विशेष रिपोर्ट

दारू के धंधे में बस चेहरे बदले, न कोचिए खत्म हुए न पंडे




दूसरे राज्य की शराब, ग्राहक की हत्या, अवैध सरकारी आदेश सब जारी, ब्रांड मोनोपोली शुरू हो गई

राजेश अग्रवाल

बिलासपुर(छत्तीसगढ़)। शराब ठेका बंद कर सरकारी संरक्षण में बिक्री शुरू करने के साथ किए गए सरकार के लम्बे चौड़े दावे धराशायी हो गए हैं। न कोचिये खत्म हुए, अवैध शराब की बिक्री रुकी बल्कि इसकी जगह उन सेल्समेन और सुपरवाइजरों ने ले ली है। 
पुलिस और आबकारी विभाग के अमले ने अपनी करतूतों से साबित कर दिया है कि वे ठेकेदारों के पंडों से कम नहीं है। बिलासपुर- मुंगेली जिलों में तो ये चखना सेंटर के जरिये लाखों रुपये की उगाही भी करने लगे हैं। पहले कानून व्यवस्था का थोड़ा भय ठेकेदारों में रहता भी था, अब तो शराब दुकानों में लगातार मारपीट, झगड़े- यहां तक कि हत्या की वारदात भी बेखौफ होने लगी है। गांवों में यह कारोबार कोचियों की जगह उन लोगों ने ली है, जिनकी पुलिस, आबकारी और सत्ता में पकड़ है। 
शराब ठेकेदारों के कोचियों द्वारा प्रदेश भर में बेची जा रही अवैध शराब का बीते एक साल से भारी विरोध हो रहा था। शराब ठेकेदार के पंडे और उनके कोचिये जगह-जगह मारपीट करते थे, हत्या और बलात्कार की घटनाएं भी हुईं। स्कूल जाने वाले बच्चों को भी शराब खरीदते और पीते पाया गया। सड़क दुर्घटनाएं बढ़ीं और पारिवारिक कलह ने हिंसक रूप ले लिया था। इसके बाद कोचियों और पंडों के खिलाफ प्रदेश के अलग-अलग स्थानों में रोष बढ़ता गया और शराबबंदी की मांग उठने लगी। विधानसभा में भी इस मुद्दे पर खूब हंगामा हुआ। 
राजस्व के 3600 करोड़ के घाटे की चिंता होने के चलते शराब को बंद करने का भारी दबाव होने के बावजूद सरकार ने रास्ता निकाला। दुकानों की नीलामी रोक दी गई, ठेकेदारी प्रणाली खत्म कर दी गई। सरकार ने खुद निगम बनाकर शराब बेचना तय किया। लोगों का आक्रोश तब भी कम नहीं हो रहा था। तब मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा कि शराबबंदी पर निर्णय सही समय पर लिया जाएगा। लोगों में आक्रोश अवैध शराब बिक्री और कोचियों के प्रति है, इसलिए सरकार ने ऐसी फूल प्रूफ व्यवस्था की है कि 'कोचिये नाम के प्राणी यहां से सदैव के लिए खत्म हो जाएंगे।' 
शराब सरकार द्वारा खुद बेचने के फैसले की आलोचना किए जाने पर आबकारी मंत्री अग्रवाल ने कहा कि ये शराब ठेकेदारों के कहने पर उठने वाली आवाज है। सरकार का शराब बेचना कोई नई बात नहीं है। 
फरवरी माह में उन्होंने दावा किया कि कुछ माह में छत्तीसगढ़ में कोई कोचिया नहीं बचेगा। राजस्व कभी सरकार की चिंता में शामिल नहीं रहा है। तमिलनाडु, केरल और दिल्ली के मॉडल का अध्ययन कर शराब बेचे जाएंगे। अपराध और अवैध शराब की बिक्री रोकने के लिए शराब ठेकेदारों के लोगों की कर्मचारियों के रूप में भर्ती नहीं की जाएगी। दुकानों को बैंक से जोड़ेंगे, कैशलेस और कैश भुगतान की व्यवस्था होगी। दुकानों और बॉटलिंग संयंत्रों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे। एक व्यक्ति सीमित संख्या में ही शराब खरीद सकेगा, अधिक खरीदी गई तो कैमरे में कैद हो जाएगा। लेकिन अब जबकि नई शराब नीति को लागू हुए सौ से अधिक दिन बीत गए हैं, हालत पहले से बदतर हो गई है।
रायपुर के करीब मांढर में  गुरुवार को शराब दुकान के सुपरवाइजर और सेल्समैन ने एक ग्राहक को छत पर ले जाकर  इतनी पिटाई की गई कि वह उनके चंगुल से छूटने के लिए नीचे कूद गया और उसकी मौत हो गई। राजधानी रायपुर में ही सरकारी दूकान में अन्य राज्यों और नकली शराब बेचते वहां के कर्मचारियों को पकड़ा गया।  एक दिन पहले बस्तर संभाग के सुकमा जिला मुख्यालय में एक एएसआई और उसकी कथित पत्नी के घर से शराब की बोतलें जब्त की गईं। यह पुलिस वाला शराब की अवैध बिक्री में लिप्त था। महासमुंद जिले में कुछ दिन पहले सुपरवाइजर, सैल्समेन और गार्ड शराब बेचते आधी रात पकड़े गए थे।  
बिलासपुर में आए दिन इस तरह की घटनाएं हो रही हैं। वसुंधरा नगर स्थित शराब दुकान के बाहर लोगों के पर्स, मोबाइल पार करने वाले युवकों के गिरोह ने कैरियर पाइंट स्कूल के ड्राइवर को शराब के लिए पैसे देने से मना करने पर पीट-पीट कर मार डाला। शाम होते ही अपराधियों का गिरोह शराब दुकानों के बाहर मंडराने लगता है जो ग्राहकों के पैसे, घड़ी और मोबाइल पार कर देते हैं। भीड़ भाड़ और असामाजिक तत्वों का अड्डा होने के बाद यहां कोई सुरक्षा इंतजाम नहीं है। हर दुकान के लिए दो दो गार्ड दिए गए हैं पर वे किसी से उलझने से डरते हैं। 
पुलिस और आबकारी विभाग के लोग यहां इसलिए तैनात नहीं रहते क्योंकि वे मानते हैं कि सरकार ही अब शराब बेच रही है। ठेकेदार तो हैं नहीं, फिर सुरक्षा की क्या जरूरत? बिलासपुर जिले की हर शराब दुकान के पास इसलिए भी भारी भीड़ होती है कि सारे नियम कायदों की धज्जियां उड़ाते हुए आबकारी विभाग ने यहां फर्जी आदेश के जरिये अवैध चखना सेंटरों को अनुमति  दे दी है। लोग शराब पीते हैं, वहीं झगड़ा होता है और फिर लूटपाट की घटनाएं होती हैं। बिलासपुर के इस फर्जीवाड़े की शिकायत और फिर उसके बाद जांच हुई, लेकिन जांच रिपोर्ट खानापूर्ति ही साबित हुई।
उपायुक्त के आबकारी दस्ते ने पाया कि चखना दुकानों की दूरी निर्धारित 50 मीटर से कम है और वहां खुली खाद्य सामग्री बेची जा रही है। आबकारी विभाग को इसका लाइसेंस देने का अधिकार ही नहीं है और उसने प्रति चखना सेंटर प्रतिदिन 1500 रुपये की वसूली फर्जी पत्र के जरिये शुरू कर दी है। यह राशि अकेले बिलासपुर में प्रतिमाह 65 लाख यानी साल में सात करोड़ से अधिक होती है। बिलासपुर संभाग के मुंगेली में भी यही खेल शुरू हो चुका है। पथरिया में आबकारी विभाग ने शराब दुकानों के सामने खड़े ठेले वालों को पीट-पीट कर भगाया, उसके बाद अपना चखना सेंटर खोल दिया। बाकी जगह भी चखना सेंटरों का अवैध आवंटन किया गया है। 
शराब की अवैध बिक्री रोकने के लिए दुकानों के सामने सीसीटीवी कैमरा लगाने का दावा भी अब तक हवा में है। किसी भी शराब दुकान के सामने यह सीसीटीवी नहीं लगा है। कौन कितनी ही शराब खरीद सकता है। कर्मचारियों को सेट कर लोग बीयर और शराब के कैरेट ले जा रहे हैं। 
जब से शराब की बिक्री शुरू हुई है, पहले के लोकप्रिय ब्रांड बाजार से या तो पूरी तरह गायब हो गए हैं या फिर आने के दो चार घंटे बाद गायब हो रहे हैं। मीडियम रेंज में पसंद की जाने वाली सिग्नेचर, रायल चैलेंज, रायल स्टैग और उनसे सस्ती इंपीरियल ब्लू जैसी शराब दुकानों में नहीं मिल रही, बल्कि जिन शराबों का नाम पहले नहीं सुना गया था वे बिक रही हैं। एक सेल्समेन से स्वीकार किया कि अच्छी ब्रांड के शराब की पहले से बुकिंग करा ली जाती है। कुछ बार संचालकों और थोक में खरीदने वाले लोगों के लिए थोड़ी अधिक राशि बेचने के लिए यह शराब छिपाकर रख ली जाती है। जिन्हें पसंद की ब्रांड नहीं मिल रही उनका आरोप है कि सरकारी अमले ने ज्यादा कमीशन के लिए खराब ब्रांड की शराब से दुकानों को भर दिया है। 
सीसीटीवी कैमरों के न होने का फायदा सेल्समेन और चखना सेंटर संचालक उठा रहे हैं। निर्धारित रात नौ बजे के बाद भी सेल्समेन और चखना सेंटर के संचालक शराब उपलब्ध कराने के लिए तत्पर रहते हैं, जिसकी वे अधिक कीमत वसूल करते हैं। 
नई शराब नीति के विफल होने का जीता-जागता उदाहरण बिलासपुर जिला ही है, जहां दुकानों को हटाने के लिए लगातार लोग आंदोलित हैं। शहर से सटे सैदा और मंगला में लगातार महिलाएं आंदोलन कर रही हैं। पुरुष भी उनका साथ दे रहे हैं। सैदा के मामले में दो सौ लोगों के खिलाफ पुलिस ने अपराध भी दर्ज कर लिया, लेकिन शराब दुकान नहीं हटाई गई। मंगला पंचायत की बीच बस्ती में शराब दुकान हटाने  के लिए आंदोलन चल रहा है। यहां भी आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया गया। मई माह में लोक सुराज अभियान के दौरान जगह-जगह शराब बिक्री के खिलाफ आंदोलन हुए। प्रभारी सचिव की मौजूदगी में कांग्रेस नेताओं ने केंदा में प्रदर्शन किया तो उन्हें भी जेल जाना पड़ा। 
बिलासपुर जिले में पुलिस ने अब तक अवैध शराब बिक्री के 50 से ज्यादा मामलों में सैकड़ों बोतल शराब जब्त की है। कुछ एक मामलों में तो सत्ता पक्ष से जुड़े जनप्रतिनिधि भी लिप्त पाए गए हैं। गांवों में यह कारोबार कोचियों की जगह उन लोगों ने ली है, जिनकी पुलिस, आबकारी और सत्ता में पकड़ है। 

 




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