विचार / लेख

छोटे से चुनाव का बड़़ा सबक


 प्रोफेसर मनीषा प्रियम, राजनीतिक विश्लेषक
यूं तो गुजरात में विधानसभा चुनाव इस साल के अंत में होने वाले हैं, लेकिन पूरे देश का ध्यान उस चुनाव की बजाय मंगलवार के राज्यसभा चुनाव पर केंद्रित हो गया था, और सच पूछिए, तो उसमें भी तीसरी सीट के परिणाम को जानने को लेकर लोग ज्यादा उत्साहित थे। इस सीट पर कांग्रेस के अहमद पटेल की जीत भंवर में फंसी थी। गुजरात में विगत चार बार से भाजपा विधानसभा चुनाव जीतती रही है। पिछले तीन चुनाव तो पार्टी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ही जीते थे, लेकिन इस बार वहां कुछ महत्वपूर्ण बदलाव हैं। 
पहली बात तो यही है कि मोदी राज्य छोड़कर अब राष्ट्र के अगुवा बन चुके हैं। राज्य से मोदी के निकलने के ठीक बाद मुख्यमंत्री आनंदी बेन की गद्दी हिल गई और वहां जमीनी स्तर पर हार्दिक पटेल के आंदोलन की चर्चा भी खूब रही। यहां तक कि विजय रूपानी को सत्ता की बागडोर थमानी पड़ी। मगर जहां विधानसभा चुनावों पर नजर लगनी चाहिए थी, राज्यसभा की एक सीट का चुनाव राष्ट्रीय सुर्खियों में छाया रहा। 
असल में, अहमद पटेल का राज्यसभा में पहुंचना इसलिए इतना बड़ा मुद्दा बना कि वह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खास सिपहसालार हैं और पार्टी पर उनकी अच्छी पकड़ है, खासकर कांग्रेस के वित्तीय मामलों पर। यूपीए के सत्ता काल में अहमद पटेल कभी सामने नहीं आते थे, लेकिन यह सर्वमान्य बात थी कि सोनिया गांधी के दफ्तर की कमान उनके हाथों में ही थी। ऐसे में, गुजरात विधानसभा चुनाव के कुछ महीने पहले अहमद पटेल के राज्यसभा चुनाव को भाजपा ने काफी मुश्किल बना दिया था। 
बहुत समय बाद यह इकलौता ऐसा राज्यसभा चुनाव रहा, जब चुनाव आयोग के दरवाजे देर रात तक देश के दो बड़े सियासी दलों भाजपा व कांग्रेस के नेताओं ने खटखटाए। मतगणना शुरू होने के ठीक कुछ समय पहले कांग्रेस ने चुनाव आयोग से यह नालिश की कि उसके दो विधायकों ने अपने मतपत्र भाजपा अध्यक्ष और इसी चुनाव के एक प्रत्याशी अमित शाह को दिखाए हैं, जो कानून का उल्लंघन है। इसके बाद मतगणना का काम रुक गया।
यानी राज्यसभा की एक सीट के चुनाव का ड्रामा, जो पिछले एक हफ्ते से टेलीविजन के परदे पर जारी था, मंगलवार की देर रात तक चलता रहा। जहां एक तरफ कांग्रेस प्रतिपक्षी भाजपा पर पैसे और सत्ता बल के दुरुपयोग के आरोप लगाती रही, वहीं दूसरी तरफ वह अमूमन इस तैयारी में भी दिखी कि यदि इस चुनाव का परिणाम उसके खिलाफ गया, तो अगले दिन भी टीवी पर उसके प्रवक्ता ऐसी बोल-बयानी कर सकें कि देखिए, भाजपा के शासन में किस तरह संविधान का निरादर हो रहा है और चुनाव आयोग जैसी निष्पक्ष सांविधानिक संस्था भी उसके इशारे पर काम कर रही है? लेकिन देर रात चुनाव आयोग के इस फैसले से कि उन दोनों मतों को, जो कांग्रेस के विधायकों ने अमित शाह को दिखाकर डाले थे, रद्द किया जाता है, कांग्रेस को इस तरह से हमला करने का मौका नहीं मिला। उसके प्रत्याशी अहमद पटेल अंतत: चुनाव जीते, लेकिन बेहद पतली मार्जिन व कानून के एक नुक्ते के सहारे।
जिस कांग्रेस के पास इस सदन में 50 से ज्यादा सदस्य थे, उसके समक्ष सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर पार्टी ने किया क्या कि राज्यसभा की जीत के लिए निर्धारित 45 मतों के लिए भी अफरा-तफरी मची? यह भी स्पष्ट नहीं हुआ कि कांग्रेस में शंकर सिंह वाघेला को रोकने की चेष्टा की भी गई या नहीं? अंतिम दिन अहमद पटेल के पक्ष में निकले पी चिदंबरम, मलिकार्जुन खडग़े, गुलाम नबी आजाद जैसे तमाम कांग्रेसी नेता पार्टी की वरिष्ठ मंडली के सदस्य हैं, और सोनिया गांधी के प्रति वफादार भी।  http://www.livehindustan.com/blog/l
इन सबके बीच कहीं यह स्पष्ट नहीं हुआ कि आखिर राहुल गांधी की युवा टीम है भी, तो कहां है? किसी ने यह सवाल भी उठाया कि यदि सोनिया के राजनीतिक सचिव की बजाय इस राज्यसभा चुनाव के प्रत्याशी राहुल के राजनीतिक सचिव होते, तो क्या कांग्रेस इसी प्रकार एकजुट होती? यदि इस राज्यसभा चुनाव के नतीजों को भाजपा के नजरिये से देखें, तो यह साफ है कि अमित शाह किसी भी चुनाव को आसानी से नहीं लेते। हर चुनाव में कांग्रेस की हार हो, इस पर उनकी सारी ऊर्जा केंद्रित रहती है। राज्यसभा की उस एक सीट के लिए, जिसे जीतने को भाजपा के पास पर्याप्त संख्या भी नहीं थी, वह देर रात तक अथक प्रयत्न करते दिखे। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा अब एक निरंतर चलने वाली इलेक्शन मशीन है। इस मामले में कोई भी चूक इन दोनों को बर्दाश्त नहीं। 
इस साल के अंत में गुजरात विधानसभा के चुनाव होंगे और उस चुनाव में अब यदि सबसे अधिक चर्चा किसी बात की होगी, तो इस राज्यसभा चुनाव की ही होगी, यानी अहमदाबाद का 'पॉलिटिकल नैरेटिवÓ अब आनंदी बेन सरकार या राज्य की भाजपा सरकार की विफलताओं से कहीं दूर जा चुका है।
 चुनाव के पहले का नैरेटिव अब कांग्रेस-विरोध का नैरेटिव बनकर उभर आया है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का असली लक्ष्य तो कांग्रेस मुक्त भारत है, और जाहिर है कि वह कांग्रेस को किसी तरह की रियायत नहीं देंगे। अमित शाह अब राज्यसभा में पहुंच चुके हैं, तो यह तय माना जा रहा है कि वह सरकार में मंत्री पद भी संभालेंगे। यानी पार्टी और सरकार, दोनों में अब वही प्रधानमंत्री के सबसे करीबी होंगे। वैसे भी गुजरात और कर्नाटक के चुनाव भाजपा के लिए काफी अहम हैं। गुजरात में स्वयं प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की साख दांव पर है। इसलिए आने वाले दिनों में अमित शाह की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने जा रही है। 
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि निकट भविष्य में पार्टी और चुनाव अमित शाह ही देखेंगे, पर सरकार में उनकी भूमिका क्या रहेगी, और उस भूमिका का 2019 के आम चुनाव पर क्या असर रहेगा, अब राजीनितक बहसों के केंद्र में यही बात होगी। बहरहाल, गुजरात के इस राज्यसभा चुनाव का एक ही सबक है कि किसी भी राजनेता को छोटा सा चुनाव भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। 


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