इंटरव्यू

घुमक्कड़ी आपको एक बेहतर इंसान बनाती है


घुमक्कड़ जंक्शन

 अभनपुर निवासी ललित शर्मा सुपरिचित घुमक्कड़-ब्लॉगरों में से हैं। देश के हर कोनों की यात्राएं की हैं और अनुभवों को अपने ब्लॉग में लिखा है। घुमक्कड़ी के दौरान वे देश के कई दूसरे घुमक्कड़ों से मिले। इन घुमक्कड़ों से उनका साक्षात्कार -घुमक्कड़ जंक्शन- हम हर शनिवार और बुधवार को प्रकाशित कर रहे हैं                               -संपादक

घुमक्कड़ जंक्शन पर आज मिलवाते हैं आपको ग्रेटर नोएडा निवासी घुमक्कड़ योगेन्द्र सारस्वत से, ये अपनी नौकरी के साथ घुमक्कड़ी  भी कर रहे हैं, इन्होंने अस्थमा जैसे रोग को धता बताते हुए घिया-विनायक एवं सतोपंथ-स्वर्गरोहणी जैसे कठिन ट्रेक भी किए।  
0 आप अपनी शिक्षा दीक्षा, अपने बचपन का शहर एवं बचपन के जीवन के विषय में पाठकों को बताएं कि वह कैसा समय था?
00 मेरी पैदाइश और बचपन की यादें उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद के छोटे से गाँव सिकतरा सानी में है। किसान परिवार में छह भाई -बहनों के बीच हालाँकि अभाव रहा लेकिन प्यार और सदभाव के रहते कभी महसूस नहीं हुआ। इंटरमीडिएट तक की शिक्षा गाँव से करीब तीन किलोमीटर दूर एक विजयगढ़ नाम के कसबे में हुई। गाँव में हर घर से कोई न कोई इंजीनियर -या सरकारी नौकरी में कार्यरत है तो मेरे गाँव को पढ़ाकुओं का गाँव माना जाता था लेकिन अब व्यवस्था बदल रही है।
0 वर्तमान में आप क्या करते हैं एवं परिवार में कौन -कौन हैं ?
00 इंटरमीडिएट करने के बाद झाँसी के राजकीय पॉलिटेक्निक से मैकेनिकल इंजिनीरिंग में डिप्लोमा प्राप्त किया और फिर इंडस्ट्री में नौकरी शुरू कर दी। पहली नौकरी प्रोजेक्ट इंजीनियर की थी लेकिन मैं, बचपन से अस्थमा का मरीज था, इस नौकरी में ज्यादा दिन नहीं चल पाया और बीमार रहने लगा।  इस बीच मैं जामिया मिलिया विश्वविद्यालय , दिल्ली से उच्च शिक्षा प्राप्त करता रहा और अब ग्रेटर नॉएडा के एक प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवक्ता के रूप में कार्यरत हूँ। गाँव में माँ-बाप, भाई भाभी बच्चे हैं और मैं वर्तमान में गाजियाबाद में पत्नी और दो बेटों के साथ रहता हूँ। 
0 घूमने की रूचि आपके भीतर कहाँ से जाग्रत हुई?
00 घुमक्कड़ी का शौक झाँसी से पॉलिटेक्निक डिप्लोमा करते हुए हुआ। हमारे हॉस्टल के सामने से ट्रेवल्स की बस निकलती थी शाम के समय। ये बस आगरा -ग्वालियर होते हुए जयपुर तक जाती थी और दूसरी तरफ खजुराहो, कानपुर , लखनऊ भी जाती थी। तो हॉस्टल का लगभग हर छात्र इनकी केबिन में बैठकर इन जगहों पर घूम ही आता था। तो  इस तरह झाँसी से जयपुर , खजुराहो , लखनऊ , ग्वालियर आदि जगहें घूम लीं और वहीं से शौक जागृत होने लगा घूमने का।
0 किस तरह की घुमक्कड़ी आप पसंद करते हैं, ट्रैकिंग एवं रोमांचक खेल भी क्या सम्मिलित है ? कठिनाइयां भी बताएं ?
00 घुमक्कड़ी को वर्गीकृत करना मेरे लिए बहुत मुश्किल होगा क्योंकि मैं हर तरह की घुमक्कड़ी पसंद करता हूँ। इतिहास समेटे किले भी आकर्षित करते हैं तो ऊँची ऊँची पर्वत चोटियां भी। हिन्दू धर्म की आस्था के प्रतीक मंदिर भी बहुत अच्छे लगते हैं तो घने जंगलों के बीच से ट्रेक करना भी अच्छा लगता है। लेकिन अगर अपनी पसंद की ही बात आ जाए तो मुझे ट्रैकिंग करना और पैसेंजर ट्रेन में यात्रा करना हमेशा अच्छा लगता है। ट्रैकिंग का उजला पहलु ये है कि आप उन जगहों को देख पाते हैं जिन्हें या तो लोगों ने देखा ही नहीं या फिर बहुत कम लोगों ने ही देखा है। आप ट्रैकिंग को प्रसव से जोड़ सकते हैं जो पीड़ा के बाद सुखद परिणाम देता है।  
0 उस यात्रा के बारे में बताएं जहां आप पहली बार घूमने गए और क्या अनुभव रहा ?
00 पहली यात्रा! खजुराहो की थी पॉलिटेक्निक के दोस्तों के साथ। अनुभव विचित्र रहा और अनुरोध करूँगा कि इस के आधार पर मेरी इमेज मत बना लीजियेगा। क्योंकि उस बात को 18 वर्ष होने को हैं और तब मैं 20 -22 साल का युवा हुआ करता था अब 40 साल का आदमी और दो बच्चों का पिता हूँ।  हुआ ये था कि जब हम सात लोग खजुराहो पहुंचे तो हमने होटल का एक ही रूम लिया और कुछ बैड पर सो गए , कुछ ने गद्दा खींचकर नीचे जमीन पर लगा लिया। हमने एक दिन का किराया दिया था। अगले दिन हम पूरा दिन घुमते रहे, रेने फॉल भी गए लेकिन शाम को जब लौट रहे थे तब एक आईडिया दिमाग में आ गया कि होटल का एक दिन का किराया कैसे बचाया जाय। तो हम सात में से चार लोग होटल में गए और तीन पीछे खिड़की के नीचे खड़े हो गए, हमने सारा सामान नीचे फेंक दिया खिड़की से। आराम से रिसेप्शन पर आये और चाभी देते हुए कहा -हम खाना खाने जा रहे हैं, हमारे साथ के लोग आएं तो उन्हें चाभी दे देना और वो साथी अब तक नहीं पहुंचे। हा...हा..हा !! मस्ती थी।
0 घुमक्कड़ी के दौरान आप परिवार एवं अपने शौक के बीच किस तरह सामंजस्य बिठाते हैं?
00 भगवान की कृपा से पैसे का लालची मैं नहीं रहा कभी। मेरा मन्त्र कुछ इस तरह का है – Enjoy each & Every moment of your life !! शाम छह बजे तक घर पहुँच जाता हूँ और शनिवार -रविवार भी घर होता हूँ। इस पूरे समय में बच्चों के साथ बच्चा बनकर मस्ती मारता हूँ। दूसरी बात कि अगर मैं कहीं ऐसी जगह घूमने जा रहा हों जो जगह बच्चों के मतलब की है और सुरक्षित है तो मैं पूरे परिवार के साथ ही यात्रा करता हूँ।
0 आपकी अन्य रुचियों के साथ बताइये कि आपने ट्रेवल ब्लॉग लेखन कब और क्यों प्रारम्भ किया ?                         00 घूमना रुचियों में ऊपर ही आएगा तो इसके अलावा मुझे पढऩा हमेशा पसंद आता है। इतिहास, साहित्य, राजनीति कुछ भी। दूसरी पसंद -मुझे अलग अलग भाषाएं सीखना अच्छा लगता है और ये शायद बचपन से ही है। 8 वीं में उर्दू सीख ली थी, गाँव से करीब तीन किमी दूर एक मस्जिद में जाया करता था उर्दू सीखने के लिए ! हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी , उर्दू के अलावा जापानी और पश्तो (अफगानी) भाषा सीखी हुई है। हंगेरियन भाषा भी सीखी थी। 

वरिष्ठ सहयोगी ने एक समाचार पत्र के ब्लॉग पोर्टल  से परिचय कराया तो वहां राजनीतिक -सामाजिक -साहित्य विषयों पर ब्लॉग लिखने लगा।  मेरे लिए ब्लॉग कोई कमाई का माध्यम नहीं है बल्कि मैं ये सोचता हूँ कि मेरे ब्लॉग से किसी को अपना यात्रा प्लान बनाने में सही जानकारी और रास्ते का दिशा निर्देश मिल सके। अच्छा लगता है जब कोई कहता है कि आपका ब्लॉग पढ़कर ही हम फलां जगह गए।

0 घुमक्कड़ी ( देशाटन , तीर्थाटन , पर्यटन ) को जीवन के लिए आवश्यक क्यों माना जाता है ?
00 देशाटन हिन्दू मतलब भारतीय संस्कृति का प्रारम्भ से ही एक महत्वपूर्ण अंग रहा है। आप मुझसे बेहतर जानते हैं कि आदि शंकराचार्य जी ने देशाटन के माध्यम से ही धर्म को उसकी ऊंचाइयों पर पहुँचाया। घुमक्कड़ी आपको सिर्फ नई जगह ही नहीं दिखाती अपितु घुमक्कड़ी के माध्यम से आप बेहतर इंसान बनते हैं, इंसानी जरूरतों और उसके दु:ख सुख को समझने लगते हैं। अगर एक पंक्ति में कहूं तो घुमक्कड़ी आपको एक बेहतर और बढिय़ा सोच का इंसान बनाती है।

0 आपकी सबसे रोमांचक यात्रा कौन सी थी, अभी तक कहाँ-कहाँ की यात्राएं कीं और उन यात्राओं से क्या सीखने को मिला ?
00 ऐसे बहुत यात्राएं की हैं। अभी जून में ही नंदीकुंड-घीया विनायक पास पार किया लेकिन यादगार यात्रा सतोपंथ -स्वर्गरोहिणी की यात्रा मानता हूँ। उसका कारण ये है कि एक तो ये मेरी पहली ट्रैकिंग थी जीवन की और दूसरी बात धार्मिक पक्ष भी इसके साथ जुड़ा था। हम अपने आप को पांडवों के पथ पर आगे चलते हुए प्रसन्न और भाग्यशाली महसूस कर रहे थे। अब तक लगभग उत्तर -पूर्व के सभी राज्य, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश , उत्तराखंड , हिमाचल , जम्मू-कश्मीर, बिहार , झारखंड, राजस्थान आदि राज्यों में घूम चूका हूँ लेकिन दक्षिण की तरफ अभी जाना नहीं हो पाया। हर यात्रा से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है और आप नए नए लोगों से और नई नई संस्कृति से परिचय प्राप्त करते हैं।

0 नये घुमक्कड़ों के लिए आपका क्या सन्देश है ?
00 नए लोगों में जोश है, उत्साह है और बड़ी बात कि उनके अंदर घुमक्कड़ी के लिए कुछ भी कर गुजरने का जो जज्बा है , वो प्रभावित करता है। हालाँकि मैं भी अभी लर्निंग स्टेज में ही हूँ तो किसी को सलाह देने लायक नहीं समझता। लेकिन एक अनुरोध जरूर करूँगा, चाहे कितना भी घूमिये लेकिन कभी अपने आपको घमंडी मत बनाइये और प्रकृति को नुक्सान मत पहुंचाइये। आखिर सबसे पहले हम इंसान हैं और इंसानियत को सर्वोपरि रखिए।


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