सोशल मीडिया

अब जो भी नई पार्टी बने उसका नाम जनता दल (एनडीए) या जनता दल (यूपीए) होना चाहिए!


बिहार में महागठबंधन तोडऩे और भाजपा के साथ सरकार बनाने के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के फैसले पर जदयू में रार बढ़ती जा रही है। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव इस मामले में पहले से नीतीश कुमार से नाराज बताए जा रहे हैं और अब उनकी नाराजगी खुलकर सामने आ गई है। वे इस समय बिहार के दौरे पर हैं। शरद यादव ने यहां बयान दिया है कि वे अभी-भी महागठबंधन के साथ हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि पार्टी ने पांच साल के लिए महागठबंधन किया था और बीच में इसे तोडऩे का मतलब है कि बिहार के 11 करोड़ लोगों के साथ धोखा हुआ है। सोशल मीडिया में शरद यादव के इन बयानों की खूब चर्चा है और संभावना जताई जा रही है कि जल्द ही पार्टी उनको बाहर का रास्ता दिखाएगी।
सोशल मीडिया पर यह भी कहा जा रहा है कि जदयू दोफाड़ होने जा रही है और एक धड़े का नेतृत्व शरद यादव करेंगे। ट्विटर हैंडल शकुनी अंकल ऐसी ही खबर शेयर करते हुए चुटकी ली गई है, अब जो भी पार्टी बने उसका नाम जनता दल (एनडीए) या जनता दल (यूपीए) होना चाहिए। हालांकि यहां भाजपा समर्थकों के साथ-साथ कई लोगों ने शरद यादव की राजनीतिक क्षमता पर सवाल खड़े किए हैं। ट्विटर पर जलज कुमार ने पूछा है, क्या शरद यादव अपने दम पर पंचायत स्तर का चुनाव भी जीत सकते हैं?
कल हामिद अंसारी के कार्यकाल का आखिरी दिन था। राज्यसभा से अपनी विदाई पर अंतिम भाषण देते हुए उन्होंने अपरोक्ष रूप से केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा बेहद जरूरी है। वहीं एक दिन पहले एक इंटरव्यू में भी हामिद अंसारी ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया था। उन्होंने कहा था कि देश के मुसलमानों में बेचैनी की भावना और असुरक्षा का बोध है। इन बयानों के चलते हामिद अंसारी भी सोशल मीडिया के ट्रेंडिंग टॉपिक्स में शामिल हुए हैं। यहां भाजपा समर्थकों ने उनकी जमकर आलोचना की है। इस पर वरिष्ठ पत्रकार राणा अय्यूब ने ट्वीट किया है, ...हामिद अंसारी के ऊपर गुस्सा जताकर और उन्हें गालियां देकर आप सभी ने यही साबित किया है कि उनकी चिंताएं जायज हैं।
इन दोनों मामलों पर सोशल मीडिया में आई कुछ और टिप्पणियां-
जेएन कौशिक- अस्तित्वहीन महागठबंधन का समर्थन करके जदयू के वरिष्ठ नेता शरद यादव जीवन की सबसे बड़ी राजनीतिक गलती कर रहे हैं, इसके बाद उनका राजनीति से गायब हो जाना तय है।
अंशुल सक्सेना- शरद यादव इस तरह से उपदेश दे रहे हैं जैसे वे ही 2019 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हों। वे अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं। केजरीवाल के अलावा अब उन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता।
आचार्य प्रमोद- समाजवादी पार्टी से मुलायम सिंह यादव को और जदयू से शरद यादव को बेदखल करने का काम उन्होंने किया जो उंगली पकड़कर चलना भी इन्हीं से सीखे।
पिंकू शुक्ला- शरद यादव उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां क्रांति नहीं, शुगर या अस्थमा आते हैं।
राना साफवी- हामिद अंसारी साहब सही हैं या गलत, अब इसका कोई मतलब नहीं है। हालांकि इस समय सभी लोग उन्हें सही साबित करने में लगे हुए हैं। (सत्याग्रह)

 


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