विचार / लेख

एक गांव उपेक्षित सा


इंजीनियर एसडी ओझा
राजस्थान का एक गांव धनूरी, जो झुंझनू जिला मुख्यालय से आधे घंटे की दूरी पर स्थित है, के हर घर में एक फौजी रहता है। कई परिवार ऐसे हैं जिनकी पांच पांच पीढिय़ों से लोग फौज में नौकरी करते आ रहे हैं। धनूरी मुस्लिम बहुल गांव है। इस गांव में कायमखानी मुस्लमान रहते हैं। तकरीबन 300 लोग सरहद पर तैनात हैं और 400 सेवा निवृत हो चुके हैं। इस गांव में प्रथम विश्व युद्ध से लेकर कारगिल युद्ध तक के शहीद हैं। इसी गांव के मेजर महमूद हैं, जिन्हें वीर चक्र मिला है। मेजर महमूद ने पाकिस्तान के कई पैटन टैंकों को नेस्तनाबूद किया था।
धनूरी गांव में हीं राजस्थान की प्रथम महिला लेफ्टिनेंट कर्नल ईशरत अहमद रहती हैं। यहां की 90 फीसदी आबादी मुस्लिम है, पर सभी यहां मिल जुलकर रहते हैं। यहां मंदिर व मस्जिद पास-पास हैं। धनूरी गांव के स्थापना के बाद से आज तक एक भी साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ है। कायमखानी मुसलमान हिंदुओं की हर सम्भव मदद करते हैं। 
धनूरी गांव की हीं संजू पारिक हैं, जो जब कक्षा 12 में पढ़ रही थीं तभी विधवा हो गयीं थीं। उनके पति फौज में थे। गांव के मुस्लिमों ने चंदा उगाही कर संजू पारिक को आगे की पढ़ाई पूरी करायी। गांव वालों के योगदान का हीं प्रतिफल है कि आज संजू पारिक एसडीएम के पद पर कार्यरत हैं।
इतना सब होने के बावजूद धनूरी गांव में मूलभूत सेवाओं का अभाव है। गांव में बिजली नहीं है। गांव में केवल हाई स्कूल तक शिक्षा का बंदोबस्त है। स्कूल की इमारत जीर्ण शीर्ण हो रही है। सरकारी अमला इसके मरम्मत के प्रति उदासीन है। धनूरी गांव के हीं रिटायर्ड फौजी परवेज खान ने इस स्कूल के गेट की मरम्मत अपने पैसों से करायी है। इस स्कूल को हायर सेकेंड्री तक ले जाने की कोशिश धनूरी गांव के लोगों की है। अभी तक कोई सफलता नहीं मिली है। इस स्कूल में पहले एन सी सी था, जिसे अब किसी निजी स्कूल को अन्यत्र सौंप दिया गया है। एनसीसी होने से धनूरी गांव के जवानों को फौज में भर्ती होने की आसानी होती थी।
धनूरी गांव के जवानों को फौज में भर्ती होने की तालीम गांव के हीं बुजुर्ग फौजी देते हैं। हर सुबह इस गांव के बाहर जवान दौड़ भाग, ऊंची कूद, लम्बी कूद की ट्रेनिंग लेते हुए मिल जाएंगे। इसी कड़ी ट्रेनिंग व प्रतिस्पर्धा के बल पर हीं धनूरी गांव इस देश को इतने फौजी देने में सक्षम हो पाया है। फौजी विधवाओं को इस गांव में वीरांगना कहते हैं। एक तरह से यह एक आदर सूचक शब्द है। अब तक 19 लोग धनूरी के शहीद हो चुके हैं, पर विडम्बना देखिए कि अब तक कोई शहीद स्मारक इस गांव में नहीं बना।

 


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