स है कि वे चैन से बैठने के बजाय यूं बेचैन फिरते हैं। आमतौर पर सच के लिए लडऩे वाले ऐसे लोग दुनिया में अकेले पडऩे लगते हैं, और बहुत से मामलों में सच की तकलीफ का बोझ उठाते परिवार के भीतर भी वे अकेले होने लगते हैं। 
    जिस तरह विज्ञान कथाओं की कुछ फिल्मों में मशीनी मानव दिखाए जाते हैं कि किस तरह वे गिनती में बढ़ते चलते हैं, और फौज सरीखे होकर इंसानों पर टूट पड़ते हैं, कुछ उसी तरह झूठ के भाड़े के हत्यारे फायदा पाते हुए इन दिनों सोशल मीडिया पर हमलावर बने हुए हैं, और पैसों की ताकत से उनकी गिनती बढ़ती चल रही है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने मिलकर विचारों के मुकाबले को ऐसा बना रखा है कि स्टेडियम में बैठे, मुकाबला देखते लोगों की गिनती फरेब की तरह बढ़ाकर दिखाई जा सकती है, और जनमत के आकार को अंधाधुंध बड़ा या छोटा साबित किया जा सकता है। यह कुछ उसी तरह का है जिस तरह कि कसरत की कुछ मशीनों, या शरीर को किसी आकार में ढाल देने का दावा करने वाले खाने-पीने के सामानों के इश्तहार होते हैं, जो कि हकीकत से परे हसरत की तस्वीरें दिखाते हैं, और ग्राहक जुटाते हैं। 
    सच और झूठ पर भरोसा रखने वाले लोगों की अलग-अलग गिनती भी मुमकिन नहीं होती, क्योंकि झूठ का झंडा लेकर चलने वाले बहुत से लोगों को भी इस बात का एहसास होता है कि असल में सच क्या है। वे झंडे के झूठ पर सचमुच ही खुद भरोसा नहीं करते, लेकिन एक पेशे की तरह, या कि एक नफरतजीवी मकसद के चलते वे उस झूठ को सच करार देते हुए एक अभियान चलाते हैं। ऐसे लोगों को झूठ पर भरोसा रखने वाला नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे झंडा तो झूठ का लिए चलते हैं, लेकिन अपने मन के भीतर उन्हें हकीकत का सच भी मालूम होता है। इसलिए सोशल मीडिया पर जो दिखता है, या कि आज के मीडिया के टीवी स्क्रीन पर, अखबारी पन्नों पर जो दिखता है, जरूरी नहीं है कि लिखने और लिखाने वाले लोगों का खुद का उस पर भरोसा हो। यह बात सही है कि मीडिया के एक बड़े तबके के लिए प्रॉस्टीट्यूट जैसी गाली जोड़कर, प्रेस को प्रेस्टीट्यूट करार देने का काम मोदी सरकार के एक बड़बोले फौजी बददिमागी मंत्री जनरल वी.के. सिंह ने किया था, लेकिन आज मीडिया और सोशल मीडिया की जो हालत है, उसमें यह शब्द बहुत नाजायज नहीं है, यह एक अलग बात हो सकती है कि कौन सा तबका इस शब्द का ज्यादा बड़ा हकदार है। यह तमगा उन लोगों पर बेहतर सजता है जो रोज झूठ का गुब्बारा फुलाने के कारोबार में लगे हुए हैं। 
    अभी मुझे इस बात का ठीक-ठीक अंदाज नहीं है कि मीडिया और सोशल मीडिया पर सच और झूठ को देख और सुनकर पाठकों और दर्शकों का कितना हिस्सा झूठ-सच का फर्क कर पाता है, और कितना झांसे में आ जाता है। यह अंदाज इसलिए आसान नहीं है कि विचारधारा को समर्पित, नफरतजीवी, किसी नामौजूद दुश्मन के खिलाफ लडऩे को आमादा लोग जब किसी झूठ को सच मानते हुए दिखते हैं, तो यह समझ नहीं पड़ता कि वे झूठ को सचमुच सच मान रहे हैं, या कि वे उसे सच मानते हुए दिखना भर चाहते हैं। यह पूरा सिलसिला कुछ जटिल है, और कुछ उलझा हुआ है, बदनीयत से लदा हुआ है, और अनुपातहीन अधिक ताकत से लैस भी है। इसलिए किसी संक्रामक रोग की तरह, किसी कम्प्यूटर वायरस की तरह, गणेश के दूध पीने की अफवाह की तरह, झूठ पर जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे, सच की तरह, सच मानकर भरोसा करने वाले लोगों के बीच फर्क कर पाना नामुमकिन सा है। 
    लेकिन इंसानी सोच में जो एक आम बात है, उसके मुताबिक नफरत लोगों को बड़ी रफ्तार से जोड़ लेती है। मोहब्बत जब तक प्रेम का ढाई आखर लिख पाती है, तब तक नफरत झूठ के पर्चे छापकर शहर के हर चौराहे पर बांट चुकी होती है। सच को सोशल मीडिया की जंग के लिए मानो 80 रूपए लीटर का पेट्रोल मिलता है, और झूठ को अपनी लड़ाई के लिए 31 रूपए लीटर मिल जाता है जो कि दुनिया के बाजार में उसकी कीमत है। यह गैरबराबरी की लड़ाई कई बार सच का हौसला पस्त करती है, और वैसे में सच को लेकर कही गई सूक्तियां काम आती हैं जो हौसले को चार कदम और चलने को कहती हैं। लेकिन सच यह है कि ऐसे चार कदम उस डॉक्टरी दिलासे की तरह रहते हैं जो कि चार हफ्ते बाद कटने वाले प्लास्टर को लेकर मरीज को बस कुछ दिन और का भरोसा दिलाते चलते हैं। गैरबराबरी की यह लड़ाई अंतहीन भी दिखती है, लेकिन दुनिया का इतिहास गवाह है कि कोई लड़ाई कभी अंतहीन नहीं होती।

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  • दुनिया के भ्रष्टाचार मुक्त देशों में शीर्ष पर गिने जाने वाले न्यूजीलैंड के एक लेखक ब्रायन ने भारत में व्यापक रूप से फैले भ्रष्टाचार पर एक लेख लिखा है। ये लेख सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है। लेख की लोकप्रियता और प्रभाव को देखते हुए विनोद कुमारजी ने इसे हिन्दी भाषी पाठकों के लिए सम्पादित और अनुवादित किया है। 

    भारत में भ्रष्टाचार का एक कल्चरल पहलू है। भारतीय भ्रष्टाचार में बिलकुल असहज नहीं होते, भ्रष्टाचार यहां बेहद व्यापक है। भारतीय भ्रष्ट व्यक्ति का विरोध करने के बजाए उसे सहन करते है। कोई भी नस्ल इतनी जन्मजात भ्रष्ट नहीं होती, ये जानने के लिए कि भारतीय इतने भ्रष्ट क्यों होते हैं उनके जीवन पद्धति और परंपराए देखिए।
    भारत में धर्म लेन-देन वाले व्यवसाय जैसा है। भारतीय लोग भगवान को भी पैसा देते हैं इस उम्मीद में कि वो बदले में दूसरे के तुलना में इन्हें वरीयता देकर फल देंगे। ये तर्क इस बात को दिमाग में बिठाते हैं कि अयोग्य लोग को इच्छित चीज पाने के लिए कुछ देना पड़ता है। मंदिर चहारदीवारी के बाहर हम इसी लेनदेन को भ्रष्टाचार कहते हैं। धनी भारतीय कैश के बजाए स्वर्ण और अन्य आभूषण आदि देता है। वो अपने गिफ्ट गरीब को नहीं देता, भगवान को देता है। वो सोचता है कि किसी जरूरतमंद को देने से धन बर्बाद होता है।
    जून 2009 में द हिंदू ने कर्नाटक मंत्री जी जनार्दन रेड्डी द्वारा स्वर्ण और हीरो के 45 करोड़ मूल्य के आभूषण तिरुपति को चढ़ाने की खबर छापी थी। भारत के मंदिर इतना ज्यादा धन प्राप्त कर लेते हैं कि वो ये भी नहीं जानते कि इसका करे क्या। अरबों की सम्पत्ति मंदिरों में व्यर्थ पड़ी है।
    जब यूरोपियन इंडिया आए तो उन्होंने यहां स्कूल बनवाए। जब भारतीय यूरोप और अमरीका जाते हैं तो वो वहां मंदिर बनाते हैं। भारतीयों को लगता है कि अगर भगवान कुछ देने के लिए धन चाहते हैं तो फिर वही काम करने में कुछ-कुछ गलत नहीं है। इसीलिए भारतीय इतनी आसानी से भ्रष्ट बन जाते हैं। भारतीय कल्चर इसीलिए इस तरह के व्यवहार को आसानी से आत्मसात कर लेती है, क्योंकि-
    1. नैतिक तौर पर इसमें कोई नैतिक दाग नहीं आता। कोई भी अति भ्रष्ट नेता  सत्ता में आ जाता है, जो आप पश्चिमी देशों में सोच भी नहीं सकते।
    2. भारतीयों की भ्रष्टाचार के प्रति संशयात्मक स्थिति इतिहास में स्पष्ट है। भारतीय इतिहास बताता है कि कई शहर और राजधानियों को रक्षकों को गेट खोलने के लिए और कमांडरों को सरेंडर करने के लिए घूस देकर जीता गया। ये सिर्फ भारत में है। 
    भारतीयों के भ्रष्ट चरित्र का परिणाम है कि भारतीय उपमहाद्वीप में बेहद सीमित युद्ध हुए। ये चकित करने वाला है कि भारतीयों ने प्राचीन यूनान और माडर्न यूरोप की तुलना में कितने कम युद्ध लड़े। नादिरशाह का तुर्कों से युद्ध तो बेहद तीव्र और अंतिम सांस तक लड़ा गया था। भारत में तो युद्ध की जरूरत ही नहीं थी, घूस देना ही ही सेना को रास्ते से हटाने के लिए काफी था। कोई भी आक्रमणकारी जो पैसे खर्च करना चाहे भारतीय राजा को, चाहे उसके सेना में लाखो सैनिक हो, हटा सकता था।
    प्लासी के युद्ध में भी भारतीय सैनिकों ने मुश्किल से कोई मुकाबला किया। क्लाइव ने मीर जाफर को पैसे दिए और पूरी बंगाल सेना 3000 में सिमट गई। भारतीय किलो को जीतने में हमेशा पैसो के लेन-देन का प्रयोग हुआ। गोलकुंडा का किला 1687 में पीछे का गुप्त द्वार खुलवाकर जीता गया। मुगलों ने मराठों और राजपूतों को मूलत: रिश्वत से जीता श्रीनगर के राजा ने दारा के पुत्र सुलेमान को औरंगजेब को पैसे के बदले सौंप दिया। ऐसे कई केसेज हैं जहां भारतीयों ने सिर्फ  रिश्वत के लिए बड़े पैमाने पर गद्दारी की।
    सवाल है कि भारतीयों में सौदेबाजी का ऐसा कल्चर क्यों है जबकि जहाँ तमाम सभ्य देशों में ये सौदेबाजी का कल्चर नहीं है।
    3. भारतीय इस सिद्धांत में विश्वास नहीं करते कि यदि वो सब नैतिक रूप से व्यवहार करेंगे तो सभी तरक्की करेंगे क्योंकि उनका विश्वास/धर्म ये शिक्षा नहीं देता। उनका कास्ट सिस्टम उन्हें बांटता है। वो ये हरगिज नहीं मानते कि हर इंसान समान है। इसकी वजह से वो आपस में बंटे और दूसरे धर्मों में भी गए। कई हिंदुओं ने अपना अलग धर्म चलाया जैसे सिख, जैन बुद्ध, और कई लोग इसाई और इस्लाम अपनाए। परिणामत: भारतीय एक-दूसरे पर विश्वास नहीं करते।  
    भारत में कोई भारतीय नहीं है, वो हिंदू, ईसाई, मुस्लिम आदि हैं। भारतीय भूल चुके हैं कि 1400 साल पहले वो एक ही धर्म के थे। इस बंटवारे ने एक बीमार कल्चर को जन्म दिया। ये असमानता एक भ्रष्ट समाज में परिणित हुई, जिसमें हर भारतीय दूसरे भारतीय के विरुद्ध है, सिवाय भगवान के जो उनके विश्वास में खुद रिश्वतखोर है।

    (http://www.madhyamarg.com/mudde/article-of-brian-on-corruption/)

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  • काओरी कुरिहारा
    मेरे प्रधानमंत्री शिंजो अबे जब अहमदाबाद में बुलेट ट्रेन परियोजना का शिलान्यास करने और जापानी तकनीक देने के लिए आए थे तो मेरी इच्छा थी कि वह मेरे देश के नागरिकों के लाभ के लिए बदले में गांधीवादी मूल्य और दर्शन यहां से वापस ले जाएं।
    मेरा नाम काओरी कुरिहारा है। मैं एक जापानी नागरिक हूं जिसने साढ़े सात साल भारत में बिताए और यहीं से पढ़ाई की और जो गांधीवादी दर्शन के साथ जुडऩे का प्रयास कर रही है। उनके दर्शन को जापान में अलग-अलग जगहों पर फैलाने के दौरान मैंने कई लोगों से मुलाकात की।
    विकास दोनों राष्ट्र की बातचीत का केंद्र बिंदु है। गांधीवादी दर्शन के अनुसार, विकास केवल आर्थिक शर्तों में पूरी तरह परिभाषित नहीं होता है। दूसरे शब्दों मे कहा जाए तो इसका मकसद केवल अधिक पैसा, शक्ति या शोहरत कमाना नहीं होना चाहिए। हम विकास की गति किस तरह चुनते हैं यह पूरी तरह हम पर निर्भर है। इस संबंध में गांधी ने न केवल विकास को परिभाषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई बल्कि यह काओरी कुरिहारा कैसे प्राप्त किया जा सकता है इसकी रूपरेखा भी तैयार की।
    गुजरात विद्यापीठ से 2009 में जब गांधीवादी अध्ययन में मैंने एमए करने का फैसला किया तब मुझ में बेहद जिज्ञासा और उत्साह था। जब ऐसा फैसला मैंने लिया तब मुझसे पूछा गया कि कैसे किसी जापानी के लिए गांधीवादी दर्शन की प्रासंगिकता है। साथ ही गुजराती जैसी नई भाषा सीखने की जगह मुझे अंग्रेजी सुधारने की सलाह दी गई। विचित्र लेबल लगाने के अलावा लोगों की प्रतिक्रिया बहुत अलग थी। हालांकि, मैं यह समझ गई थी कि इस तरह की प्रतिक्रिया केवल इसलिए आ रही हैं कि जिस निर्णय को मैंने लिया है उसके पीछे की मंशा को वे समझने में असमर्थ हैं। एक बाहरी शख्स को इस तरह का मौका मिलना और एमए की डिग्री हासिल करना एक खास अधिकार से कम नहीं था। यहां तक कि गुजरात विद्यापीठ को मुझे यह मौका देने के लिए मैं उनकी बेहद आभारी हूं। बुलेट ट्रेन के साथ जापान धक्का लगाने वाले पुशर भी देगा!
    मैं गुजराती में गांधीवादी विचारधारा को पढ़ सकती हूं और उससे जुड़ी हुई हूं। मुझे इस बात पर विश्वास हो चुका है कि उन्होंने जो कुछ कहा है उसे गुजराती में पढऩा जरूरी है। हालांकि, कई गांधीवादी उपदेश हैं जो अंग्रेजी में मौजूद हैं लेकिन मेरे लिए उनके कई शब्द, व्यवहार और यहां तक कि चुटकुले और टिप्पणियां जो गुजराती में मौजूद हैं, वह बेमिसाल हैं।
    जनवरी 2017 में मैंने अपनी एमए की थीसिस जमा की जिसके बाद मैं वापस जापान चली गई। महात्मा गांधी की अहिंसा की विचारधारा को समझने और जापान में उसे फैलाने का प्रयास किया। अपने देश में रहने के दौरान मैंने कई लोगों से बातचीत की जिन्होंने गांधी में अपनी रुचि दिखाई। उदाहरण के लिए मैं बताऊं तो पश्चिमी जापान के एक हाई स्कूल के वाइस चांसलर से मुझे मिलने का मौका मिला जो गांधी के साथियों, भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और साथ ही अहिंसा के महत्व पर बात कर रहे थे। टोक्यो से 800 किलोमीटर दूर रहने के बावजूद हम हर 2 महीने में गांधी को समझने के लिए मिलने का प्रयास करते हैं।
    गुजरात में रहने के दौरान मुझे उन लोगों से मिलने का मौका मिला जो गांधी के जीवित रहने के दौरान उनसे परिचित थे। इस संबंध में गुजरात विद्यापीठ के चांसलर नारायण देसाई का खयाल मेरे दिमाग में आया जिनसे मुझे सीखने का खास मौका मिला।
    जापान के लोगों में गांधीवादी विचार और दर्शन फैलाने में अहम रोल निभाने के दौरान मैं अपनी डायरी पर निर्भर रही हूं जिसमें मैंने गांधी के उद्धरणों उनकी तस्वीरों को रखा हुआ था। पश्चिमी जापान हाई स्कूल के वाइस चांसलर से लेकर एक्यूपंक्चर की प्रैक्टिस कर रहे डॉक्टर तक मैंने गांधी के बारे में विस्तृत बातचीत की है। हालांकि, वे अभी तक विचारों की जटिलता को समझ नहीं पाए हैं लेकिन मैं अपनी कोशिशों को लगातार जारी रखूंगी।
    गांधीवादी विचारों का विरोध करने वाले लोगों के साथ भी मैं समय बिताती हूं और जब हमारे बीच किसी बात को लेकर बहस होती है तो मुझे महात्मा गांधी और जेबी कृपलानी के बीच हुई बहस याद आती है।
    मुझे इस बात की खुशी है कि गांधीवादी विचार और दर्शन अपने देश में विस्तार की शुरुआत करने में मेरी भूमिका है। आखिर में मैं यह दुआ करूंगी कि विकास को पाने का मार्ग जो केवल जापान ने नहीं दिखाया है, उसके अलावा दुनिया के सभी लोग गांधी के जीवन और उनके दर्शन से प्रेरणा लें। (बीबीसी)

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  • डॉ. लखन चौधरी
    21 वीं सदी में आज भी देश में जाति, धर्म, समाज एवं व्यक्ति के नाम पर जमकर राजनीति हो रही है, और खुलेआम हो रही है, लेकिन मजाल है कि कोई इस पर लगाम लगाने के लिए मुंह खोले, बोले, सोचे, परिचर्चा, संगोष्ठी करे। किसी से चर्चा करने पर कहते हैं कि देश में यह सदियों से होता आया है, और आगे भी होता रहेगा, किसी में हिम्मत नहीं कि इसे रोक सके इसलिए इस पर विचार-विमर्श करना बेमतलब है। क्या आपको भी लगता है कि देश में जाति, धर्म, समाज एवं व्यक्ति के नाम पर राजनीति हो रही है, अथवा होती है? 
    क्या यह आज के संदर्भ में सही है? 21 वीं सदी में जब लोगों की शिक्षा, सोच, विचार, मानसिकता आदि में आमूलचूल बदलाव एवं परिवर्तन आ चुका है तब ऐसी स्थिति परिस्थिति में भी देश में जाति, धर्म, समाज एवं व्यक्ति के नाम पर राजनीति हो, हो रही हो, कितनी सही है?
     सोच का विषय केवल इतना ही नहीं है कि देश में जाति, धर्म, समाज, व्यक्ति, सम्प्रदाय जैसे 'वादÓ खत्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं, बल्कि अब तो लिंगवाद जैसी विचारधारा समाज में तेजी से पनप रही है, और आने वाले समय में जमकर पनपने वाली है। सदियों से हो रहे असमानता, अत्याचार, शोषण आदि के नाम पर देश में जाति, धर्म, समाज, व्यक्ति, सम्प्रदाय एवं लैंगिक असमानता जैसी विचारधाराएं बंद नहीं हो रही है, और लगातार बढ़ती जा रही है।
    देश एवं राज्य की सक्रिय एवं निष्क्रिय, सत्तारूढ़ एवं विपक्ष दोनों तरह की राजनीति में चुनावों की घोषणा होते ही फिर एक बार गर्माहट आ गई है।  जाति, धर्म, समाज एवं व्यक्तियों के नाम पर राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों में खलबली मची है कि आखिरकार आने वाले चुनावों में उनकी जाति, धर्म, समाज एवं व्यक्ति आधारित राजनीति का खेल कितना सफल होगा/होता है? कहा जाता है कि आजकल जनता सब जानती है, लेकिन सवाल यह है कि जनता कब जानती है? तब, जब खेल हो जाता है। कैसे एवं कितना जानती है?  वैसे एवं उतना, जैसे एवं जितना उसे विज्ञापनों एवं मीडिया तथा बड़े नेताओं के लोकलुभावन भाषणों, घोषणाओं तथा दलीय घोषणापत्र के माध्यम से बताया जाता है। 
    आखिर में विकास एवं अन्य कई तरह के प्रलोभनों में आकर जनता वही करती है, जो राजनीतिक दल चाहते  हैं। हर बार की तरह जनता फिर ठगी  जाएगी, क्योंकि जनता के पास जानकारी है, लेकिन सच्चाई की तह तक पहुचंने का माद्दा नहीं है। 
    आमजनता के पास बुद्धि है, लेकिन विवेक नहीं है। जनता जागरूक है, लेकिन प्रलोभनों से मुक्त नहीं है। यही कारण है कि जनता बार बार, हर बार झांसे में आती है या आ जाती है। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि आजादी के 70 साल होने जा रहे हैं, और  जाति, धर्म, समाज एवं व्यक्तियों के नाम पर राजनीति धड़ल्ले से जारी है। देश की प्राकृतिक, मानवीय एवं मानव निर्मित संसाधनों की लूट मची है। भाईभतीजावाद एवं भष्ट्राचार कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है। नौकरशाही, अफसरशाही एवं लालफीताशाही लोगों को परेशान किये हुए है। 
    समाज में तरह-तरह के भेदभाव जारी हैं। पिछली सदी में कहा जाता था कि आने वाली इक्कीसवीं सदी में यह सब नहीं चलेगा, लेकिन इसके भी दो दशक पूरे होने में अधिक वक्त नहीं बचा है। फिर क्या कारण है कि स्थितियां, परिस्थितियां अब भी लगभग वैसी ही जस की तस हैं। कई जानकारों का तो कहना है कि जाति, धर्म, समाज एवं व्यक्ति आधारित राजनीति लगातार बढ़ती ही जा रही है। सवाल उठता है कि जाति, धर्म, समाज एवं व्यक्ति आधारित राजनीति आखिर कब तक चलेगी? अब समय आ गया है कि जनता इस पर चिंतन करे।  आज जाति, धर्म, समाज, सम्प्रदाय, लिंग एवं व्यक्ति आधारित राजनीति का सबसे अधिक खामियाजा समाज के मध्यमवर्ग को झेलना, उठाना और सहना पड़ रहा है, इसलिए जरूरत है कि समाज का आधुनिक मध्यमवर्ग इसके लिए संगठित होकर विमर्श करे, आवश्यकता हो तो आंदोलन करे। देश के प्राकृतिक, मानवीय एवं मानव निर्मित साधनों एवं संसाधनों की लूट और बर्बादी पर रोक लगे।
     इन साधनों एवं संसाधनों पर बिना किसी भेदभाव के समाज के सभी लोगों का अधिकार हो। जाति, धर्म, समाज, सम्प्रदाय, लिंग एवं व्यक्ति आधारित राजनीति के कारण आज भी लोगों को बदलाव, विकास एवं रोजगार के समान अवसरों से वंचित होना पड़ रहा है, यह  देश के लिए कितनी बड़ी विडंबना है, जबकि इसके लिए समाज के प्रत्येक वर्ग के लोगों को समान अवसर की प्राप्ति होनी चाहिए। अपनी कुर्सी एवं स्वार्थ के लिए राजनीतिक दलों के नेतागण आम जनता को हमेशा गुमराह करते रहते हैं, और जनता उसी भुलावे में रहकर आपस में लड़ती है, जबकि वे स्वयं आपस में मिले रहते हैं। 
    अब समय आ गया है कि जनता इस सच्चाई को समझे और अपने एवं अपने परिवार, समाज की शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास एवं रोजगार एवं जीवन स्तर जैसे ज्वलंत मुद्दों एवं विषयों पर अपना ध्यान केन्द्रित करे।
     जाति, धर्म, समाज, सम्प्रदाय, लिंग एवं व्यक्ति आधारित राजनीति से उपर उठकर वर्तमान राजनीति की दशा एवं दिशा को बदलाव, परिवर्तन, तरक्की, उन्नति, बेहतरी, विकास, प्रगति एवं संवृद्धि की ओर मोड़े। सरकारों एवं राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि जाति, धर्म, समाज, सम्प्रदाय, लिंग एवं व्यक्ति आधारित राजनीति तत्काल बंद करें एवं लोकहितकारी, लोककल्याणकारी राज्य की स्थापना की मूल भावना को साकार करें, अन्यथा आने वाले समय में जनता उन्हें उखाड़ फेंकेगी। 
    आज देश एवं राज्यों में सरकारें अपनी वार्षिक बजटों को बाहर से अत्यंत ही लोकलुभावन, जनकल्याणकारी, विकास उत्प्रेरक एवं अत्यंत ही उपयोगी बजट के तौर पर पेश करती हैं, लेकिन इस लोक लुभावन बजटों का बारीकी से अध्ययन एवं विश्लेषण करें तो पता चलेगा कि बजट कितने सही है? बजट को यदि विभागवार अथवा समग्रता में कैसे भी रूपयों-पैसों के आबंटन के आधार पर देखेंगे तो बजट को समझना बहुत मुश्किल है, क्योंकि आंकड़ों का मायाजाल एवं खेल बहुत खतरनाक होता है। सरकारों के पास पैसे की कोई कमी नहीं है फिर क्यों किसानों की मौत का सिलसिला रूकने का नाम नहीं ले रहा है?
    शिक्षा की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं दिखलाई दे रहा है? अस्पतालों में रोगियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है? युवाओं में रोजगार एवं भविष्य की आशंकाओं को लेकर हताशा, निराशा एवं कुंठा क्यों बढ़ती जा रही है? अब तो पढऩे वाले विद्यार्थियों में आत्महत्या की प्रवृति खतरनाक तरह से बढ़ रही है। 
    दरअसल में किसी भी देश एवं राज्य की खुशहाली, असली संवृद्धि का पैमाना केवल आर्थिक विकास में नहीं है। सरकारें आज यही भूल करती जा रही हैं। सरकारों के पास कोई दीर्घकालिक नीतियां नहीं हैं, जिससे आने वाले समय में देश/प्रदेश में मानव संसाधन विकास की संभावनाएं साकार हो सकेगीं।
     शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं मानव संसाधन विकास जैसे मूलभत मुद्दों की अनदेखी एवं उपेक्षा की जा रही है।  आधारभूत संरचनाओं का विकास दीर्घकालिक नीतियों का हिस्सा हैं, मगर केवल स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों के भवन बना देने भर से शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं मानव संसाधन विकास जैसे मूलभत मुद्दों का विकास नहीं हो जाता है। आज सरकारों को चाहिए कि सामाजिक एवं ग्रामीण विकास की ओर ध्यान केन्द्रित करे, सामाजिक अध्ययन, अनुसंधान पर नीतियां बनाये एवं उनका पालन करे, तभी आने वाले समय में समाज को इन विसंगतियों, विषमताओं, बुराईयों, विराधाभासों, असमानताओं से बचाया जा सकेगा, तभी समाज को बर्बर एवं हिंसक होने से रोका जा सकेगा।
    (लेखक वरिष्ठ सहा. प्राध्यापक एवं  छत्तीसगढ़ सामाजिक विज्ञान परिषद् के महासचिव हैं)  

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  • गिरीश मालवीय
    जितने भी लेखक आर्थिक विषयों की थोड़ी बहुत समझ रखते हैं वह लगातार लिखे जा रहे हैं कि मोदीजी की नीतियां देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रही हैं। 
    आज खबर आ रही है कि मोदी राजÓ में 4 साल के उच्चतम स्तर पर चालू बचत घाटा पहुंच गया हैं, इसकी सबसे बड़ी वजह हैं व्यापार घाटे का बढऩा वित्त वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही में यह तेजी से बढ़कर 14.3 अरब डॉलर हो गया। यह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 2.4 फीसदी है।  जबकि इसकी पिछले वित्त वर्ष 2016-17 की इसी तिमाही में चालू खाते का घाटा (कैड) 0.4 अरब डॉलर या जीडीपी का मात्र 0.1 प्रतिशत था। यह घाटा दर्शा रहा है कि नोटबन्दी ओर जीएसटी के बाद देश की अर्थव्यवस्था पर गहरा संकट मंडरा रहा है।
    व्यापार घाटा देश के आयात निर्यात से सीधे जुड़ा हुआ है इसका सीधा अर्थ यह है कि पिछले 4 वर्षों में आयात असाधारण रफ्तार से बढ़ा है, लेकिन भारतीय निर्यात सुस्त रहा है। सिर्फ चीन की ही बात की जाए तो 2016-17 में चीन ने भारत में 61.3 अरब डॉलर का माल निर्यात किया, जबकि भारत उसे महज 10.2 अरब डॉलर का ही निर्यात कर सका। यह आंकड़ा ही बता रहा है कि मोदीजी की मेक इन इंडिया और अन्य नीतियां कितनी बुरी तरह से असफल साबित हो रही है, चीन के माल का बहिष्कार की हकीकत क्या है, होना यह चाहिए कि चीन के बाजारों में अपना ज्यादा से ज्यादा माल बेचने की जुगत लगाई जाए। इसमें बड़ी दिक्कत यह है कि चीन ने कुछ ऐसे मानक तय कर रखे हैं, जिनकी वजह से भारतीय सामान चीनी बाजारों तक पहुंच ही नहीं पाते। यानी चीन अपने मानक बनाने को लेकर स्वतंत्र है लेकिन जैसे ही हम भारतीय सरकार से भारत में चीन के माल पर प्रतिबंध की बात करते है हमें विश्व व्यापार समझौते की गोली पकड़ा दी जाती है।

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  • राहुल कोटियाल
    धर्मगुरुओं को राजनीतिक संरक्षण मिलना कितना घातक हो सकता है, इसका एक उदाहरण हाल ही में गुरमीत राम रहीम की गिरफ्तारी के दौरान पूरी दुनिया ने देखा है। राम रहीम की राजनीतिक पैठ अगर इतनी मजबूत न होती तो शायद हिंसा पर उतारू उनके समर्थकों को बहुत पहले ही रोका जा सकता था और उस हिंसा से बचा जा सकता था। इसीलिए इस घटना के बाद से यह सवाल कई बार उठा है कि धर्मगुरुओं को राजनीतिक संरक्षण मिलना और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का उनके आगे नतमस्तक होना कितना सही है? संवैधानिक पदों पर रहते हुए धर्मगुरुओं का महिमामंडन करना सिर्फ नैतिकता से जुड़ा मामला नहीं है। कई बार ऐसे धर्मगुरुओं के चलते संवैधानिक मान्यताओं और परंपराओं तक से समझौते हुए हैं। गुरमीत राम रहीम के बहाने छिड़ी यह बहस अभी ठंडी भी नहीं हुई कि ऐसा ही एक और मामला सामने आ गया। इस बार गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अजित सिंह पर आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर का स्वागत करने के नियमों का उल्लंघन करने के आरोप लगे।
    हाल ही में रविशंकर पूर्वोत्तर राज्यों के दौरे पर थे। वहां उनका स्वागत करने जस्टिस अजित सिंह भी पहुंचे। परंपरा है कि उच्च न्यायिक पदों पर रहते हुए इस तरह के आयोजनों में शामिल होने से बचा जाता है। लेकिन जस्टिस अजित सिंह न सिर्फ इसमें शामिल हुए बल्कि वे खुद ही कार चलाते हुए रविशंकर को अपने साथ भी ले गए। मुख्य न्यायाधीश के ऐसा करने पर गुवाहाटी हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने ऐतराज जताया है। एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना है कि जस्टिस अजित सिंह ने मुख्य न्यायाधीश रहते हुए एक धर्मगुरु के साथ इस तरह से जाकर उच्च न्यायालय के नियमों का उल्लंघन किया है और वे लोग देश के मुख्य न्यायाधीश से इसका संज्ञान लेने और जस्टिस अजित सिंह के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेंगे।
    यह पहली बार नहीं है जब किसी धर्मगुरु के लिए नियमों को इस तरह से ताक पर रखा गया हो। ऐसी घटनाएं पहले भी हुई हैं जिनमें से कुछ मुख्य इस तरह हैं-
    बलात्कार के आरोपित आसाराम का मध्य प्रदेश विधान सभा में प्रवचन
    साल 2004 की बात है। उमा भारती तब मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री हुआ करती थीं। इसी दौरान उन्होंने प्रदेश विधान सभा भवन में आसाराम का प्रवचन आयोजित करवाया। वही आसाराम जो पिछले कुछ वर्षों से नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार करने के आरोप में जेल में हैं और जिन पर और भी कई गंभीर आरोप हैं। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार इस प्रवचन में मध्य प्रदेश भाजपा के सभी विधायक और पूरा मंत्रिमंडल भक्तिभाव से उपस्थित था। मध्य प्रदेश सरकार की तरफ से पत्रकारों को भी आमंत्रित किया गया था और मध्य प्रदेश शासन के जनसंपर्क महकमे ने बाकायदा उनके प्रवचन के प्रेस नोट छाप कर हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में बांटे थे।
    एक धर्मनिरपेक्ष देश में किसी राज्य सरकार का एक धर्मगुरु को विधान सभा में बुलाना और उसके प्रवचनों के प्रेस नोट बनाकर बांटना साफ तौर से नियमों के प्रतिकूल था। लेकिन इस घटना पर इतनी चर्चा नहीं हुई क्योंकि आसाराम का व्यापक जनाधार था और इसलिए विपक्ष भी आसाराम के खिलाफ बोलने में हिचकिचाता था।
    धर्मगुरु तरुण सागर के प्रवचनों से हरियाणा विधान सभा सत्र की शुरुआत
    हरियाणा की मौजूदा मनोहरलाल खट्टर सरकार ने पिछले साल एक अनोखा रिकॉर्ड अपने नाम किया। देश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी राज्य की विधान सभा में सत्र की शुरुआत एक धर्मगुरु के प्रवचनों से हुई। लेकिन इस रिकॉर्ड को बनाते हुए हरियाणा सरकार ने विधान सभा की तमाम स्थापित परंपराओं की आहुति भी दे डाली। विधानसभा राज्य की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था होती है।
     जब भी कोई व्यक्ति विधान सभा का सदस्य बनता है वह संविधान की शपथ लेता है। लेकिन हरियाणा के विधान सभा सदस्यों ने तमाम संवैधानिक परंपराओं को धता बताते हुए विधान सभा भवन के भीतर राज्यपाल, मुख्यमंत्री और विधान सभा अध्यक्ष से ऊंची कुर्सी लगाकर एक धर्मगुरु को उस पर बैठाया और उनके 'कड़वे प्रवचनÓ सुने।
    जिस देश का संविधान धर्म को राजनीति से अलग रखने की बात कहता है, उस देश की विधान सभा के भीतर तरुण सागर ने विधायकों को पढ़ाया, 'राजनीति पर धर्म का अंकुश होना जरूरी है। धर्म पति है और राजनीति पत्नी। हर पति की ये ड्यूटी होती है कि अपनी पत्नी को संरक्षण दे और हर पत्नी का धर्म होता है कि वो पति के अनुशासन को स्वीकार करे। अगर राजनीति पर धर्म अंकुश न हो तो वो मग्न-मस्त हाथी की तरह हो जाती है।Ó महिला विरोधी होने के साथ ही ये बातें साफ तौर से संविधान के खिलाफ थीं, लेकिन संविधान की शपथ लेकर उसका अनुपालन करने वालों को धर्मगुरु की इन बातों से कोई आपत्ति नहीं हुई।
    धर्मगुरु के जन्मदिन पर जब देश के राष्ट्रपति ने कविता पढ़ी
    डॉक्टर अब्दुल कलाम देश के उन राष्ट्रपतियों में से एक हैं जिन पर कभी कोई गंभीर आरोप नहीं लगे और जिन्हें सबसे लोकप्रिय भी माना जाता रहा है। लेकिन एक धर्मगुरु के चलते अब्दुल कलाम भी विवादों से घिर चुके हैं। 
    ये घटना नवम्बर 2006 की है। अब्दुल कलाम तब देश के राष्ट्रपति हुआ करते थे। इसी दौरान विवादित धर्मगुरु साईं बाबा के जन्मदिन पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिसमें उन्हें भी बुलावा आया। अब्दुल कलाम न सिर्फ इस कार्यक्रम में पहुंचे बल्कि उन्होंने साईं बाबा की तारीफ में अपनी लिखी कविता भी पढ़ी।
    राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का यह कदम कई कारणों से गलत माना जाता है। ये वही साईं बाबा थे जो हवा से राख निकाल कर अपने भक्तों को उनकी सारी समस्याओं के समाधान के रूप में बांटा करते थे। अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने ऐसे बाबाओं की पोल खोलने के लिए कई कार्यक्रम किये और लोगों को बताया कि धर्म के नाम पर हाथ की सफाई दिखाने वाले ये लोग ठग से ज्यादा कुछ नहीं। माना जाता है कि ऐसे बाबाओं की पोल खोलने की कीमत अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक नरेंद्र दाभोलकर ने सीने पर गोलियां खाकर चुकाई। लेकिन देश के राष्ट्रपति, जो खुद एक वैज्ञानिक भी थे, ऐसे ही एक बाबा की तारीफ में कसीदे पढ़ रहे थे।
    हमारा संविधान कहता है कि लोगों में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना राज्य की जिम्मेदारी होनी चाहिए। ऐसे कई कानून भी हैं जो जादू-टोने के दम पर लोगों का इलाज करने वालों को दण्डित करने की बात कहते हैं। लेकिन जब देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ही ऐसे बाबाओं का महिमामंडन करने लगे तो इसकी उम्मीद कम ही बचती है कि आम लोग उसके ढोंग को समझ पाएंगे।
    इन मामलों के अलावा और भी कई बार ऐसा हुआ है जब राजनेताओं ने धर्गुरुओं को कभी कौडिय़ों के भाव जमीनें आवंटित कीं तो कभी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उन्हें वित्तीय लाभ पहुंचाया। लेकिन समस्या यह है कि जब तक ऐसे धर्मगुरु किसी गंभीर आरोप में दोषी साबित नहीं हो जाते, तब तक राजनेताओं और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की इनसे नजदीकी पर ज्यादा सवाल नहीं उठाए जाते। यदि सवाल उठने लगें तो शायद उस तरह की स्थितियों से बचा जा सकता है जैसी कुछ समय पहले राम रहीम की गिरफ्तारी वक्त हरियाणा में पैदा हो गई थी। (सत्याग्रह)

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  • दिनेश चौधरी
    'हिंदी साहित्य 150 रुपये किलो के विज्ञापन देख कर रहा नहीं गया। मैंने झोला निकाला और आदतन श्रीमती जी से पूछा, 'क्या लाना है? उन्होंने कहा, '2 किलो नॉवेल, 1 किलो कविता,एकाध किलो संस्मरण और 1 पाव आलोचना। मैंने पूछा 'आलोचना इतनी सी? उन्होंने कहा, 'तीखी होती है और ज्यादा खपती भी नहीं।
    दुकान में भीड़ थी। राजभाषा वाले मित्र मिल गए। दो बोरियाँ लेकर आए थे। मैंने पूछा, 'क्या साल भर का स्टॉक एक साथ ले जाते हैं उन्होंने कहा, 'नहीं, ऐसी बात नहीं है। हिंदी पखवाड़े के लिए दो लाख का बजट था। गेस्ट के फ्लाइट और रहने का खर्च, प्रिंटिंग, एड, रिफ्रेशमेंट वगैरह में सारे पैसे खप गए। तीनेक हजार बचे थे तो सोचा 12-15 किलो साहित्य खरीद लूँ। आखिर अपनी दाल-रोटी इसी से चलनी है।
    'और क्या चल रहा है, डिपार्टमेंट में? मैंने पूछा। उन्होंने कहा कि 'काम का प्रेशर बहुत है। रोज हिंदी का एक नया शब्द निकालना पड़ता है। फिर अंग्रेजी में उसका अर्थ और समानार्थी शब्द। कामकाज में उसकी उपयोगिता। रोज एंट्रेस के ब्लैक बोर्ड में इसे लिखना होता है। आजकल काम का दबाव कुछ ज्यादा ही हो गया है मैंने कहा, 'सही कह रहे हैं। रोज एक शब्द लिखवाकर सिर्फ एक लाख की सैलरी देना मजदूरों का शोषण है। 'हां, वो तो है कहकर वे साहित्य तुलवाने में लग गए। बड़ा ग्राहक देखकर दुकान वाले ने थोड़ा साहित्य ऊपर से भी डाल दिया।
    कार से एक मेमसाब भी उतरी थीं। उन्हें ब्लू कवर वाले साहित्य की जरूरत थी। उन्होंने बताया की रेड कवर वाली पहले से बहुत हैं। अभी ड्राइंग रूम में ब्लू कलर के परदे लगवाएं हैं, इसलिए मैचिंग लिट्रेचर की जरूरत है। मेम साहब की बिटिया नाक-भौं सिकोड़ रही थी। हिंदी लिटरेचर लेना उसे अपमान जनक लग रहा था। मेम कह रही थीं, 'पढऩा तो है नहीं, सेल्फ में लगानी हैं तो थोड़ा चीप लिट्रेचर लेना ही ठीक रहेगा।
    दुकानदार से दुआ-सलाम है। बैठने के लिए कुर्सी दी और चाय भी मंगवाई। मैंने कहा, 'हिंदी साहित्य का रेट कुछ ज्यादा ही नहीं गिर गया है? उसने कहा, 'नहीं बाऊजी, ये तो सीजन का रेट है। अभी हिंदी पखवाड़ा चल रहा है तो उठाव भी ज्यादा है। ऑफ़ सीजन में तो हम लोग 100 रुपये किलो बेचते हैं। 'इतना माल कहां से आ जाता हैÓ मैंने पूछा। उसने कहा, 'माल की कमी नहीं है। दीवाली की पुताई से पहले लोग बहुत सारा माल अपने घर से निकालते हैं। अभी जो मेमसाब आई थीं, उनके पर्दे बदल जाएंगे तो सारा माल यही छोड़ जाएंगी। राजभाषा विभाग हर साल यही करता है। इस साल का सरप्लस हमारे पास पटक जाता है और अगले साल उसी को खरीद भी लेता है। वैसे सबसे ज्यादा आवक कविता की है।Ó
    'कविता की?Ó मैंने हैरानी से पूछा। उसने कहा, हां। आप तो जानते ही हैं, हिंदी में सबसे ज्यादा कविता ही लिखी जाती है। पढ़ी कम जाती है, लिखी ज्यादा जाती है। हर मोहल्ले में 4-5 कवि तो होते ही हैं। कविता कहीं छपती नहीं है। लौटकर आ जाती है तो अपने खर्चे से उन्हीं का संग्रह छपवा लेते हैं। बांटे तो कितना बाँटे? जिसे देते हैं, वो कहता है कि पहले से एक पड़ी है। तो वो सारा माल यहीं आ जाता है।
    'एक मजेदार किस्सा है। पड़ोस के मोहल्ले में एक कवि रसराज रसिक रहते हैं। दो बेटे हैं, दोनों किरानी। आमदनी अच्छी है। रसिक को को काव्य संग्रह छपाने का शौक है। बेटे जानते हैं कि फिजूलखर्ची है पर कहते हैं कि चलो ठीक ही है। बाप अगर क्लब में जाता, जुआ खेलता, दारु पीता तो इससे ज्यादा खर्च होता। इससे अच्छा है कि कविता लिखता है।Ó
    'तो एक बार यूं हुआ कि रसिकजी ने जोश-जोश में अपने काव्य संग्रह की 5 हजार प्रति छपवा ली। अब बांटे तो कितना बांटें। एक नौजवान मिला। कहा कि आप उच्च कोटि के कवि हैं, आपके साहित्य का प्रचार मैं करूंगा। रोज 3-4 प्रतियां ले जाता। एक दिन रसिक जी को मालूम पड़ा कि वह पनवाड़ी है तो मारे गुस्से के सारी प्रतियां यहां पटक गए। अब यह 50 रुपये किलो में भी क्या बुरा है?Ó
    मैंने पूछा, 'साहित्य नग के हिसाब से नहीं बेचते?Ó  जैसे शास्त्रीय संगीत का गवैया उस्तादों के नाम लेते हुए कान पकड़ लेता है, उसने कान छूकर बताया कि वेद प्रकाश जी और सुरेन्द्र मोहन जी की बिकती हैं। पहले मनोहर कहानियां और सत्य-कथा भी बिकती थी पर अब तो टीवी चैनल ज्यादा सच्चे और ज्यादा मनोहारी हो गए हैं। नग वाला जमाना चला गया है, अब तो किलो का ही हिसाब चलता है।
    'अंग्रेजी का साहित्य नहीं रखतेÓ मैंने पूछा। पटरे पर बैठकर सब्जी बेचने वाले से जैसे बेबी कॉर्न या बटन मशरूम मांग लिया गया हो, उसने सकुचाते हुए कहा, नहीं बाऊजी, उसके लिए तो आपको बिग बाज़ार जाना पड़ेगा। शो रूम भी हैं। यह बड़े डीलरों वाला काम है।
    मैंने पांच-छ: किलो साहित्य तुलवाया। दुकानदार अंदर गया। लौटकर कहा आपके लिए स्पेशल गिफ्ट है। परसाई जी की किताब थी, 'प्रेमचन्द के फ़टे जूते।Ó
    जिस भाषा का साहित्य 150 रूपये किलो बिकता हो, उसके लेखक को फटे जूते नसीब हो जाएँ, यही बड़ी बात है। (फेसबुक पर)

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  •  आदित्य प्रकाश मिश्रा, रेलवे बोर्ड के पूर्व सदस्य
    अहमदाबाद से मुंबई के बीच बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट का शिलान्यास हो गया है। मोदी सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना की शुरुआत तो हो गई है, लेकिन इतनी बड़ी परियोजना में जरूरी है कि इसकी प्लानिंग बेहतर हो। भारत में कई बार ये गलती करते हैं हमलोग कि प्लानिंग में बहुत कम वक्त लगाते हैं और इसी वजह से काम पूरा होने में लंबा समय लग जाता है। हमलोग शुरुआत में बहुत जल्दबाजी करते हैं। मैं कहूंगा कि इसकी प्लानिंग बेहतर और सटीक होनी चाहिए।
    दूसरी बात, इसमें अच्छी बात ये है कि निर्धारित फंडिंग है। पैसे की कोई कमी नहीं होगी, लेकिन कॉन्ट्रैक्ट फिक्सिंग का काम करना पड़ेगा। उसके दस्तावेज तैयार करने पड़ेंगे। उसकी परिस्थितियां तैयार करनी पड़ेंगी और योग्यता का स्तर तय करना पड़ेगा। इसके लिए कॉन्ट्रैक्ट पेपर तैयार करना बड़ी चुनौती है।
    इसमें क्योंकि जमीन में काम कम है, ज्यादातर काम जमीन के ऊपर है, एलिवेटेड ट्रैक होगा, लेकिन जहां भी जमीन अधिग्रहण की जरूरत पडऩी है उसकी प्रक्रिया भी अभी से शुरू कर देनी चाहिए क्योंकि अधिग्रहण में सबसे ज्यादा समय लग सकता है।
    यह सरकार पर निर्भर करता है कि ये काम कब शुरू होता है। अगर सरकार इसमें रुचि लेती है तो कोई समस्या नहीं होगी। रेल परिवहन सबसे ज्यादा अनुकूल परिवहन है। पर्यावरण पर इसका न के बराबर असर होगा। सिर्फ अधिग्रहित जमीन का उचित मुआवजा देना होगा। अगर सही मुआवजा और प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए सरकार बेहतर कदम उठाती है तो इस रास्ते में कोई बाधा नहीं आएगी। खासतौर से इस पर सरकार को रुचि लेनी होगी और जिस तरह काम शुरू हुआ है सरकार जरूर रुचि लेगी। यह भारत का शो-केस प्रोजेक्ट होगा। हालांकि कई बार अचानक मुश्किलें आने लगती हैं। लोग विरोध जताने लगते हैं। कुछ ऐसी जमीनें आ जातीं हैं जहां धार्मिक स्थल होते हैं, विवादित जगहें होती हैं। यह प्लानिंग का हिस्सा है कि उससे प्रोजेक्ट को दूर रखा जाए और विवादित जगहें न हों। इसके लिए अच्छे इंजीनियर और प्रोजेक्ट मैनेजर्स की जरूरत होगी तो उन लोगों को चिन्हित किया जाए और उन्हीं को लिया जाए। उसमें किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाना चाहिए। जो सबसे अच्छे लोग हों उन्हें इसमें रखा जाए।  
    (बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित)

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